Tuesday, October 30, 2012
अब नहीं रहा विकास---
जी हां आपको सुनकर अश्चर्य तो हो रहा होगा लेकिन यह सत्य है। विकास कोर्इ राजनीतिक या आर्थिक नहीं बलिक एक जिराफ है, जिसकी मौत इलाज की कमी के कारण पटना के चिडि़याघर में हो गर्इ। विकास को 2006 में पटना के जू में लाया गया था। विकास अमेरिका के संत डियागो जू में आठ जुलार्इ 2005 को जन्मा था। जू प्रशासन उसकी मौत का कारण
Friday, October 26, 2012
Thursday, October 25, 2012
पटना: इतना गंदा क्यों ?
पटना की सड़कों पर आते- जाते हम सभी के मन में ऐसी बातें आती हैं | कई बार इस गंभीर समस्या के विषय में हम आपस में चर्चा भी करते हैं | कभी इसका समाधान ढूंढने की कोशिश करते हैं, तो कभी बातें यूं ही आई- गई हो जाती हैं | और हममें से ज्यादातर लोग इसके लिए केवल सरकार और प्रबंधन को ही जिम्मेदार ठहराते हैं | कुछ हद तक सही भी है | आखिर जनता की आवश्यकताओं और सुविधाओं की पूर्ति करना सरकार की जिम्मेदारी ही तो है | सड़कों के निर्माण और शहर की सफाई के नाम पर आम जनता से ही तो टैक्स वसूले जाते हैं | सरकार हर साल इस काम के लिए मोटे बजट की घोषणएं तो कर देती है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक महकमों को अपनी जेब भरने से फुरसत मिले तब तो इन्हें अपना काम याद आये |
खैर, यहां मेरा उद्देश्य सरकारी तंत्र पर दोषारोपण करना नहीं है | क्योंकि जब तक हम सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ ध्यान नहीं देंगे, हम यूं ही लाचारी के जाल में उलझे रहेंगे |
जरा सोचिये कि अपने शहर की सड़कों पर फैली गंदगी के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकार को ही दोषी ठहराना क्या उचित है? क्या इस शहर के नागरिक होने के नाते हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ?
अब एक मिनट के लिए इमानदारी से सोंचकर देखिये, कि आपने इस दिशा में क्या किया है? और क्या करना चाहिये ?
सड़क पर चलते वक्त (पैदल हो या किसी सवारी पर) हमारे पास जो भी बेकार चीज पड़ी होती है उसे बिना इधर – उधर देखे बेपरवाह कहीं भी फेंकते चले जाते हैं | कचरा सही जगह पर फेकने के लिए दस कदम चलने की जहमत कोई उठाना नहीं चाहता | सड़क पर कहीं भी थूकते चले जाते है चाहे उस जगह पर ऐसा करना प्रतिबंधित ही क्यों न हो |
अब एक अहम सवाल पूछना चाहूंगी, क्या हम अपने घरों में भी ऐसा ही करते हैं ? शायद कुछ लोग कहें कि घर तो हमारा अपना है, और उसकी सफाई की जिम्मेदारी हमारी है | तो जनाब.. क्या वो सड़क आपकी नहीं है ? यह तो बस हमारी सोच का फेर है | अगर कभी किसी घर के नीचे से गुजरते वक्त आपके ऊपर गंदे पानी या कूड़े की बरसात हो जाये, तो भी शायद यह कोई बड़ी बात नहीं होगी | क्योंकि हमारी सोच ही ऐसी है | अपने घर के सामने सफाई करके कूड़े को बीच सड़क या बगल वाले घर के पास जमा कर देते हैं | सोचिये, अगर कोई हमारे साथ ऐसा करे तो कैसा लगेगा ? सरकार ने तो फिर भी जगह- जगह शुलभ शौचालय की व्यवस्था कर दी है | लेकिन कितने लोग इसका उपयोग करते हैं ?
