Wednesday, October 17, 2012

जरूरी है बढ़ते वाहनों पर रोक

तेजी से बदलती और भागती दुनिया ने लोगो को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बिना गति के विकास नही हो सकता . शहर के भागमभाग को लोग इसी रूप मे देखते है. चौड़ी सड़कें, फ़्लाईओवरों का जाल और तेजी से भागती गाड़ियां किसी भी शहर को महानगर का दर्जा दिलवा देती हैं . मगर इस महानगर का दुर्भाग्य देखिये. यहां लगने वाला जाम मानों विकास के रास्ते का रोड़ा बन जाता है. जाम आज बड़े शहरों मे रहने वालों की ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा सा बन गया है.
हमारी सरकार जाम की मुसीबत से निपटने के लिए जीतोड़ कोशिशें करती हैं – ट्रैफिक -पुलिस , फ़्लाईओवर, मेट्रो और ना जाने क्या-क्या. मगर बेतहाशा बढ़ते वाहनों पर रोक नहीं लगाती. आखिरकार पूंजी निवेश का हरदम स्वागत करने वाली सरकार वाहन निर्माता कम्पनियों से दगा कैसे कर सकती है– अपनी जनता से दगा करने मे कोई हर्ज नहीं दिखता. फिर सरकार सार्वजनिक परिवहन के उपयोग का जागरुकता कैंपेन पर भी सुस्त ही दिखती है.
देश की राजधानी दिल्ली मे इतनी संख्या में निजी वाहन हैं, जितने कि देश के कई जिलों की सम्मिलित जनसंख्या भी नहीं होगी. पटना जैसे टियर-3 शहरों की सड़कों पर हर साल 45 से 50 हज़ार वाहन आ जुड़ते हैं. आप कहेंगे कि ऐसा तो सारी दुनिया मे हो रहा है .जी नहीं जनाब. जहां भारत सरकार इस प्रवृति पर अंकुश लगाने के बारे में सोच भी नहीं पा रही, दुनिया के अनेक हिस्सों में बढ़ती गाड़ियों के खिलाफ प्रभावशाली आन्दोलन हुए हैं, प्रतिरोधी आवाजें उठीं हैं.
न्यूयॉर्क मे कई फ़्लाईओवरों को तोड़ दिया गया है, कोपेन्हेगन हर साल 2-3% की दर से गाड़ियों के पार्किंग स्पेस कम कर रहा है, न्यूजीलैंड मे लोगों के लिये शहर के अन्दर साईकिल की सवारी गर्व का विषय है, सिंगापुर सीमित संख्या मे ड्राईविंग लाईसेन्स जारी करता है, टोक्यो मे आप गाड़ी तभी खरीद सकते है जब आप पूरा प्रमाण दें कि आप गाड़ी कहां खड़ी करेंगे. उदाहरणों की कमी नही है, सवाल यह उठता है कि किसी भी संस्कृति से हमेशा कुछ न कुछ लेने वाला हमारा देश और हमारी सरकार क्या इस मामले मे भी अमेरिका, जापान और युरोप से कुछ सीखने की कोशिश करेगी या नहीं.
गाड़ियों की बढ़ती भीड़ से जो नुकसान हैं, वे आम तौर पर दिखाई नही देते या महसूस नही किए जाते. पर उनका प्रभाव बड़ा दूरगामी होता है. ज्यादा वाहनों के लिये ज्यादा सड़कें चाहिए और इसके लिए पेड़ों को काटा गया है. गाड़ियों से जो कार्बन का उत्सर्जन होता है उससे पर्यावरण का क्या हाल होता है, जगजाहिर है. सूक्ष्म तौर पर देखें तो गाड़ियों ने शहरों को असंवेदनशील बनाया है, सड़कों को खतरनाक जगह बनाया है और पड़ोसियों मे हीनता की भावना भरी है. और ट्रैफिक मे फंसे तो बेवजह बजाए जा रहे हॉर्न से अच्छा खासा मूड भी ऑफ हो जाता है. एक तो वाहन का धुंआ, ऊपर से हॉर्न का शोर- ज़िंदगी की अच्छी खासी वाट लग जाती है.
तो हमारे सामने बढ़ती गाड़ियों से हो रही परेशानियों के उदाहरण भी हैं और इससे बचाव के लिए की जा रही सफ़ल कोशिशों के उदाहरण भी. अब यह हम पर और सरकार पर निर्भर है कि हम किस रास्ते पर और कितनी गति से चलना चाहते हैं? हां, कुछ काम तो हम कर ही सकते हैं. जैसे; बेवजह हॉर्न न बजाना और जहां तक संभव हो सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना. आखिर हम बदलेंगे तो ही समाज बदलेगा.

No comments:

Post a Comment