गोलघर का इतिहास
| बदरंग होता गोलघर |
अंग्रेजी हुकूमत ने सन् 1770 के भीषण अकाल में लोगों को भूख से तड़पकर दम तोड़ते हुए देखा. उसे दया आयी और तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज के निर्देश पर, कैप्टन जॉन गार्स्टिन ने अपनी देख-रेख में पटना के अशोक राजपथ के निकट, अनाज जमा करने के लिए एक (125 x 29 मी0) गोलाकार गोदाम बनवाया. सन् 1786 में गोदाम बनकर तैयार हुआ. गोलाकार भवन होने की वजह से इसे गोलघर के नाम से प्रसिद्धि मिली. एक लाख चालीस हजार टन क्षमता वाले, इस गोदाम की स्थापना के सौ वर्षों से भी ज्यादा समय तक, अंग्रेजी सरकार अकाल और सूखे के दौरान लोगों को इससे अनाज उपलब्ध कराती रही. आज़ादी के बाद प्रदेश में अनाज भंडारण के लिए समुचित प्रबंध किये गये. बीतते वक्त के साथ, गोदाम के रूप में गोलघर की उपयोगिता ख़त्म हो गई. पहले जहाँ गोलघर पर चढ़ने की इज़ाजत आम भारतीय को नहीं थी, अब साधारण लोग गोलघर पर चढ़कर पटना को देखने लगे. भाई लोग गोल घर से चढ़कर देखे भी क्यों न, उस पर से उत्तर में गंगा का मनोरम दृश्य देखने के साथ ही पूरे पटना को देखा जा सकता है.
पर्यटन स्थल और पिकनिक स्पॉट बनता गोलघर
गोलघर के महत्व को पाठ्यक्रम में शामिल करने के बाद, प्रदेश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों से लोग आकर इसे देखने लगे. धीरे- धीरे गोलघर पर्यटन स्थल और पिकनीक स्पॉट में तब्दील हो गया. आज भी किसी रैली में शामिल होने के लिए पटना आये लोग, दूसरे जिलों से डॉक्टरी सलाह लेने आये लोग, परीक्षा देने आये परिक्षार्थियों की भी चाहत, एक बार गोल घर देखने की होती है. इन सबों के साथ गोलघर आम शहरी को भी आकर्षित कर रहा है. इसके अलावा अब मुख्यमंत्री शैक्षणिक परिभ्रमण योजना के अंतर्गत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी गोलघर को दिखाकर, इसके इतिहास को बताया जा रहा है. पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कई लोगों ने इसके ईर्द- गिर्द अस्थाई दुकान खोल लिए. अपनी स्थापना के 226 वर्षों के बाद, आज वही गोलघर, कईयों के घर चलाने की उम्मीद बन बैठा. तो इसकी ही वजह से राजेश एवं सुधांसु जी जैसे कई व्यक्तियों के खाली हाथों को रोज़गार मिल गया.
उत्साहित छात्रों की मायूसी
इन सब खूबियों के बावजूद, आज गोलघर सात सालों से भी अधिक समय से मरम्मत की बाट जोह रहा है. सालों से इसके ऐतिहासिक महत्व को बताने वाली पट्टी (बोर्ड) गायब है. वहीं न ही यहाँ, आने वाले पर्यटकों को जानकारी देने के लिए किसी गाईड का इंतज़ाम है. मुख्यमंत्री शैक्षणिक परिभ्रमण योजना के अंतर्गत स्कूली छात्रों का समूह आता है, गोलघर को नीचे से उपर निहारते हुए, पहले कौन चढ़े की बाजी लगाकर जोश- खरोस के साथ चंद मिनटों में ऊपरी शिरा तक पहुँच जाता है. इन्हीं झुंडों में कुछ बच्चे ऐसे होते हैं, जो सीढ़ियों को गिनते हुए ऊपर चढ़ते हैं. परंतु सबों को इस बात का मलाल रह जाता है कि, उन्हें इसकी महत्ता का पता नहीं चल पाया. साथ आये शिक्षक घूम रहे लोगों से पूछकर, बच्चों को अपनी अधूरी जानकारी देने का प्रयास करते हैं, अधूरा ज्ञान लेकर सारे विद्यार्थी मायूस होकर बस में बैठकर गंतव्य की ओर प्रस्थान कर जाते हैं.
