बाज़ार में नई-नई टेक्नोलॉजी ने अपनी पैठ इस तरह से बनाई है कि इसके प्रभाव की कल्पना भी करना मुश्किल है। आप भी इस तरह की वस्तुओं के उपयोग से भली-भांति परीचित होंगें। जीवन जीने के ढ़ंग आज से जो 10 साल पहले थे वो आज बिल्कुल बदल गए हैं। अब तो ऐसा लगता है कि इन चीज़ों के बग़ैर हम एक कदम भी नहीं बढ़ सकते। मोबाईल, इन्टरनेट, कम्प्युटर आदि ने तो हमारे काम करने के तरीकों में क्रांति ही पैदा कर दी है। आने वाले युग की तस्वीर कैसी होगी?
इसकी कल्पना करें तो यह महसूस होता है कि आने वाले समय में केवल मशीन ही हमारे जीवन को चलाएँगी। बुढ़े, मर्द, औरत और हर उम्र के बच्चों में इसके प्रभाव साफ दिखते हैं। पर यह भी बात सच है कि आवश्यक्ता के अनुसार ही चीज़ों का अविष्कार किया जाता है। पर क्या ये चीजें अब भी वैसा सुख देती हैं जो हमारे बड़ों ने महसूस किया है?
यदि हम थोड़ा इस परिदृश्य से अलग हट कर देखें तो इंसान अपने मन की शांति के लिए अपने आप को धार्मिक गतिविधियों में लगा कर ही मन के सुख प्राप्त करते है। पारिवारिक तथा सामाजिक रीति-रिवाज़ों के अंदर अपने आप को शांत करने की कोशिश करता था।
दोस्तों के साथ बैठना उनसे हंसी मज़ाक करना, मां के हाथों का स्पर्श, पिता के सामने आदर से खड़ा होना उन्हें अपनेपन का ऐहसास और अधिकार को जताना ये सब स्क्रीन में कहां सुख मिलता है। परिवारिक लोभ में बंध कर जीवनयापन एक सुखद आनंद देता है। क्या ये सुख हम इन भौतिक संसाधनों से प्राप्त कर सकते है ? क्या स्क्रीन के पीछे इन सारे रिश्तों के आंनद किया जा सकता है?
पर दूसरी तरफ यह हमारी ज़रूरत भी है क्योंकि विकास का दूसरा नाम आज टेकनोलॉजी में समृद्ध होना है। इस सिक्के के भी दो पहलू हैं एक अच्छा तो दूसरा बुरा। भौतिक जीवन में इन चीज़ों ने हमारे व्यक्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है? यहां पर स्थिति ऐसी है कि एक तो इसांन होने के स्पर्श का आनंद तथा दूसरी ओर इन टेक्नोलॉजी के बीच में अपने आप को संतुलित करना यह आज बहुत महत्वपूर्ण हो गया है कि हम अपने आप को इन चीज़ो का गुलाम और आदी ना बना कर दोनों में सामंजस्य बिठाएं तभी मानवीय संवेदनाओं के साथ साथ तकनीक का भी बेहतर उपयोग हो पाएगा।
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