Tuesday, September 16, 2014

प्रौढ़ पीड़ा



बीज से पेड़ बनने का सफ़र बहुत लम्बा होता है, और इस बीच पेड़ कई पतझड़, सावन, बरसात आदि झेल चुका होता है. इसके बावजूद भी वह अपने प्राकृतिक स्वभाव के कारण निःस्वार्थ फल और छाया देता ही रहता है. परन्तु एक समय ऐसा भी आता है जब उसके सारे पत्ते झरने लगते हैं और तब वह ना तो फल दे सकता है और ना ही छाया. फिर हम बुद्धिजीवी प्राणी उस सजीव प्राणी को व्यर्थ समझकर काट(मार) डालते हैं.

Friday, September 12, 2014

“आधी रोटी खाएंगे,फिर भी स्कूल जाएंगे”


जब मैं लगभग दूसरी या तीसरी कक्षा में था, तब ऊपर्युक्त नारा के साथ हमारे विद्यालय के सारे छात्र समाज में जागरूकता हेतु लगभग 10 किलोमीटर से ज्यादा का चक्कर लगाया था ताकि हमारे ग्रामीण जागरूक हो और अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विद्यालय भेजें. गौरतलब है की हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग भोजन की कमी के कारण शिक्षा से वंचित रह जाता है, यह वर्ग स्कूल भेजने के बजाय बच्चों को मेहनत-मजदूरी के लिए भेज देते हैं. 

खतरनाक वायरस इबोला लेकर आया वैश्विक आपदा


इबोला एक खतरनाक वायरस है जिसका खतरा आज पूरी दुनिया भर में मंडरा रहा है. इसका संक्रमण होने के बाद लोगों का बचना मुश्किल है लगभग 90% मामलों में मृत्यु हो जाती है. अभी हाल में ही इबोला वायरस ने चार पश्चिमी अफ़्रीकी देशों गिनी, लाइबेरिया, सिएरा लियोन और नाइजीरिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है. 

Thursday, September 11, 2014

फिल्मों में महिला-सशक्तिकरण

भारतीय सिनेमा पर नज़र दौडाएं तो हम देखते हैं कि यहाँ पुरुष प्रधान फ़िल्में बहुत बनी हैं, यहाँ तक कि ऐसी फिल्मों की भी भरमार है जिनमें पुरुषों को गैंगस्टर के रूप में दिखाया गया है, लेकिन महिलाओं पर केन्द्रित अथवा महिलाओं को गैंगस्टर के रूप में दिखाने वाली फिल्मों कि संख्या हाथों पर गिनी जाने वाली है| 2011 में नेहा धूपिया की एक फिल्म आई थी “फंस गए रे ओबामा” जिसमे नेहा धूपिया एक ऐसी गैंगस्टर की भूमिका में थी जो पुरुषों से नफरत करती है|

Wednesday, September 10, 2014

“सैलाब में डूबती जन्नत”

बह गए घर, डूब गए सपने, फिर भी डटे रहे जन्नत के बाशिंदे।।
भारत के जन्नत जम्मू-कश्मीर में जल प्रलय के सात दिनों से बाढ़ का कहर जारी हैं। जन्नत में बाढ़ ने जो हालत उत्पन्न किए हैं, वें गत वर्ष उतराखंड में हुई जल प्रलय की यादें ताज़ा कर रही हैं। हालांकी पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण बरसात और हिमपात होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन एक बार फिर कुदरत अपना कहर इस कदर बरसाएगी इसका अनुमान किसी को नहीं था।

Tuesday, September 9, 2014

" जहां लड़की के जन्म पर मनती हैं खुशियां "

 
।।बेटी को मरवाऔगे तो दुल्हन क्हा से लाऔगे।।

हमारे जीवन में महिलाए एक कीमती संपत्ति की तरह हैं, क्योकिं वे दूसरों की परवाह करती हैं, वे हमे शिक्षा एवं संस्कार देती हैं, वे सबका भला सोचती हैं, वे चीज़ो को पता लगाने में माहिर होती हैं, वे सबसे अधिक संघर्ष करती हैं, वे दूसरों के लिए अपने खुशी का बलिदान तक देती हैं।

Women Empowerment in India

Women Empowerment means to empower women in all aspects of their identity.
Empowerment of women in India is an issue which is widely discussed. Women constitute almost 50% of the world population but India has shown inappropriate sex ratio whereby female’s population has been comparatively lower than males and we know the reasons very well. As far as social status of women is concerned we all are much familiar about the evil practices against them and how they were suppressed from time to time, history is a witness of it.

भारत में कुपोषण-आखिर कब तक ?

क्या अन्न का एक दाना फेंकते वक्त हमने कभी यह सोचा है, कि आज भी हमारे देश में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें ये एक दाना भी नसीब नहीं होता है।
रोटी, कपड़ा और मकान यह हमारे देश के निर्माण का नींव थी। आजादी के 68 वर्ष के बाद भी हमारा देश एक कुपोषण रहित राष्ट्र नहीं बन पाया है। आज भले ही भारत ने कई मायनों मे एक नया मुकाम हासिल कर लिया हो, चाहे वह टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में हो या फिर व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्र में। पर आज भी हमारा देश गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार जैसी कई समस्याओं से जूझ रहा है, जिनमे से एक बड़ी समस्या कुपोषण भी है। 

गरीबों के “रहनुमा”