गोलघर की स्थिति और पटना का नज़ारा
ऊपर लिखे शुरुआती पंक्ति तक ही गोलघर की बदहाली सिमट कर नहीं रह गई है. दूर से ही यह ऐतिहासिक भवन बदरंग दिखता है. जितना इसके करीब आते जायेंगे, बदहाली का मंज़र उतना ही स्पष्ट तरीके से सामने दिखता जायेगा. गोलघर के आहते के अंदर प्रवेश करते ही सबसे पहले टूटे इमारतों के ढ़ेर मिलेंगें. गोलघर के ऊपर जाने के लिए 144 सीढ़ी से, कांउंट डाउन करते हुए, जैसे ही आप 130 तक पहुँचेंगे, टूटकर जर्जर हो चुके सीढ़ियों को देखने के चक्कर में, यकीन मानिए आप गिनती गिनना भूल जायेंगे. कुछ और ऊपर जायेंगें तो लगातार टूटी सीढ़ियों के साथ, चढ़ने में सहायता के लिए दीवार में लगे पाईप भी गायब मिलेंगें. गोलाकार ढ़ाचें के बाहरी आवरण पर भी सैंकडों की तादाद में पड़ा बड़ा दरार, बिना किसी चश्में के आसानी से दिख जायेगा. गंभीरता से सोचने पर गुस्सा भी आयेगा. परंतु अगले ही पल बाहरी आवरण के ऊपर दर्जनों आशिकों द्वारा, दिल की नक्काशी के ऊपर महबूबाओं के कई नाम उकेरे मिल जायेंगे. अब आशिकों की ये सब बाजीगरी देखकर गुस्सैल स्वभाव बदलकर नॉरमल हो जायेगा. इन्हीं सब से गुज़रते हुए 10 से 15 मिनट में आप नीचे से टॉप पर पहुँच जायेंगे. टॉप पर पहुँचने पर उत्तर की ओर गंगा का मनोरम दृश्य दिखेगा. पूर्व की ओर कलक्टर आवास के साथ दूर-दूर तक फैले पूर्वी पटना का नज़ारा दिखेगा. दक्षिण की ओर दादी जी टेंपल और वृहद पटना के साथ पश्चिम दिशा में दूर-दूर तक पुन: कंक्रीट का महल दिखेगा. गलती से आपका ध्यान जैसे ही दक्षिण दिशा में नीचे की तरफ जायेगा. बाहरी आवरण पर जमाने पहले चढ़ाई गई सीमेंट की परत हटा मिलेगा, ऊपर से उसपर पर पान और गुटखे की लाली से टूट चुका हिस्सा लहु-लुहान दिखेगा. ऊपर की केन्द्रबिंदु, जिससे अनाज को गोलघर में गिराया जाता था, उसमें भी बड़ा गड्ढ़ा दिखेगा. बारिश होने के साथ ही, पानी गड्ढ़े में संग्रहित हो जाता है. यह पानी गोलघर की प्यास बुझाये या न बुझाये, परंतु सोलह आने में बारह आना जरूर सच है कि गोलघर के ढ़ाँचे को जमे पानी से नुकसान होता ही होगा. गोलघर के ऊपर से पटना दर्शन के बाद उतरते समय बेहतर सीढ़ी मिलेंगें. लेकिन सुरक्षा वॉल के ऊपरी हिस्सा जर्ज़र हालत में है. मानो मरनासन्न की अवस्था में सिपाही लोगों की रक्षा कर रहा हो.
