हाल ही में कुछ अख़बारों में ख़बर छपी कि पटना में रियल इस्टेट और जमीन की कीमतें नोएडा और दिल्ली जैसे महानगकरों से होड़ कर रहीं हैं. पढ़कर एक साथ दुख भी हुआ और आश्चर्य भी. दुख इसलिए कि पूरे देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले बिहार की राजधानी में गरीबों और छोटे रोजगार से जुड़े तबकों के लिए आशियाना ढ़ूंढ़ना मुश्किल होने वाला है. उल्लेखनीय है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय 13663 रू है जोकि देश की 37,731 के अनुपात मे बहुत ही कम है. और आश्चर्य इसलिए क्योंकि बुनियादी सुविधाओं के लिहाज से पिछड़े शहरों में गिने जाने वाले पटना में आशियाने की आसमान छूती कीमतों की वजह एकाएक समझ में नहीं आई.
दिमाग पर जोर डाला तो उन बातों की ओर ध्यान गया जिन्हें अक्सर जानकर भी अनदेखा कर दिया जाता है. लेकिन जिसपर सचमुच काम करने की जरूरत है. और वो भी जल्दी से जल्दी. सरसरी तौर पर देखें तो पूरे राज्य में शिक्षा का एक ही मजबूत केन्द्र है- पटना. और उपमुख्यमंत्री और वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी मानते हैं कि राज्य में व्यापार का 3 चौथाई राजस्व अकेले पटना से आता है. यानी व्यापार और शिक्षा, जिन्हें आधुनिक समाज में प्रगति का मुख्य साधन माना जाता है, का केन्द्र है – पटना. ऐसे में, पटना के अलावा अन्य क्षेत्रों को भी शिक्षा या व्यापार के केन्द्र के रूप में विकसित करने की जरूरत है. पर चिंता की बात यह है कि इस दिशा में कोई अभी तक कोई पहल नहीं हुई है.
पटना में एक के बाद एक शिक्षा के उच्चस्तरीय संस्थान खोले गए- IIT, NIFT, BIT, Chankya Law University, Chandragupta School of Management. कोचिंग की तादाद तो पहले भी काफी थी- वो भी प्रोत्साहन का खाद-पानी पाकर खूब बढ़े. जबकि राज्य के दूसरे शिक्षा केंद्रों जैसे भागलपुर, दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर आदि में एक भी उच्च स्तरीय संस्थान खोलने की जहमत नही उठाई गई. परिणाम यह हुआ है कि बेहतर शिक्षा और तैयारी की आस में छात्र सीधे पटना का रुख कर रहे हैं. छात्रो के पास विकल्प ही नहीं है. मकान किराये में मनमानी वृद्धि के कारण छात्र त्रस्त हैं. रहने को जगह नही मिल रही है तो एक 10*8 के कमरे में तीन- तीन छात्र कैसे रहते हैं – इस अमानवीय स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. छात्राओं की हालात तो और बदतर है.
राज्य में पिछले कुछ वर्षों में जो भी निवेश हुआ है उसका बड़ा हिस्सा पटना को ही मिला है. इस वजह से पटना एक हॉट स्पॉट के रुप में उभरा है. मीडिया में भी पटना के विकास पर खूब लिखा गया है. पर विडंबना तो देखिए कि जिस शहर में हरेक साल करीब 50 हजार नए वाहन सड़कों पर आ जाते हैं, वहां पांच लोगों की घर के जगह 200 लोग रहने लगे हैं. हर साल यहां की आबादी में 30 से 35 हजार छात्र जुड़ जाते हैं. इस सबसे शहर पर जो बेवजह का बोझ पड़ता है, उसकी परिणीति कचरे, प्रदूषण और नागरिक सुविधाओं पर बढ़ते खर्च के रुप में होती है. आखिर 15-20 वर्ग किलोमीटर में फैला शहर और कितना फैलेगा, कितना बोझ सह पायेगा? क्या समेकित विकास के लक्ष्य को केवल दो तीन जिलों के विकास से प्राप्त किया जा सकता है? जरूरत यह सोचने की है कि दूसरे जिलों में भी पटना जैसा आकर्षण कैसे पैदा करें.
जरूरत है एक मजबूत राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की- जिससे समेकित विकास की बाधाओं को दूर किया जा सकता है. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने इस विषय मे PURA Model की वकालत की है जिसमें छोटे छोटे गांवो को एक कल्स्टर के रुप में खास उत्पाद या सेवा के लिये विशेष रुप से विकसित किया जा सकता है.राज्य मे ऐसे कई क्षेत्र हैं जिन्हें खास उत्पादन-हबों के रुप में ढ़ाला जा सकता है. हमारे सामने थाईलैंड और फिलीपींस का उदाहरण है जहां गांवो के कुशल कामगारों को शहरों से जोड़ कर समेकित विकास के नारे को हकीकत की जमीन पर उतारा गया है.
वास्तव में, विकास का विकेन्द्रीकरण ही एकमात्र दूरदर्शी उपाय है, जिसे ईमानदारी से अमल में लाया जाय तो आने वाले समय मे समाज की विषमताओं को रोका जा सकता है. वरना आज आशियाने की तेजी से भागती कीमतों वाले शहर अपने मूल स्वरूप से इस कदर भटक जाएंगे कि इन्हें पहचानना भी मुश्किल हो जायेगा.
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