Saturday, December 1, 2012

रावण के नौ सिरों का उसे आग देने वाले वंशजों ने घोटाला कर दिया


साल 2012 के विजयादशमी के दिन पटना के गांधी-मैदान में होनेवाले रावण-वध के कार्यक्रम को देखने हम सपरिवार और गांव से आये कुछ पड़ोसी परिवारों के साथ शाम के चार बजे गाँधी मैदान पहुंचे। पटना में रहने के बावजुद ठीक 20 वर्ष बाद इस कार्यक्रम को देखने का संयोग बन सका।
मैदान में दाखिल होने के समय ही ट्विन टावर के सामने वाले गेट पर भीड़ का सामना करना पड़ रहा था। मैने अपने साथ के परिजनों से उसी समय यह कह दिया की कार्यक्रम समाप्त होने के एक घंटे के बाद ही बाहर निकलना सुविधाजनक रहेगा।
खैर! किसी तरह चीनी पोलिथीन शीट बिछाने की जगह मैदान के बीच में मिल पायी, तो वहीं पर सभी महिलाओं को बाल-बच्चे समेत स्थिर से रहने का निर्देश दे, चीनियाबेदाम देकर निकल पड़ा मुआयना करने।

अरे! यह क्या! रावण कौन है, सभी के एक ही सिर है।
पास खड़े बुजुर्ग दर्शक से पुछा तो उन्होने बजाए यह बताने के, कि रावण कौन है, यह बताया कि घोटाले के इस माहौल में रावण के नौ सिरों का भी घोटाला हो गया तो कौन सी बड़ी बात हो गयी। उनके साथी ने टिप्पणी की – रावण को आग देने वालो ने रावण के वंशज होने का सबुत दे दिया है। रावण के नौ सिर भी गायब है और प्रशासन द्वारा बनाया जाने वाला दर्शक-दीर्घा आबादी और आगन्तुकों के अनुपात में बढ़ने के बजाए साल दर साल छोटा ही होता जा रहा है। लोगों ने रावण का वंशज होने का फर्ज निभाया है, वह उतनी राक्षसता न सही - घोटाला तो कर ही सकता है।