सूर्यास्त के साथ ही मैदान का नज़ारा और पीपल का पेड़
सौभाग्य से अगर सूर्यास्त के बाद गोलघर से नीचें उतरने का अवसर मिले, तो पूरे भू-भाग में अंधेरे का साम्राज्य दिखेगा. मानो शक्तिमान का तमराज गिलविस, बिजली के पोल पर भेपर लाईट लगे रहते हुए, जादू से अंधेरा काय़म कर दिया हो. फिल्ड में टहल रहे लोगों का ऐहसास होगा, तो घुप्प अंधेरे में जहाँ तहाँ जमाने से छुपकर मोबईल की रौशनी में इश्क फरमाने प्रेमी युगलों की जोड़ी भी दिख जायेगी. पर चाहकर भी साधारण आदमी उसके चेहरे को देख नहीं देख पायेगा. गोलघर के चारों ओर परिक्रमा करने के दौरान उत्तर दिशा के गेट के ऊपर कुछ लटका हुआ दिखाई पड़ेगा. मोबाईल का टॉर्च या कैमरे की फ्लैस जलाने से सूखे बाहरी आवरण पर उग आये हरा-भरा पीपल का पेड़ दिखेगा. मानो पीपल के छोटे वृक्ष की हरियाली बनाये रखने के लिए ही इन्द्र भगवान आसमान से सीधे बारिश करते हों. और हम आदमी ऊपर से थूककर रियल लाइफ में उसे जिंदा रखने का प्रयास करते हैं.
गोलघर की स्थिति और खरी बात
गोलघर कैम्पस में तीन घंटे तक भ्रमण करने के दौरान ऐहसास हुआ कि, आज जहाँ लोग टहल रहें हैं वहाँ कभी कोई भवन हुआ करता था. जिसमें तीन- चार वर्ष पूर्व तक सरकारी स्कूल चलाता था. गोलघर के मुख्य गेट को बंद कर रहे निजी सुरक्षाकर्मी से स्कूल के विषय में पूछा. बिना देर लगाये उसने कहा, आप जिसपर खड़े हैं वो और आपके बगल पड़ा मलबा, उसी स्कूल की इमारत का है. अब यहाँ सुन्दर पार्क बनेगा. फिर मैंने पूछा पट्टी कहां गई. उसने कहा कब से ही गायब है. अब तीसरा प्रश्न पूछा- सीढ़ी टूटी हुई है, कभी काम लगाया गया आपको कुछ पता है. गार्ड ने कहा गोलघर के अंदर अभी मरम्मत का काम चल रहा है. एक- डेढ़ साल में सब पूरा हो जायेगा. अब सवाल यह है कि अगले कुछ सालों तक दरार और पानी सोखकर इस ऐतिहासिक इमारत को कमज़ोर करता रहेगा. लोग अंधेरे में टहलने को यूँ ही मजबूर रहेंगे. इश्कजादे यूँ ही मोबाईल टॉर्च की रोशनी में इश्क फरमायेंगे, पीपल का पेड़ यूँ ही 226 वर्ष पुराने इमारत को नुकसान पहुँचाता रहेगा. शौचालय के अभाव में दोनों जेंडरों को कब तक खुले आसमां के नीचे ओंट का सहारा लेना पड़ेगा. क्या वाकई हम विकास के चकाचौंध में, इतने आगे पहुँच गये हैं कि, अब हम इन सब पर सोचना छोड़ दें!
राजधानी स्थित गोलघर पराधीनता के समय में लोगो की भूख मिटाता रहा. आज वही गोलघर ऐतिहासिक महत्व रखते हुए भी, अपनी उपयोगिता खोने के बाद, मरम्मत की बाट जोह रहा है.
सोंचना क्या है!
ReplyDeleteमत सोंच भाई तेरे बदले मैं सोंच लेता हूँ.
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