हलांकि पटना नगर निगम बहुत जल्द ही पटनावासियों की इस हरकत पर लगाम लगाने के लिये 1000 रूपये जुर्माने का प्रावधान करने जा रही है | बड़ा ही अजीब लगता है ये सोचकर कि हम अपनी छोटी से छोटी गलतियां भी तब तक नहीं सुधारते जब तक हम पर जुर्माने या किसी तरह के दण्ड की तलवार नहीं लटकाई जाती |
अपनी इस सोच को बदलने के लिये हम और कितना वक्त लेंगे ? जितनी जल्दी ऐसा हो, हमारे और हमारे शहर के लिये उतना ही अच्छा होगा | क्योंकि सकारात्मक सोच ही पूरे बिहार की काया पलट सकती है | इसके सरकार और प्रशासन को भी इमानदारी से आगे आना होगा | और अगर वह ऐसा करने में विफल होती है, तो हर आम आदमी को अपना अधिकार और फर्ज समझकर सरकार और प्रशासन को समय-समय पर उनका काम याद दिलाना होगा |
साथ ही शहर के हर नागरिक को इस गंभीर समस्या के समाधन में अपना योगदान देना होगा | ये हमारा कर्तव्य है | ऐसा करके हम अपनी ही तो मदद करेंगे | आखिर उन सड़कों पर हमें भी तो चलना है | गंदगी से फैलनेवाली बीमारियां हमें भी तो बीमार बनायेंगी | जब तक शहर के वातावरण में दूषित हवा और बदबू फैली होगी शुद्ध वातावरण की अपेक्षा करना बेइमानी होगी |
Friday, October 19, 2012
युवा वर्ग- नशे में गिरफ्त
आज के फैशन के युग में युवा का सबसे बड़ा सगल नशा है। आज अपने आप को माचो मैन दिखाने के लिए युवा सिगरेट, शराब का सेवन कर रहे हैं। इससे उनका समझना है कि यदि आप इस तरह का काम नहीं किये है तो आप ने जिंदगी नहीं जीया हैं। एक अनुमान के अनुसार सबसे ज्यादा सिगरेट और शराब का सेवन 16 से 30 साल के लोग कर रहे हैं। उसमें भी मेट्रो शहरों में 70% खपत सिगरेट और शराब की हो रही है। आज के युवा वर्ग को क्या हो गया है पता नहीं चलता।
विश्वविद्यालय जीवनदाता या अखाड़ा
प्राचीन काल से विश्वविद्यालय छात्रों के लिए जीवनदाता रहा है। ऐसा आज भी है। विश्वविद्यालय का मतलब होता है एक छत के नीचे सारे संसार का ज्ञान प्राप्त करना। यहां न सिर्फ पढ़ाई बल्कि खेल, अध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञान भी हम प्राप्त करते हैं। विश्वविद्यालय में शिक्षक और छात्रों का संबंध बहुत मित्रवत होता है। जिससे यह समझने में मुश्किल होती है कि छात्र कौन है और शिक्षक कौन। विश्वविद्यालय की एक खासियत यह होती है कि जीवन देने के साथ छात्र के व्यक्तित्व विकास करने में वह महत्वपूर्ण योगदान देता है।
टेक्नोलॉजी के बीच मानव जीवन
बाज़ार में नई-नई टेक्नोलॉजी ने अपनी पैठ इस तरह से बनाई है कि इसके प्रभाव की कल्पना भी करना मुश्किल है। आप भी इस तरह की वस्तुओं के उपयोग से भली-भांति परीचित होंगें। जीवन जीने के ढ़ंग आज से जो 10 साल पहले थे वो आज बिल्कुल बदल गए हैं। अब तो ऐसा लगता है कि इन चीज़ों के बग़ैर हम एक कदम भी नहीं बढ़ सकते। मोबाईल, इन्टरनेट, कम्प्युटर आदि ने तो हमारे काम करने के तरीकों में क्रांति ही पैदा कर दी है। आने वाले युग की तस्वीर कैसी होगी?
Thursday, October 18, 2012
बदलते दौर में फाइनेंन्स्ड दुर्गा पूजा...