छठ के दिन जो कलेक्टेरियट घाट पर हुआ, रावण-वध के दिन उसे मै गांधी मैदान में झेल आया हुं।
रावण-दहन के तीस मिनट बीतते-बीतते मेरे साथ की महिलाओं-बच्चों का धैर्य जवाब दे चुका था और वे वहां उपलब्ध पावभाजी से लेकर आइसक्रीम तक सबकुछ चख चुके थे। मुझे उनकी बात माननी पड़ी और बाहर निकल रही भीड़ के साथ हो लेना पड़ा, उसी गेट की ओर जिससे होकर आया था।
रावण दहन के दस मिनट के अंदर भीड़ के दबाव के आगे प्रशासन के सिपाही चाहरदिवारी पर चढ़ कर अपनी जान बचा रहे थे। मैं अपने साथ की महिलाओं को देख भी नही पा रहा था और ना उनसे बात कर पा रहा था। गेट के पचास मीटर अंदर से पचास मीटर बाहर तक भीड़ एक धीमी गति से चलने वाली आटा चक्की कि तरह मुझे और बच्चों को पिस रही थी। गेट से एक कदम बाहर आते ही भीड़ का दबाव हर व्यक्ति को सौ फीट चौड़ी सड़क के उस पार के भवन के पास तक फेंक रही थी। मेरी नजरों के सामने से मेरा एकलौता बेटा और मेरे गांववाले पडोसी का बेटा मौत के मुंह मे जाते-जाते बचा, क्योंकि दोनो बच्चे मेरे दोनो कंधो पर थे और भीड़ का असाधारण दबाव मेरे खुद के कलेजे को बाहर निकाल रहा था। बधाई देना चाहुंगा उन जमीर-विहीन समाचार माध्यमों को जो राजनेताओं की ओट मे अपनी दुकान चलाते हैं, लेकिन ये बाते उन्हे नही दिखतीं।
बिहार में छेड़खानी की वारदातें घट गयी हैं – ऐसा कहते कहते फौर्च्युनर गाड़ीयां बढ़ गयी है
जो मैने, मेरी पत्नी ने और वहां खड़े पुलिसकर्मीयों ने देखा उसे सिर्फ स्त्रियों के प्रति शारीरिक क्रुरता के दायरे मे रखा जा सकता है। मैने और मेरी पत्नी ने गिनती जरूर पढ़ी है, और ऐसी घटनाओं की संख्या अगले एक घंटे मे सिर्फ उसी गेट पर थी-पांच।
चौदह लोगों की मेरी टोली के बाकि सदस्यों का इंतजार मैं उसी सामने वाले भवन के कैम्पस में खड़े होकर करने लगा। बच्चों को एक ठेले के पीछे खड़ा कर मेरी नजरे बाकी सदस्यों को ढूंढ़ने में लग गयी। वे लोग भी भीड़ के बीच मुझे खोज रहे थे और अगले आधे घंटे में एक-एक कर मिलते गये।
गेट पार करते समय लगभग बीस साल की एक लड़की मुझसे चार-पांच व्यक्तियों से आगे चल रही थी, गेट से बाहर निकलते ही भयानक आवाज में चिल्ला उठी। अपने परिजनों को संभालने की चिंता के बीच उसकी आवाज सुनकर मैने नजर घुमायी तो कुछ लड़कों को भागते देखा। कुछ मीटर की दूरी से मेरी श्रीमतीजी ने मुझे आवाज दिया, मैने उन्हे देखा तबतक भीड़ मुझे सामने वाले भवन के पास धकेल चुकी थी। मेरी श्रीमतीजी जब मुझसे मिलीं तो बताया कि वह लड़की दर्द के मारे बेहोश हुई जा रही थी और उसके साथ आया एक पुरुष और कम उम्र की लड़की उसे टांग कर ले गये।
दस मिनट के इंतजार के बाद अपनी गांववाली पड़ोसन को ढूंढ़ने हेतु घुमने लगा तो एक बूजुर्ग महिला अपने फट चुके कानों से खुन पोंछते हुए रो-रोकर गालीयां दिए जा रही थी। किसी ने कनबाली खींच ली थी। आगे बढा तो एक मां अपनी बेटी को खरी-खोटी सुना रही थी – “कहीं कुछ हो जाता तो तुम्हारे अब्बा को क्या जवाब देते, देश भर के छोकरों को पटना में आकर *** करने की छूट है”। (हमारी 70 साल की बूढ़िया शिक्षा व्यवस्था की वजह से देश, राज्य और राज समानार्थी बने हुए हैं)
पैदल चलते इनकम टैक्स गोलम्बर तक आने के बाद ही टेम्पो मिल पाया। लेकिन पूरे रास्ते स्त्री-हिंसा में कमी के आंकड़ों पर चिन्तन चलता रहा। साथ ही स्त्री सशक्तीकरण के पश्चिम प्रायोजित विमर्श पर भी। गांधी जी के शब्द तो राजनीति की दुकान में बिकते बिकते बिकाऊ से आगे उबाऊ हो गये हैं - लेकिन इतना जरुर हो गया है कि गांधी के समय में महिलाएं इतनी सशक्त थीं कि पूरे देश का धान ढेंकी में कुट डालती थी, लेकिन आज पुरुष इतना कमजोर हो गया है कि व्यवस्था के विरुद्ध बोल भी नहीं पाता।

एक रुपये के अखबार को दस रुपये की चीन-आयातित पोलिथीन शीट ने हरा दिया


अखबार गरीबों के विकास कि चाहे जितनी चिन्ता करते हों, लेकिन स्टेशन पर गरीबों के बिछावन के तौर पर जरुर भारत-प्रसिद्ध था। सबसे कम किमत में मिलनेवाला अखबार गरीब तथा निम्न-मध्यवर्ग का चहेता इसलिए भी था क्योंकि वह थाली-प्लेट, ओढ़ना-बिछावन भी बन जाता था। पाठकों का एक वर्ग इसी बहाने अखबार खरीदता था, कुछ पन्ने बिछाता था, कुछ पन्ने पढ़ता और कुछ पर खाना खा लिया करता था।

