जल संकट से
जुड़्ने लगी है बिहार की धरती
आज विश्व की लगभग
60 करोड़ आबादी जल संकट का सामना कर रही है. अदूरदर्शी आर्थिक विकास, बढती
जनसंख्या, औघोगिकीकरण, शहरीकरण और हरित क्रान्ति के साइड इफ़ेक्ट की वजह से भारत
में भी जल संकट व जल प्रदुषण निरंतर बढ्ता जा रहा है. सर्वेक्षण बताते है कि पेय
योग्य 2% जल का 70% भाग दूषित हो गया है और अधिकतर क्षेत्रों में भूगर्भ जल का
स्तर 7 से 10 फ़ीट प्रतिवर्ष निचे जा रहा है. इस आकड़े मे बिहार की भी वैसी ही
भागीदारी है. इसलिए स्वच्छ पेयजल प्रबंधन और भूगर्भ जल का संरक्षण 21 वीं सदी के
बिहार की वास्तविक चुनौती है.
प्रांत के कई
जिले जल संरक्षण की ओर से निश्चिंत दिखायी देते हैं- खासकर उत्तरी बिहार के
क्षेत्र. जबकि वास्तविक स्थिति ठीक इसके उलट है. कभी समस्तीपुर जिले में जल की
समस्या ना के बराबर थी, पर आज वहाँ भूगर्भ जल-स्तर काफ़ी नीचे चला गया है. तलाब व
पोखर सूख चुके हैं. कुल 37462 में से लगभग 10000 चापाकल बेकार पड़े हैं. उल्लेखनीय
है कि समस्तीपुर पुरे प्रांत में बड़े पैमाने पर सब्जी उत्पादन के लिये जाना जाता
है. अब जबकि पानी की कमी हो रही है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पह्चान कब तक
कायम रह पायेगी.
लोक स्वास्थय
अभियंत्रण विभाग, भागलपुर का एक माह का आँकड़ा बताता है कि शहर के उत्तरी क्षेत्र
में जल्स्तर 10 से 15 फ़ीट नीचे चला गया है, जबकि दक्षिणी क्षेत्र में 70 से 75 फ़ीट
नीचे. और तो और, जल संकट से जूझ रहे शहर में एक भी तालाब नही है और ना ही कोई
तकनीक इजाद की गई है. हाँ, हाल के वर्षों में सरकारी बोरिंग की व्यवस्था कुछ जगहों
पर की जा रही है. कमोबेश यही हाल बाढ़ की नगरी कहे जाने वाले जिले खगड़िया की भी है
जहाँ लोग पानी में आरयन, आर्सेनिक, व नाइट्रेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने से
परेशान हैं. दूसरे जिलों की अपेक्षा खगड़िया मे कुंए और तालाबों की संख्या काफ़ी
अधिक थी, पर आज इन्हें पाटकर बहुमंजिली इमारतें खड़ी की जा रही हैं. जल प्रदूषण से बचाव
की दिशा में स्वंयसेवी संस्था ‘समता’के द्वारा ‘मटका फ़िल्टर’ विधि और ‘मेघ पाईन’
अभियान चलाया जा रहा है.
वास्तव में, 2008
में आई भयानक कोशी आपदा (बाढ़) ने प्रभावित जिलों जैसे मधेपुरा, अररिया, सुपौल,
सहरसा आदि के भूगर्भ जल की पारिस्थितिकी में बड़ा परिवर्तन ला दिया है. पेट और
त्वचा से संबंधित रोगों का प्रसार तेजी से हुआ है. साथ हीं, कई चापाकल भी जल स्तर
नीचे जाने की वजह से सूखने लगे हैं.
विशेषग्य बताते
हैं कि नदी, तालाब व कुंए को बचाने से हीं जल संरक्षण की कल्पना को हकीकत की जमीन
पर उतारा जा सकता है. इस्तेमाल लायक पानी के लिये वाटर हार्वेस्टिंग जरुरी है.
राज्य में जल संचय के पुराने तरीके व विधियों को अपनाने की योजना पर काम चल रहा
है. राज्य के 17 जिलों के करीब 1635 आहर-पाईन को फिर से जीवित करने की योजना बनाई
गई है. इसके अलावा, 23 जिलों में रुफ टाउप रैन वाटर हार्वेस्टिंग की योजना स्वीकृत
की गयी है. मगर इन योजनाओं पर हो रहा काम बहुत धीमा है.
राज्य सरकार ने
बिहार भूगर्भ जल अधिनियम 2006 बनाया जिसपर राज्यपाल की मुहर 2007 में लगी. इसके
तहत भूगर्भ जल प्राधिकरण का गठन कर बड़े पैमाने पर नल्कूप व कुंए खोदने की बात कही
गई है. परंतु जमीनी स्तर पर इसका कहीं कोई असर नही दिखता क्योंकि इस कानून को अबतक
लागू ही नही किया जा सका है. बावजूद इसके, कहीं कहीं उम्मीद की किरण दिख जाती है.
जैसेकि पुर्णिंया जिले में रैन वाटर हार्वेस्टिंग योजना के तहत काम हो रहा है.
अन्य उपायों मे बागमती बहुघेशीय परियोजना व मोकामा टाल क्षेत्र में पानी के आर्थिक
विकास के लिए उपयोग शामिल है. परंतु सबसे ज्यादा जरुरी है – जल संरक्षण की योजनाओं
पर ईमानदारी से कार्य करना, जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना, जल संरक्षण के लिये
जन-मानस को पानी के महत्व से अवगत व जागरुक करना. इन उपायों को अपनाए बिना जल
संरक्षण दूर की कौड़ी है.