सबसे पहले मैं उन पाठकों को इस महान पर्व कि बधाई देना चाह्ता हूँ जो इसे पढ़ रहे हैं...और उन्हे भी जो इसे नही पढ़ पा रहे है...इस पुजा के साथ बड़ी यादें जुडी हैं...हम बचपन में इस बात का इंतज़ार करते थे कि कब ये पर्व आये और हम नये-नये कपड़े खरीदें और खुब घुमे...हालांकि अभी भी जब मौका मिलता है तो घुम ही लेता हूं...पर उतना नही घुम पता जितना घुमा करता था।
पहुंच से दूर होता पटना
हाल ही में कुछ अख़बारों में ख़बर छपी कि पटना में रियल इस्टेट और जमीन की कीमतें नोएडा और दिल्ली जैसे महानगकरों से होड़ कर रहीं हैं. पढ़कर एक साथ दुख भी हुआ और आश्चर्य भी. दुख इसलिए कि पूरे देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले बिहार की राजधानी में गरीबों और छोटे रोजगार से जुड़े तबकों के लिए आशियाना ढ़ूंढ़ना मुश्किल होने वाला है. उल्लेखनीय है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय 13663 रू है जोकि देश की 37,731 के अनुपात मे बहुत ही कम है. और आश्चर्य इसलिए क्योंकि बुनियादी सुविधाओं के लिहाज से पिछड़े शहरों में गिने जाने वाले पटना में आशियाने की आसमान छूती कीमतों की वजह एकाएक समझ में नहीं आई.
बदलते दौर में फाइनेंन्स्ड दुर्गा पूजा....
सबसे पह्ले मै उन पाठकों को इस महान पर्व कि बधाई देना चाह्ता हूं जो इसे पढ़ रहे हैं...और उन्हे भी जो इसे नही पढ़ पा रहे हैं...इस पुजा के साथ बड़ी यादें जुड़ी हैं...हम बचपन मे इस बात का इंतज़ार करते थे कि कब ये पर्व आये और ह्म नये-नये कपड़े खरीदें और खुब घुमे...हालांकि अभी भी जब मौका मिलता है तो घुम ही लेता हूं...पर उतना नही घुम पता जितना घुमा करता था।
हम बदलेंगे युग बदलेगा
'हम बदलेंगें युग बदलेगा' इसी तर्ज पर महिलायें क्रान्ति का संवाहक बनने जा रही हैं। महिलायें आज पुरूषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रहीं हैं। यही नहीं हर क्षेत्र में ये पुरूषों से आगे भी बढ़ती जा रहीं हैं. किन्तु इस बार महिलायें दूर्गा के रूप में जन आक्रोष कर रहीं हैं, वो आक्रोष किसी असुर के खिलाफ नहीं बल्कि उस डायन (शराब) के खिलाफ है, जो औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन है। महिलाओं का मन तब बोझिल हो जाता है, जब उनके घर का कोर्इ सदस्य
जहाँ चाह वहाँ राह
बिल्कुल सच बात कही गई है अगर आप किसी चीज़ को पाने की इच्छा रखते है, तो उसे पाने के लिए आप अपनी सारी कोशिश शुरु कर देते है और आखिरकार आपको सफलता मिल जाती है।
वीआईपी घेरे में आम आदमी
मारों इन........ नेता सब को, ये शब्द मेरे नहीं हैं बल्कि एक 65 वर्ष बूढ़े व्यक्ति के कहे हुए हैं. हिलते हुए हाथ में काले रंग का एक बैग और दूसरे में बुढ़ापे का सहारा छड़ी। गुस्से भरी उनकी लाल आंखें थी। चेहरे पे झुर्रियां मौजूद थी, शरीर से तो कमज़ोर थे पर अपने शब्दों से भड़ास निकाल रहे थे। मैं उनके साथ ही दानापुर के सगुना मोड़ से चढ़ा था। गाड़ी में और भी लोग मौजूद थे। किसी को ऑफिस जाना था, तो किसी को अपने काम के लिए दुकान पर। मुझे भी कॉलेज के लिए आना था। ड्राईवर भी काफी खुश था क्योंकि उसे पूरी सवारी मिल चुकी थी। गाड़ी अपनी पूरी ताकत लगा कर हवा से बात करते हुए बढ़ रही थी। सवारी भी सुबह की हलचल का आनंद लेने में मग्न थी।
बिहार के छात्रसंघ नई शुरुआत करने को आंदोलित
| पटना विश्वविद्यालय |
पटना विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ चुनाव की तारीख घोषित कर दी है। वह दिन 11 दिसंबर है। जब पटना विश्वविघालय के छात्रसंघ 29 वर्षों से मृत पड़ी छात्र राजनीति को दोबारा जीवित करेंगे। लोकतंत्र की सेमनरी में छात्र राजनीति के स्वर एक बार फिर गुजेंगे। छात्रसंघ को यह उपलब्धि लंबे संघर्ष के बाद प्राप्त होइ है। बिहार के छात्र इसके लिये विश्वविद्यालय से लेकर राजभवन और मुख्यमंत्री आवास तक अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं। इनकी आवाज को विश्वविद्यालय प्रशासन, राजभवन और पिछली सरकार अनसुनी या नकारती रही है। वर्तमान मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री बधाई के पात्र हैं। उन्होंने इस दिशा में पहल की है। वहीं पटना विश्वविद्यालय के कुलपति भी पहल करने के लिये बधाई योग्य हैं।
विज्ञापन और बच्चे...!