Sunday, November 25, 2012

मध्यवर्गीय परिवार में करियर का जाल


इस आधुनिकता की दौर में बिहार के हर मध्यमवर्गीय परिवार में अपने बच्चों को इंजीनियर बनाने की ख्वाइश है वह अपने बच्चे को सिर्फ और सिर्फ इंजीनियर और डॉक्टर बनाना चाहते है। इसके लिए वह हर कष्ट को खुशी-खुशी झेलने के लिए तैयार रहते है। बच्चे भी अपने माता-पिता की बात को नाकार नहीं पाते है क्योंकि इस परिवार में बच्चों की इच्छा जानने की कोशिश नहीं की जाती है। वह अपने बच्चों को शुरूआती दौर से ही कहते रहते है- मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा। यह वाक्यंश भी समाज में देखा देखी के कारण बोलते है।

Sunday, November 18, 2012

पटेल नगर मोड़ पर लोगों को क्षतिग्रस्त चैंबर में गिरने से बचाने के दुकानदारों के द्वारा विज्ञापन बोर्ड का इस्तेमाल कुछ इस तरह किया गया.
राहगीर को क्षतिग्रस्त चैंबर में गिरने बचाने के लिए हेमा और शबाना की होर्डिंग का कुछ इस तरह इस्तेमाल किया गया.


 होर्डिंग के पीछे टूटा चैंबर और गाड़ी को बचाकर निकलता चालक

Sunday, November 4, 2012

एफडीआई और विकास का मिथक

आखिरकार केंद्र सरकार ने भारत में विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये खुदरा क्षेत्र को खोलने की मंजूरी दे ही दी। एविएशन, ऊर्जा और प्रसारण में भी एफडीआई को हरी झंडी दे दी गई है।

Thursday, November 1, 2012

आयें जाने हिंदी को ....

है प्रीत जहाँ की रीत सदा में गीत वहाँ के गाता हूँ....भारत का रहनेवाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ...
हिंदी पुरे विश्व में चायनिज के बाद दूसरी सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा हैं।
करीब 50 करोड़ लोग हिंदी को बोलते है और 80 करोड़ लोग हिंदी समझते है।
भारत के अलावा ये मॉरीसस ,गुयाना ,फिजी, सूरीनाम ,त्रिनिदाद एवं टोबैगो,नेपाल की प्रमुख भाषा हैं।
इसके अलावा ये अमेरिका ,ब्रिटेन ,जर्मनी, सिंगापुर...अन्य देशो में बोली जाती है।
भारत के अलावा अन्य देशो में रेडियो पर हिंदी सुनी जा सकती है।जो पूर्णतः हिंदी में कार्यक्रम प्रस्तुत करती है।ये देश जापान,सिंगापुर एवं अन्य देश है।
हिंदी का सबसे पहले प्रमाण 400 में कालिदास द्वारा रचित विक्रमोर्वशीयम के रूप में है।उस समय हिंदी को अपभ्रंश (भाषा) के रूप में जाना जाता था।1805 में लालू लाल ने पहली हिंदी पुस्तक लिखी थी।जिसका नाम प्रेम सागर था।इस पुस्तक में भगवान कृष्ण का वर्णन था।
हिंदी में 1 लाख 20000 शब्द हैं।एक शोध से ये पता चला है की अगर खुद की भाषा में कोई कार्य किया जाये तो वो ज्यादा बेहतर होता है।
तो आये हिंदी का उचित सम्मान करे ....उसे पढ़े पढ़ायें...सुने ...सुनायें

Tuesday, October 30, 2012

important research about TV

अब नहीं रहा विकास---

जी हां आपको सुनकर अश्चर्य तो हो रहा होगा लेकिन यह सत्य है। विकास कोर्इ राजनीतिक या आर्थिक नहीं बलिक एक जिराफ है, जिसकी मौत इलाज की कमी के कारण पटना के चिडि़याघर में हो गर्इ। विकास को 2006 में पटना के जू में लाया गया था। विकास अमेरिका के संत डियागो जू में आठ जुलार्इ 2005 को जन्मा था। जू प्रशासन उसकी मौत का कारण

Friday, October 26, 2012

खुबसूरत पंडाल और रोशनी से नहायी राजधानी में मा दुर्गा की झलकियां


मछुआटोली स्थित मां दुर्गा एवं साथ में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश

गोविंद मित्रा रोड में रोशनी से नहायी सड़क


गोविंद मित्रा रोड की मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा

Thursday, October 25, 2012

पटना: इतना गंदा क्यों ?

