बंधुआ मजदूरी हमारे देश की बहुत बड़ी समस्या है।इस समस्या से हमारे देश के भविष्य अर्थात बच्चे शोषित हो रहे है।खेलने,पढने की उम्र में उन्हे मजबूरन दूसरे के घरों में काम करना पड़ता है ,उनका बचपन गुलामी के जंजीरो में बंध कर रह गया है।
Thursday, October 17, 2013
चौका बर्तन की अधिकारी “ लड़कियां नहीं ‘’
भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वयं सहायता समूह ने ग्रामीण महिलाओं के लिए एक स्वर्णिम अवसर लेकर आया। जो ग्रामीण महिलाओं की किस्मत ही बदल दी। जहां महिलाएं आत्मनिर्भर हुई और पारिवारिक फैसलों में भी बढ-चढकर हिस्सा लेने लगीं। उन्हें अब इस बात की चिंता नही हैं कि घर के पुरूष ही काम करेंगे तभी उनके घर के चूल्हे जलेगें। स्वयं सहायता समूह की वजह से ही घरों मे काम करने वाली लड़कियां अब पढ़ाई करने लगी हैं। इसका एक सुदृढ परिणाम है कि लड़कियां अब लड़कों से कदम ताल मिलाकर काम करने लगी है।
लड़कियां ही क्यों, समाज का बोझ ?
हमारे समाज में आए दिन बहुत सारी कुरीतियां देखने को मिलती है, लेकिन सबसे बड़ी बात देखने को मिलती है वो है लड़के-लडकियों में भेदभाव। आदिकाल से ही हमारे समाज में लड़कियों को भोग-विलास की वस्तु माना जाता रहा है।
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