आज के दौर में बचपन हजार खतरों से घिरा है। उनमें से एक विज्ञापनों की वो भ्रामक दुनिया भी है जो बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारे जीवन के हर हिस्से पर अधिकार जमाये बैठी है। चाहे अखबार खोलिए या टीवी, इंटरनेट हो या रेडियो, इतना ही नहीं एक पल को घर की छत या बालकनी में आ जाएं जो साफ सुथरी हवा नहीं मिलेगी पर दूर- दूर तक बड़े बड़े होर्डिंग्स जरूर दिख जायेंगें जो किसी न किसी नई स्कीम या दो पर एक फ्री की जानकारी बिन चाहे आप तक पहुंचा रहे हैं। यानि हर कहीं कुछ ऐसा जरूर दिखेगा जो दिमाग को सिर्फ और सिर्फ कुछ न कुछ खरीदने की खुजलाहट देता है। जिसका सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं वो मासूम बच्चे जिनमें इन विज्ञापनों की रणनीति को समझने का न तो आत्म बोध है और न ही जानकारी।
संवेदना से दूर होता यंगिस्तान
हमारे देश में भारतीय रेल ने वृद्धों के किराये
की भाड़ा पर 40% की
छूट दी है। वृद्धों के सम्मान में सीनियर सीटीजन की बिशेष सुविधा मुहैया कराता है
यह 40% की
सुविधा कितना लाभदायक साबित हो पा रही है। इसका अनुभव रेल में यात्रा करने पर ही
प्राप्त होता है।
ग्लोबल वार्मिंग जैसे राक्षस को मारने के लिए चाहिए कई राम
कभी धरती और जीवों के बीच रहा मधुर संबंध आज तार-तार होने लगा है। यही मुख्य कारण है कि आज हमारे सामने लगातार बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही है, और इस समय की सबसे बड़ी समस्या है ग्लोबल वार्मिंग। जिसके कारण धरती दिन ब दिन गर्म होती जा रही है। यदि यह जारी रहा तो हमारा अस्तित्व गम्भीर खतरों के पलनों में पलने लगेगा और उन पलनों को हिलायेगी समस्याएं तथा उनके बेटे और पोते।
सच्चे प्यार की जीत
सच ही कहा गया है, प्यार अंधा होता है जब दो लोग प्यार में पड़ते हैं तो उन्हें सब कुछ बेगाना सा लगता है और सारे विवादों और सारी बंदिशों को तोड़ कर बस एक होना चाहते हैं। इनके लिए जाति, धर्म, ऊंच-नीच ये सारी चीज़ें बेगानी सी लगती है।
साहेब तेल पीने लगे हैं...
तेल पीने की घटना पर लिखने के लिए मेरा मन बहुत दिनों से व्याकुल था. वजह थी साहब होने के नये फायदों से सबको अवगत कराना. और करायें भी क्यों न, हमसब का जो ख्वाब होता है साहब बनने का. आज समय मिला सोचा लिखकर बता ही दूँ, न जाने कभी काम ही आ जाये.