देखो जरा, बिहार की राजधानी है, लेकिन जिधर देखो गंदगी का अंबार लगा है | साफ सफाई का तो नामो– निशान तक नहीं है | जब राजधानी का ही ये हाल है तो बाकि शहरों की बात ही क्या | पता नहीं प्रशासन क्या करता रहता है ?”
पटना की सड़कों पर आते- जाते हम सभी के मन में ऐसी बातें आती हैं | कई बार इस गंभीर समस्या के विषय में हम आपस में चर्चा भी करते हैं | कभी इसका समाधान ढूंढने की कोशिश करते हैं, तो कभी बातें यूं ही आई- गई हो जाती हैं | और हममें से ज्यादातर लोग इसके लिए केवल सरकार और प्रबंधन को ही जिम्मेदार ठहराते हैं | कुछ हद तक सही भी है | आखिर जनता की आवश्यकताओं और सुविधाओं की पूर्ति करना सरकार की जिम्मेदारी ही तो है | सड़कों के निर्माण और शहर की सफाई के नाम पर आम जनता से ही तो टैक्स वसूले जाते हैं  | सरकार हर साल इस काम के लिए मोटे बजट की घोषणएं तो कर देती है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक महकमों को अपनी जेब भरने से फुरसत मिले तब तो इन्हें अपना काम याद आये |
खैर, यहां मेरा उद्देश्य सरकारी तंत्र पर दोषारोपण करना नहीं है |  क्योंकि जब तक हम सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ ध्यान नहीं देंगे, हम यूं ही लाचारी के जाल में उलझे रहेंगे  |
जरा सोचिये कि अपने शहर की सड़कों पर फैली गंदगी के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकार को ही दोषी ठहराना क्या उचित है? क्या इस शहर के नागरिक होने के नाते हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ?
अब एक मिनट के लिए इमानदारी से सोंचकर देखिये, कि आपने इस दिशा में क्या किया है? और क्या करना चाहिये ?
पटना नगर निगम के हालिया आंकड़ों के अनुसार केवल पटना शहर से हर रोज लगभग 1000 टन गंदगी उत्पन्न होती है | हो भी क्यों ना... पिछले 10 सालों में पटना के आवासीय क्षेत्र में तीन गुणा बढ़ोतरी हुई है, जबकि इस शहर की आबादी चार गुणा बढ़ी है | वहीं इसकी तुलना में पटना नगर निगम की श्रम- शक्ति में गिरावट आई है | शायद आपको जानकर आश्चर्य हो कि सड़क पर जितनी गंदगी फैली होती है उसमें से 35- 40 % हमारी गलतियों के कारण है |
सड़क पर चलते वक्त (पैदल हो या किसी सवारी पर) हमारे पास जो भी बेकार चीज पड़ी होती है उसे बिना इधर – उधर देखे बेपरवाह कहीं भी फेंकते चले जाते हैं | कचरा सही जगह पर फेकने के लिए दस कदम चलने की जहमत कोई उठाना नहीं चाहता | सड़क पर कहीं भी थूकते चले जाते है चाहे उस जगह पर ऐसा करना प्रतिबंधित ही क्यों न हो |
अब एक अहम सवाल पूछना चाहूंगी, क्या हम अपने घरों में भी ऐसा ही करते हैं ? शायद कुछ लोग कहें कि घर तो हमारा अपना है, और उसकी सफाई की जिम्मेदारी हमारी है | तो जनाब.. क्या वो सड़क आपकी नहीं है ? यह तो बस हमारी सोच का फेर है | अगर कभी किसी घर के नीचे से गुजरते वक्त आपके ऊपर गंदे पानी या कूड़े की बरसात हो जाये, तो भी शायद यह कोई बड़ी बात नहीं होगी | क्योंकि हमारी सोच ही ऐसी है | अपने घर के सामने सफाई करके कूड़े को बीच सड़क या बगल वाले घर के पास जमा कर देते हैं | सोचिये, अगर कोई हमारे साथ ऐसा करे तो कैसा लगेगा ? सरकार ने तो फिर भी जगह- जगह शुलभ शौचालय की व्यवस्था कर दी है | लेकिन कितने लोग इसका उपयोग करते हैं ?
हलांकि पटना नगर निगम बहुत जल्द ही पटनावासियों की इस हरकत पर लगाम लगाने के लिये 1000 रूपये जुर्माने का प्रावधान करने जा रही है | बड़ा ही अजीब लगता है ये सोचकर कि हम अपनी छोटी से छोटी गलतियां भी तब तक नहीं सुधारते जब तक हम पर जुर्माने या किसी तरह के दण्ड की तलवार नहीं लटकाई जाती |
अपनी इस सोच को बदलने के लिये हम और कितना वक्त लेंगे ? जितनी जल्दी ऐसा हो, हमारे और हमारे शहर के लिये उतना ही अच्छा होगा | क्योंकि सकारात्मक सोच ही पूरे बिहार की काया पलट सकती है | इसके सरकार और प्रशासन को भी इमानदारी से आगे आना होगा | और अगर वह ऐसा करने में विफल होती है, तो हर आम आदमी को अपना अधिकार और फर्ज समझकर सरकार और प्रशासन को समय-समय पर उनका काम याद दिलाना होगा |
साथ ही शहर के हर नागरिक को इस गंभीर समस्या के समाधन में अपना योगदान देना होगा | ये हमारा कर्तव्य है  | ऐसा करके हम अपनी ही तो मदद करेंगे | आखिर उन सड़कों पर हमें भी तो चलना है |  गंदगी से फैलनेवाली बीमारियां हमें भी तो बीमार बनायेंगी | जब तक शहर के वातावरण में दूषित हवा और बदबू फैली होगी शुद्ध वातावरण की अपेक्षा करना बेइमानी होगी |
 

