| पटना विश्वविद्यालय |
पटना विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ चुनाव की तारीख घोषित कर दी है। वह दिन 11 दिसंबर है। जब पटना विश्वविघालय के छात्रसंघ 29 वर्षों से मृत पड़ी छात्र राजनीति को दोबारा जीवित करेंगे। लोकतंत्र की सेमनरी में छात्र राजनीति के स्वर एक बार फिर गुजेंगे। छात्रसंघ को यह उपलब्धि लंबे संघर्ष के बाद प्राप्त होइ है। बिहार के छात्र इसके लिये विश्वविद्यालय से लेकर राजभवन और मुख्यमंत्री आवास तक अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं। इनकी आवाज को विश्वविद्यालय प्रशासन, राजभवन और पिछली सरकार अनसुनी या नकारती रही है। वर्तमान मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री बधाई के पात्र हैं। उन्होंने इस दिशा में पहल की है। वहीं पटना विश्वविद्यालय के कुलपति भी पहल करने के लिये बधाई योग्य हैं।
बिहार में 14 विश्वविद्यालय राज्यशासित हैं। दो केन्द्रीय विश्वविद्यालय केन्द्र सरकार ने बिहार की झोली में दिये हैं, इन में एक में सत्र प्रारंभ है। इसके अतिरिक्त एक और केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार को मिला है। केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रशासन अभी भी निंद्रा से जागे नहीं हैं।
बिहार ने विश्व को लोकतंत्र की सीख दी है। इस राज्य का जिला वैशाली का ‘वज्जि महासंघ’ अपने गणतंत्रीय संविधान के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यहां विश्व की पहली लोकशाही स्थापित थी। बिहार में लोकतंत्र के मजबूत होने का यही एक प्रमाण नहीं है। 1974-75 में भारतीय लोकतंत्र पर आपातकाल के बादल मंडरा रहे थे। इन्ही वर्षों में जयप्रकाश नारायण के कुशल नेतृत्व में बिहार से भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा दी थी। इस आंदोलन से निकले छात्र नेता आज के केन्द्रीय राजनीति की ऊचाईंयों को छू रहे हैं वहीं राज्य राजनीति में राज्य के मुखिया भी हैं। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, विपक्षी पार्टी के नेता छात्र राजनीति से उभरे नेता हैं। इतिहास के गर्भ में दूसरे राज्यो से हम आगे हैं।
वर्तमान में हमारे सामने कई प्रश्न हैं। बिहार की शिक्षा व्यवस्था अपने निचले पायदान पर है। विश्वविद्यालय में आधारभूत संरचना ढह चुकी है। पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज, बीएन कॉलेज, साइंस कॉलेज समेत अन्य कॉलेजों के भवन जर्जर अवस्था में जा चुके हैं। बरसात का पानी इन भवनों को एक प्रीमियर कॉलेज योग्य नहीं रहने देता है। शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मियों के पद खाली हैं। राज्य में उच्च शिक्षा के मद में 300 करोड़ रुपये में 250 करोड़ रुपये वेतन और पेंशन में खर्च हो रहे हैं। कैम्पस में शैक्षणिक माहौल नहीं है। शिक्षक अपने स्वार्थ की राजनीति में उलझे नजर आते हैं। यही हाल प्रशासन का है। क्या-ये मुद्दे छात्र राजनीति के चुनावी मुद्दे बनेंगें ? इनका समाधान छात्रसंघ करा पाने में सफल होगा। ये आने वाला समय उतर देगा। छात्र राजनीति कितनी खड़ी उतरेगी- छात्र समुदाय के लिये एक यह अवसर भर है।
शिक्षा का उद्देश्य सरल भाषा में एक सफल छात्र समाज को उपलब्ध कराना है। ये सफल छात्र किताब पढ़कर और लेक्चर सुनकर समाज को नहीं मिल सकते हैं। छात्रों को अपने सरोकार के साथ सामाजिक सरोकार के लिये प्रयत्नशील होना होगा। जो अभिभावक छात्रों को सिर्फ पढ़ाई पर फोकस करने की बात करते है। वह विशेष छात्र और विशेष समाज की परिकल्पना में जीते हैं। जो समाजिक समानता से उन्हें दूर ले जाती है। छात्रों की शिक्षा का मूल्य मानवीय समाज की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान प्राप्त करना है यह तभी संभव है- जब छात्र, समाज और समस्याओं को एक साथ देखना और समझना सीखेंगे।
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