ये बात कुछ दिन पहले की है. उस रोज मैं अपने गाड़ी की टंकी में पेट्रोल भरवाने पेट्रोल पंप पर गया हुआ था. पेट्रोल भराकर मैं खरीद की रसीद ले रहा था. इतने में एक चमचमाती चार चक्के की गाड़ी आकर रूकती है. ड्राईवर साहेब गेट खोलकर पेट्रोल पंप कर्मी को टंकी को फुल करने का हुक्म देते हैं. बेचारा कर्मी तुरंत चंद समय का मालिक का कहा मान कर, तेल भराई शुरू कर देता है. अगले कुछ ही मिनटों में टंकी फुल हो जाती है. जब पैसा देने की बारी आती है, तो ड्राईवर साहब अपने बगले झांकतें हैं. जेब से पैसा नहीं निकलता. अंत में गाड़ी के पिछली सीट पर बैठे आदमी से पैसा लेकर, कर्मी को दे देते हैं. पीछे बैठे आदमी चाल ढ़ाल से साहब जैसे दिखते हैं. साहब को कुछ याद आता है, वे ड्राईवर को रसीद लेने की हिदायत दे देते हैं. बेचारा ड्राईवर, साहब की बात मानकर रसीद लेने के लिए संघर्ष करना शुरू कर देता है. पंप कर्मी आता है, तेल की मात्रा पूछकर रसीद के फिल इन द ब्लैंक्स कॉलम को भरना शुरू कर देता है. जब रसीद पर छपे स्थान पर गाड़ी नंबर लिखने की बारी आती है. तो वह गाड़ी की नंबर प्लेट देखने चला जाता है. इतने में गाड़ी के पीछे बैठे साहब का ध्यान टूटता है. गाड़ी से बाहर निकलकर पेट्रोल पंप कर्मी से रसीद पर गाड़ी नंबर का स्थान खाली छोड़ देने के लिए कहते हैं. पेट्रोल पंप कर्मी बिना कोई बात कहे साहब के हाथ में ही बिल दे देता है. साहब मुँह से पान मसाला थूकते हुए, चमनियां मुस्कान के साथ अपनी सीट पर बैठ जाते हैं. ऊधर ड्राइवर मालिक को बैठता देख अपनी सीट पर बैठकर गाड़ी आगे बढ़ा देता है. गाड़ी के जाते ही, वह कर्मी साथ काम कर रहे अपने मित्र से कहता है, साहब तेल पीकर चले गये. अब हम भी सोंचें वो तेल पीने का क्या मतलब है! अगर आपके समझ में आ गया हो, तो फिडबैक देकर मुझे जरूर बताईये.Wednesday, October 17, 2012
गांवों में जीवन कितना मुश्किल और कितना सरल
एक आर्दश गांव होने के बावजूद भी गांवो में रहना
मुश्किल होता है। जिन गांवों में सड़क, पानी, मकान आदि आधारभूत व्यवस्था
समृद्ध है वहां भी समाजिक बंदिशो के कारण जीवन की रास्ते मे रूकावटें होती हैं। आइए हम जानें इन रुकावटों को।
जरूरी है बढ़ते वाहनों पर रोक
तेजी से बदलती और भागती दुनिया ने लोगो को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बिना गति के विकास नही हो सकता . शहर के भागमभाग को लोग इसी रूप मे देखते है. चौड़ी सड़कें, फ़्लाईओवरों का जाल और तेजी से भागती गाड़ियां किसी भी शहर को महानगर का दर्जा दिलवा देती हैं . मगर इस महानगर का दुर्भाग्य देखिये. यहां लगने वाला जाम मानों विकास के रास्ते का रोड़ा बन जाता है. जाम आज बड़े शहरों मे रहने वालों की ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा सा बन गया है.