Friday, October 19, 2012

युवा वर्ग- नशे में गिरफ्त

आज के फैशन के युग में युवा का सबसे बड़ा सगल नशा है। आज अपने आप को माचो मैन दिखाने के लिए युवा सिगरेट, शराब का सेवन कर रहे हैं। इससे उनका समझना है कि यदि आप इस तरह का काम नहीं किये है तो आप ने जिंदगी नहीं जीया हैं। एक अनुमान के अनुसार सबसे ज्यादा सिगरेट और शराब का सेवन 16 से 30 साल के लोग कर रहे हैं। उसमें भी मेट्रो शहरों में 70% खपत सिगरेट और शराब की हो रही है। आज के युवा वर्ग को क्या हो गया है पता नहीं चलता।

विश्वविद्यालय जीवनदाता या अखाड़ा

प्राचीन काल से विश्वविद्यालय छात्रों के लिए जीवनदाता रहा है। ऐसा आज भी है। विश्वविद्यालय का मतलब होता है एक छत के नीचे सारे संसार का ज्ञान प्राप्त करना। यहां न सिर्फ पढ़ाई बल्कि खेल, अध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञान भी हम प्राप्त करते हैं। विश्वविद्यालय में शिक्षक और छात्रों का संबंध बहुत मित्रवत होता है। जिससे यह समझने में मुश्किल होती है कि छात्र कौन है और शिक्षक कौन। विश्वविद्यालय की एक खासियत यह होती है कि जीवन देने के साथ छात्र के व्यक्तित्व विकास करने में वह महत्वपूर्ण योगदान देता है।

टेक्नोलॉजी के बीच मानव जीवन

बाज़ार में नई-नई टेक्नोलॉजी ने अपनी पैठ इस तरह से बनाई है कि इसके प्रभाव की कल्पना भी करना मुश्किल है। आप भी इस तरह की वस्तुओं के उपयोग से भली-भांति परीचित होंगें। जीवन जीने के ढ़ंग आज से जो 10 साल पहले थे वो आज बिल्कुल बदल गए हैं। अब तो ऐसा लगता है कि इन चीज़ों के बग़ैर हम एक कदम भी नहीं बढ़ सकते। मोबाईल, इन्टरनेट, कम्प्युटर आदि ने तो हमारे काम करने के तरीकों में क्रांति ही पैदा कर दी है। आने वाले युग की तस्वीर कैसी होगी?

