'हम बदलेंगें युग बदलेगा' इसी तर्ज पर महिलायें क्रान्ति का संवाहक बनने जा रही हैं। महिलायें आज पुरूषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रहीं हैं। यही नहीं हर क्षेत्र में ये पुरूषों से आगे भी बढ़ती जा रहीं हैं. किन्तु इस बार महिलायें दूर्गा के रूप में जन आक्रोष कर रहीं हैं, वो आक्रोष किसी असुर के खिलाफ नहीं बल्कि उस डायन (शराब) के खिलाफ है, जो औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन है। महिलाओं का मन तब बोझिल हो जाता है, जब उनके घर का कोर्इ सदस्य
इस जन आक्रोष की शुरुआत बिहार के ही मुजफ्फरपुर जिले से हो रही है, जहां से संपूर्ण क्रांति के नायक जय प्रकाश नारायण ने, नक्सलियों को जोड़ने का अभियान शुरू किया था। महिलायें केवल शराब व्यवसायियों के खिलाफ ही नहीं वरन अपने घर में इसका उपभोग करने वालों के खिलाफ भी आवाज उठा रहीं हैं। बहुत हद तक उन्हे शायद इससे सफलता मिल भी जाए, तो क्या फर्क पड़ता है। यदि हम पूरे बिहार की बात करें तो लगभग दस करोड़ की जनसंख्या वाला यह राज्य क्या बदल पाऐगा। इसका जवाब हर कोर्इ जानता है कि नहीं ही होगा लेकिन क्या इसे हम कम नहीं कर सकते? क्या शराब ने हमें बनाया है या हमने शराब को बनाया है। यदि इस जन आक्रोष को राज्य और देश की हर औरतें अपना अधिकार समझकर करें तो कोर्इ मुश्किल काम नहीं। मुजफ्फरपुर की महिलाओं की वजह से, आज वहां के जितने शराब व्यवसायी हैं शाम छ: बजे के बाद अपनी दुकान खुला रखने से भी घबराते हैं. क्योंकि पुलिस तो शायद धन लोभ से अपने मुह बंद रख लें किन्तु ये महिलाएं अगर आ गर्इ तो पुलिस की बन्दूकें भी काम करना बंद कर देंगी। और इनके व्यवसाय का अखिरी दिन आ जाएगा। यही नहीं राह चलते अगर कहीं शराबियो और जुआ खेलने वालों की झुंड नजर आ गर्इ, तो उनकी खैर नहीं। इस छोटी सी पहल से मधुबनी और मोतिहारी जैसे जिलों में भी महिलाओं ने अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू कर दिये हैं. जिससे वहां के पुरूष महकमों में हलचल पैदा हो गर्इ है।
महिलाओं की इस लड़ार्इ में सरकार के भी कुछ कदम आगे बढ़ते दिखे पर सरकारी शराब बेचने की मजबूरी आड़े आ गई. बहुत सारे अवैध शराब दुकान सील बन्द भी किये गये. अब पुलिस की जिप्सी भी जगह-जगह पर तैनात रहती है, ताकि शराबियों की वजह से कोर्इ अनहोनी न हो जाए। किन्तु जब बात बड़े-बड़े व्यापारियों की सामने आती है, तो पुलिस लाइसेंस का हवाला देते हुए आम जनता का मुह बंद करने की पूरी कोशिश करती दिखती है। इस जन आक्रोष से पुरूषों को यह सीखना चाहिए कि शराब को अपने से दूर रख, अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्ज्वल करे। शराब घर को बरबाद ही करती है, उससे घर उजड़ते हैं. अत: सभी अपने होशो-हवास में अपने कर्तव्य को समझे और इस जन आक्रोष से सबक ले।
शराब की दुकानें आज हर जगह पर दिख जाती है, चाहे वह मन्दिर, मस्जिद, स्कूल, कॉलेज हों, अथवा सड़क के किनारे। हम यदि अपने शहर पटना की बात करें तो 4,18,000 से भी ज्यादा लीटर शराब की खपत एक महीने में केवल पटना के लोग करते हैं। आज 10 कदम आगे चलें तो एक शराब की दुकान मिलना आसान है, किन्तु बच्चों के लिए दूध के लिए कोसों दूर जाना पड़ता है। आखिर सरकार पूरी तरह से क्यों नहीं इस पर कार्यवाही करती है। क्या जागरूकता ही केवल इसका एक उपाय है। क्या सरकार कार्यवाही करती नहीं है या करना नहीं चाहती, क्योंकि सरकार को भारी मात्रा में इससे टैक्स मिल जाता है। बहरहाल हम आम जनता को उन महिलाओं के साथ जन आक्रोष में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए। और इस मुहिम को एक आंदोलन के रूप में देखना चाहिए.
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