विकास किसका – "कचरे का"
मिट्टी के मकान और फूस की
झोपड़ी में से इतना भी कचरा नहीं निकला था कि दोनों हाथों मे भर सके। देखना है तो सुदूर
देहात में जाइए और किसी आदिवासी के यहां सुबह-सुबह देख लिजिए। फिर आदमी ने आधुनिक
बनना और विकसित बनना शुरु किया। आदमी के द्वारा फेंके गए कचरे से गढ्ढे भर गे,
तालाब-आहर-पोखर-पइन भी भर गए। गोया कचरा न हो कोई राक्षस हो। हल्की-सी बरसात हुई
नहीं कि बाढ़ हाजिर हो जाए और उस बाढ़ में बहता गली-कुचे में लुक छिप कर फेंका गया
कचरा मुंह के सामने नाजिर हो जाए।
खाप – वोटतंत्र का श्राप
हरियाणा के 2012 के सितंबर में 18 महिलाओं, जिनमें
नाबालिग भी शामिल हैं, के साथ बलात्कार की घटनाएँ पुलिस द्वारा दर्ज की गई हैं।
इनसे हरियाणा सरकार की इतनी किरकिरी हुई कि सोनिया गाँधी जब हरियाणा गई तो एक
बलात्कार-पीड़ित दलित महिला से मिलने अस्पताल जा पहुँची। लेकिन उन्होने जब हरियाणा
छोड़ते समय पत्रकारों से बात की तो बलात्कार की औपचारिक आलोचना के साथ ही यह भी कह
गईं कि देशभर में इस तरह की घटनाएँ बढ़ रही हैं। अपराधियों को सजा, पीड़ितों को
न्याय और कानून व्यस्था में सुधार के बजाए अपनी हरियाणा सरकार का बचाव उनकी
प्राथमिकता बन गई। गोया महिलाओं के साथ अपराध बढ़ रहे हैं तो इसे न तो हरियाणा
सरकार और न ही केन्द्र सरकार की कोई जिम्मेवारी है, न इसे उनकी असफ़लता के तौर पर
देखा जाना चाहिए।
कहीं खत्म न हो जाये गोलघर !
गोलघर का इतिहास
| बदरंग होता गोलघर |
अंग्रेजी हुकूमत ने सन् 1770 के भीषण अकाल में लोगों को भूख से तड़पकर दम तोड़ते हुए देखा. उसे दया आयी और तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज के निर्देश पर, कैप्टन जॉन गार्स्टिन ने अपनी देख-रेख में पटना के अशोक राजपथ के निकट, अनाज जमा करने के लिए एक (125 x 29 मी0) गोलाकार गोदाम बनवाया. सन् 1786 में गोदाम बनकर तैयार हुआ. गोलाकार भवन होने की वजह से इसे गोलघर के नाम से प्रसिद्धि मिली. एक लाख चालीस हजार टन क्षमता वाले, इस गोदाम की स्थापना के सौ वर्षों से भी ज्यादा समय तक, अंग्रेजी सरकार अकाल और सूखे के दौरान लोगों को इससे अनाज उपलब्ध कराती रही. आज़ादी के बाद प्रदेश में अनाज भंडारण के लिए समुचित प्रबंध किये गये. बीतते वक्त के साथ, गोदाम के रूप में गोलघर की उपयोगिता ख़त्म हो गई. पहले जहाँ गोलघर पर चढ़ने की इज़ाजत आम भारतीय को नहीं थी, अब साधारण लोग गोलघर पर चढ़कर पटना को देखने लगे. भाई लोग गोल घर से चढ़कर देखे भी क्यों न, उस पर से उत्तर में गंगा का मनोरम दृश्य देखने के साथ ही पूरे पटना को देखा जा सकता है.
पर्यटन स्थल और पिकनिक स्पॉट बनता गोलघर
गोलघर के महत्व को पाठ्यक्रम में शामिल करने के बाद, प्रदेश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों से लोग आकर इसे देखने लगे. धीरे- धीरे गोलघर पर्यटन स्थल और पिकनीक स्पॉट में तब्दील हो गया. आज भी किसी रैली में शामिल होने के लिए पटना आये लोग, दूसरे जिलों से डॉक्टरी सलाह लेने आये लोग, परीक्षा देने आये परिक्षार्थियों की भी चाहत, एक बार गोल घर देखने की होती है. इन सबों के साथ गोलघर आम शहरी को भी आकर्षित कर रहा है. इसके अलावा अब मुख्यमंत्री शैक्षणिक परिभ्रमण योजना के अंतर्गत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी गोलघर को दिखाकर, इसके इतिहास को बताया जा रहा है. पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कई लोगों ने इसके ईर्द- गिर्द अस्थाई दुकान खोल लिए. अपनी स्थापना के 226 वर्षों के बाद, आज वही गोलघर, कईयों के घर चलाने की उम्मीद बन बैठा. तो इसकी ही वजह से राजेश एवं सुधांसु जी जैसे कई व्यक्तियों के खाली हाथों को रोज़गार मिल गया.