Thursday, October 18, 2012

बदलते दौर में फाइनेंन्स्ड दुर्गा पूजा...

सबसे पहले मैं उन पाठकों को इस महान पर्व कि बधाई देना चाह्ता हूँ जो इसे पढ़ रहे हैं...और उन्हे भी जो इसे नही पढ़ पा रहे है...इस पुजा के साथ बड़ी यादें जुडी हैं...हम बचपन में इस बात का इंतज़ार करते थे कि कब ये पर्व आये और हम नये-नये कपड़े खरीदें और खुब घुमे...हालांकि अभी भी जब मौका मिलता है तो घुम ही लेता हूं...पर उतना नही घुम पता जितना घुमा करता था।

पहुंच से दूर होता पटना


हाल ही में कुछ अख़बारों में ख़बर छपी कि पटना में रियल इस्टेट और जमीन की कीमतें नोएडा और दिल्ली जैसे महानगकरों से होड़ कर रहीं हैं. पढ़कर एक साथ दुख भी हुआ और आश्चर्य भी. दुख इसलिए कि पूरे देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले बिहार की राजधानी में गरीबों और छोटे रोजगार से जुड़े तबकों के लिए आशियाना ढ़ूंढ़ना मुश्किल होने वाला है. उल्लेखनीय है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय 13663 रू है जोकि देश की 37,731 के अनुपात मे बहुत ही कम है. और आश्चर्य इसलिए क्योंकि बुनियादी सुविधाओं के लिहाज से पिछड़े शहरों में गिने जाने वाले पटना में आशियाने की आसमान छूती कीमतों की वजह एकाएक समझ में नहीं आई.

बदलते दौर में फाइनेंन्स्ड दुर्गा पूजा....

सबसे पह्ले मै उन पाठकों को इस महान पर्व कि बधाई देना चाह्ता हूं जो इसे पढ़ रहे हैं...और उन्हे भी जो इसे नही पढ़ पा रहे हैं...इस पुजा के साथ बड़ी यादें जुड़ी हैं...हम बचपन मे इस बात का इंतज़ार करते थे कि कब ये पर्व आये और ह्म नये-नये कपड़े खरीदें और खुब घुमे...हालांकि अभी भी जब मौका मिलता है तो घुम ही लेता हूं...पर उतना नही घुम पता जितना घुमा करता था

हम बदलेंगे युग बदलेगा

'हम बदलेंगें युग बदलेगा' इसी तर्ज पर महिलायें क्रान्ति का संवाहक बनने जा रही हैं। महिलायें आज पुरूषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रहीं हैं। यही नहीं हर क्षेत्र में ये पुरूषों से आगे भी बढ़ती जा रहीं हैं. किन्तु इस बार महिलायें दूर्गा के रूप में जन आक्रोष कर रहीं हैं, वो आक्रोष किसी असुर के खिलाफ नहीं बल्कि उस डायन (शराब) के खिलाफ है, जो औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन है। महिलाओं का मन तब बोझिल हो जाता है, जब उनके घर का कोर्इ सदस्य

जहाँ चाह वहाँ राह

बिल्कुल सच बात कही गई है अगर आप किसी चीज़ को पाने की इच्छा रखते है, तो उसे पाने के लिए आप अपनी सारी कोशिश शुरु कर देते है और आखिरकार आपको सफलता मिल जाती है।