उत्साहित छात्रों की मायूसी
इन सब खूबियों के बावजूद, आज गोलघर सात सालों से भी अधिक समय से मरम्मत की बाट जोह रहा है. सालों से इसके ऐतिहासिक महत्व को बताने वाली पट्टी (बोर्ड) गायब है. वहीं न ही यहाँ, आने वाले पर्यटकों को जानकारी देने के लिए किसी गाईड का इंतज़ाम है. मुख्यमंत्री शैक्षणिक परिभ्रमण योजना के अंतर्गत स्कूली छात्रों का समूह आता है, गोलघर को नीचे से उपर निहारते हुए, पहले कौन चढ़े की बाजी लगाकर जोश- खरोस के साथ चंद मिनटों में ऊपरी शिरा तक पहुँच जाता है. इन्हीं झुंडों में कुछ बच्चे ऐसे होते हैं, जो सीढ़ियों को गिनते हुए ऊपर चढ़ते हैं. परंतु सबों को इस बात का मलाल रह जाता है कि, उन्हें इसकी महत्ता का पता नहीं चल पाया. साथ आये शिक्षक घूम रहे लोगों से पूछकर, बच्चों को अपनी अधूरी जानकारी देने का प्रयास करते हैं, अधूरा ज्ञान लेकर सारे विद्यार्थी मायूस होकर बस में बैठकर गंतव्य की ओर प्रस्थान कर जाते हैं.
गोलघर की स्थिति और पटना का नज़ारा
ऊपर लिखे शुरुआती पंक्ति तक ही गोलघर की बदहाली सिमट कर नहीं रह गई है. दूर से ही यह ऐतिहासिक भवन बदरंग दिखता है. जितना इसके करीब आते जायेंगे, बदहाली का मंज़र उतना ही स्पष्ट तरीके से सामने दिखता जायेगा. गोलघर के आहते के अंदर प्रवेश करते ही सबसे पहले टूटे इमारतों के ढ़ेर मिलेंगें. गोलघर के ऊपर जाने के लिए 144 सीढ़ी से, कांउंट डाउन करते हुए, जैसे ही आप 130 तक पहुँचेंगे, टूटकर जर्जर हो चुके सीढ़ियों को देखने के चक्कर में, यकीन मानिए आप गिनती गिनना भूल जायेंगे. कुछ और ऊपर जायेंगें तो लगातार टूटी सीढ़ियों के साथ, चढ़ने में सहायता के लिए दीवार में लगे पाईप भी गायब मिलेंगें. गोलाकार ढ़ाचें के बाहरी आवरण पर भी सैंकडों की तादाद में पड़ा बड़ा दरार, बिना किसी चश्में के आसानी से दिख जायेगा. गंभीरता से सोचने पर गुस्सा भी आयेगा. परंतु अगले ही पल बाहरी आवरण के ऊपर दर्जनों आशिकों द्वारा, दिल की नक्काशी के ऊपर महबूबाओं के कई नाम उकेरे मिल जायेंगे. अब आशिकों की ये सब बाजीगरी देखकर गुस्सैल स्वभाव बदलकर नॉरमल हो जायेगा. इन्हीं सब से गुज़रते हुए 10 से 15 मिनट में आप नीचे से टॉप पर पहुँच जायेंगे. टॉप पर पहुँचने पर उत्तर की ओर गंगा का मनोरम दृश्य दिखेगा. पूर्व की ओर कलक्टर आवास के साथ दूर-दूर तक फैले पूर्वी पटना का नज़ारा दिखेगा. दक्षिण की ओर दादी जी टेंपल और वृहद पटना के साथ पश्चिम दिशा में दूर-दूर तक पुन: कंक्रीट का महल दिखेगा. गलती से आपका ध्यान जैसे ही दक्षिण दिशा में नीचे की तरफ जायेगा. बाहरी आवरण पर जमाने पहले चढ़ाई गई सीमेंट की परत हटा मिलेगा, ऊपर से उसपर पर पान और गुटखे की लाली से टूट चुका हिस्सा लहु-लुहान दिखेगा. ऊपर की केन्द्रबिंदु, जिससे अनाज को गोलघर में गिराया जाता था, उसमें भी बड़ा गड्ढ़ा दिखेगा. बारिश होने के साथ ही, पानी गड्ढ़े में संग्रहित हो जाता है. यह पानी गोलघर की प्यास बुझाये या न बुझाये, परंतु सोलह आने में बारह आना जरूर सच है कि गोलघर के ढ़ाँचे को जमे पानी से नुकसान होता ही होगा. गोलघर के ऊपर से पटना दर्शन के बाद उतरते समय बेहतर सीढ़ी मिलेंगें. लेकिन सुरक्षा वॉल के ऊपरी हिस्सा जर्ज़र हालत में है. मानो मरनासन्न की अवस्था में सिपाही लोगों की रक्षा कर रहा हो.