वीआईपी घेरे में आम आदमी

मारों इन........ नेता सब को, ये शब्द मेरे नहीं हैं बल्कि एक 65 वर्ष बूढ़े व्यक्ति के कहे हुए हैं. हिलते हुए हाथ में काले रंग का एक बैग और दूसरे में बुढ़ापे का सहारा छड़ी। गुस्से भरी उनकी लाल आंखें थी। चेहरे पे झुर्रियां मौजूद थी, शरीर से तो कमज़ोर थे पर अपने शब्दों से भड़ास निकाल रहे थे। मैं उनके साथ ही दानापुर के सगुना मोड़ से चढ़ा था। गाड़ी में और भी लोग मौजूद थे। किसी को ऑफिस जाना था, तो किसी को अपने काम के लिए दुकान पर। मुझे भी कॉलेज के लिए आना था। ड्राईवर भी काफी खुश था क्योंकि उसे पूरी सवारी मिल चुकी थी। गाड़ी अपनी पूरी ताकत लगा कर हवा से बात करते हुए बढ़ रही थी। सवारी भी सुबह की हलचल का आनंद लेने में मग्न थी।

बिहार के छात्रसंघ नई शुरुआत करने को आंदोलित



पटना विश्वविद्यालय

पटना विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ चुनाव की तारीख घोषित कर दी है। वह दिन 11 दिसंबर है। जब पटना विश्वविघालय के छात्रसंघ 29 वर्षों से मृत पड़ी छात्र राजनीति को दोबारा जीवित करेंगे। लोकतंत्र की सेमनरी में छात्र राजनीति के स्वर एक बार फिर गुजेंगे। छात्रसंघ को यह उपलब्धि लंबे संघर्ष के बाद प्राप्त होइ है। बिहार के छात्र इसके लिये विश्वविद्यालय से लेकर राजभवन और मुख्यमंत्री आवास तक अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं। इनकी आवाज को विश्वविद्यालय प्रशासन, राजभवन और पिछली सरकार अनसुनी या नकारती रही है। वर्तमान मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री बधाई के पात्र हैं। उन्होंने इस दिशा में पहल की है। वहीं पटना विश्वविद्यालय के कुलपति भी पहल करने के लिये बधाई योग्य हैं।

विज्ञापन और बच्चे...!


आज के दौर में बचपन हजार खतरों से घिरा है। उनमें से एक विज्ञापनों की वो भ्रामक दुनिया भी है जो बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारे जीवन के हर हिस्से पर अधिकार जमाये बैठी है। चाहे अखबार खोलिए या टीवी, इंटरनेट हो या रेडियो, इतना ही नहीं एक पल को घर की छत या बालकनी में आ जाएं जो साफ सुथरी हवा नहीं मिलेगी पर दूर- दूर तक बड़े बड़े होर्डिंग्स जरूर दिख जायेंगें जो किसी न किसी नई स्कीम या दो पर एक फ्री की जानकारी बिन चाहे आप तक पहुंचा रहे हैं। यानि हर कहीं कुछ ऐसा जरूर दिखेगा जो दिमाग को सिर्फ और सिर्फ कुछ न कुछ खरीदने की खुजलाहट देता है। जिसका सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं वो मासूम बच्चे जिनमें इन विज्ञापनों की रणनीति को समझने का न तो आत्म बोध है और न ही जानकारी।

संवेदना से दूर होता यंगिस्तान


हमारे देश में भारतीय रेल ने वृद्धों के किराये की भाड़ा पर 40% की छूट दी है। वृद्धों के सम्मान में सीनियर सीटीजन की बिशेष सुविधा मुहैया कराता है यह 40% की सुविधा कितना लाभदायक साबित हो पा रही है। इसका अनुभव रेल में यात्रा करने पर ही प्राप्त होता है।

ग्लोबल वार्मिंग जैसे राक्षस को मारने के लिए चाहिए कई राम

    
कभी धरती और जीवों के बीच रहा मधुर संबंध आज तार-तार होने लगा है। यही मुख्य कारण है कि आज हमारे सामने लगातार बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही है, और इस समय की सबसे बड़ी समस्या है ग्लोबल वार्मिंग। जिसके कारण धरती दिन ब दिन गर्म होती जा रही है। यदि यह जारी रहा तो हमारा अस्तित्व गम्भीर खतरों के पलनों में पलने लगेगा और उन पलनों को हिलायेगी समस्याएं तथा उनके बेटे और पोते।