सूर्यास्त के साथ ही मैदान का नज़ारा और पीपल का पेड़
सौभाग्य से अगर सूर्यास्त के बाद गोलघर से नीचें उतरने का अवसर मिले, तो पूरे भू-भाग में अंधेरे का साम्राज्य दिखेगा. मानो शक्तिमान का तमराज गिलविस, बिजली के पोल पर भेपर लाईट लगे रहते हुए, जादू से अंधेरा काय़म कर दिया हो. फिल्ड में टहल रहे लोगों का ऐहसास होगा, तो घुप्प अंधेरे में जहाँ तहाँ जमाने से छुपकर मोबईल की रौशनी में इश्क फरमाने प्रेमी युगलों की जोड़ी भी दिख जायेगी. पर चाहकर भी साधारण आदमी उसके चेहरे को देख नहीं देख पायेगा. गोलघर के चारों ओर परिक्रमा करने के दौरान उत्तर दिशा के गेट के ऊपर कुछ लटका हुआ दिखाई पड़ेगा. मोबाईल का टॉर्च या कैमरे की फ्लैस जलाने से सूखे बाहरी आवरण पर उग आये हरा-भरा पीपल का पेड़ दिखेगा. मानो पीपल के छोटे वृक्ष की हरियाली बनाये रखने के लिए ही इन्द्र भगवान आसमान से सीधे बारिश करते हों. और हम आदमी ऊपर से थूककर रियल लाइफ में उसे जिंदा रखने का प्रयास करते हैं.
गोलघर की स्थिति और खरी बात
गोलघर कैम्पस में तीन घंटे तक भ्रमण करने के दौरान ऐहसास हुआ कि, आज जहाँ लोग टहल रहें हैं वहाँ कभी कोई भवन हुआ करता था. जिसमें तीन- चार वर्ष पूर्व तक सरकारी स्कूल चलाता था. गोलघर के मुख्य गेट को बंद कर रहे निजी सुरक्षाकर्मी से स्कूल के विषय में पूछा. बिना देर लगाये उसने कहा, आप जिसपर खड़े हैं वो और आपके बगल पड़ा मलबा, उसी स्कूल की इमारत का है. अब यहाँ सुन्दर पार्क बनेगा. फिर मैंने पूछा पट्टी कहां गई. उसने कहा कब से ही गायब है. अब तीसरा प्रश्न पूछा- सीढ़ी टूटी हुई है, कभी काम लगाया गया आपको कुछ पता है. गार्ड ने कहा गोलघर के अंदर अभी मरम्मत का काम चल रहा है. एक- डेढ़ साल में सब पूरा हो जायेगा. अब सवाल यह है कि अगले कुछ सालों तक दरार और पानी सोखकर इस ऐतिहासिक इमारत को कमज़ोर करता रहेगा. लोग अंधेरे में टहलने को यूँ ही मजबूर रहेंगे. इश्कजादे यूँ ही मोबाईल टॉर्च की रोशनी में इश्क फरमायेंगे, पीपल का पेड़ यूँ ही 226 वर्ष पुराने इमारत को नुकसान पहुँचाता रहेगा. शौचालय के अभाव में दोनों जेंडरों को कब तक खुले आसमां के नीचे ओंट का सहारा लेना पड़ेगा. क्या वाकई हम विकास के चकाचौंध में, इतने आगे पहुँच गये हैं कि, अब हम इन सब पर सोचना छोड़ दें!
राजधानी स्थित गोलघर पराधीनता के समय में लोगो की भूख मिटाता रहा. आज वही गोलघर ऐतिहासिक महत्व रखते हुए भी, अपनी उपयोगिता खोने के बाद, मरम्मत की बाट जोह रहा है.
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