आए दिन गरीब किसी न किसी रूप से प्रताड़ित होते हैं, चाहे वो नेताओं के हाथों हो या फिर उद्योगपतियों के, यह शब्द मेरे नहीं हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हैं, जिन्हे मोदी ने, 2014 लोकसभा चुनाव के पहले उड़िसा के बालासोर में चुनावी रैली के दौरान कहा था। हमारे समाज में गरीबों की दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यह एक सर्वविदित रहस्य है। आज हमारे देश में गरीबी हटाओ योजनओं से ज्यादा गरीबों के प्रति हो रहे अमानवीय कृत्य के खातमे की जरुरत है। सवाल उठता है कि गरीबों की दयनीय स्थिति पर नेताओ की नजर चुनाव के वक्त ही क्यों पड़ती हैसमाज का हर एक उच्च वर्ग अपनी जरुरत के हिसाब से गरीबों का शोषण करने की हर संभव कोशिश करता हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें चुनाव के वक्त देखने को मिलता है। 

"खानदानी राजनीति"

परिवर्तन संसार का नियम है यह कथन आज के युग में धूमिल होती दिख रही है। मैं बात कर रहा हूं राजनीति परिवेश में अपनों की राजनीति का। इतिहास गवाह है कि अति कुछ भी हमें प्रकृति (प्रकृति) और समाज से दूर करती है। चाहे विश्वयुद्ध हो, केदार नाथ त्रासदी हो या कश्मीर का जल प्रलय। अति युद्ध ने विश्वयुद्ध का रूप लिया तो अति प्रकृति से छेड़छाड़ केदार नाथ और कश्मीर जल प्रलय का।

जीभ से नहीं शरीर से पूछें कि क्या खाएं



जिंदगी जीना बहुत आसान है लेकिन हमलोग गलतियां करके उसे मुश्किल बना देते हैं। हर कोई जीवन में खुश रहना चाहता है, सकारात्मक होना चाहता है, अधिक क्रिएटिव और प्रोडक्टिव होना चाहता है। भरपूर पैसा और समाज में सम्मान पाना सभी का लक्ष्य होता है। लेकिन इस बेहतर जीवन को और उसके आनंद को पाने के लिए हम क्या करते हैं? कुछ नहीं। क्या आप जानते हैं कि अच्छा परिवार, बहुत सारे दोस्त, अच्छा स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा एक सुखी जीवन के लिए पर्याप्त है, लेकिन हम अपनी पूरी जिंदगी लोगों के साथ खुद की तुलना करने में लगा देते हैं। अपने आपको भागयशाली मानने की बजाय अतिमहत्वाकांक्षी हो जाते हैं और उस चक्कर में जिंदगी का असली स्वाद लेना भूल जाते हैं।

“Homeless In The Own Home”

“Suppose one day you get up in the morning and you find that uninvited guests or neighbors have entered in your house and started dominating in making decisions at your home and also they are making you feel as an alien in your own home. Just think how would you feel? Aren’t it irritating and a feeling as homeless in your own home and definitely you will raise voice against that, which might turn into bloody violence also, but fighting for your own right is always correct.”

अंधविश्वास पर बढ़ता विश्वास

जहां आज दुनिया चांद और ग्रहों तक पहुंच रही है वहीं समाज का एक बड़ा वर्ग ग्रह और नक्षत्रों में फंसा पड़ा है. विज्ञान जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है उससे कहीं ज्यादा तेजी से अंधविश्वास बढ़ रहा है. यह एक सामाजिक समस्या है जो किसी भी देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर होने से रोकता है.

Socio-Economic Status of Women


It is easy to narrate the condition of women in society but difficult to understand. To assess the status of women in India one has to start with social framework and structure, cultural norms and traditional values. Our society is composed of many institutions and compulsions like value system, family and relationship, marriage institution, religious traditions. All these institutions set the base of position and status of a woman in the society.

Monday, September 8, 2014

तुम करो तो रासलीला हम करे तो कैरेक्टर ढीला

ऐसा माना जाता है की सिनेमा समाज का आईना होता है। जो भी हमारे समाज में हो रहा होता है वह फिल्मकार अपने फिल्मों के द्वारा हमें दिखाने की कोशिश करता है। इसका असल उद्देश्य हमारे समाज में हो रही कुरितियों को हमसे रूबरू कराना है जिससे की हम अपनी गलतियों को समझ सकें और उसे सुधार कर अपने जीवन में अंतर्ग्रहित कर सकें।
 आज के समय में फिल्म हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। जब भी हम किसी फिल्म को देखते हैं तो उसे अपनी जिंदगी से जोड़ने की एक बार कोशिश तो जरूर ही करते हैं फिर चाहे वो गलत ही क्यों ना हो।

भारतीय सिनेमा का बाजार तथा इसके आयाम



 पिछले 100 वर्षों में भारतीय सिनेमा ने दुनिया में किस तरह विकास किया इस पर नज़र डालें तो       हम पाते हैं कि भारतीय सिनेमा को इस ऊंचाई तक पहुँचाने तथा इसका पहल करने वालों की दूरदृष्टि और उनकी आशावादी रहना साथ ही लीक से हटकर चलने की प्रवृति का एक बड़ा योगदान रहा है|
उनके सामने आनेवाली चुनौतियों के बीच उनके द्वारा किये गए प्रयास एवं योगदान कभी न भूलने वाली है| 
फिल्म उद्द्योग को वैसे आज भी पूर्णतः एक उद्द्योग या व्यापार का दर्जा प्राप्त नहीं है| इसको लम्बे समय से उद्द्योग का दर्जा देने की मांग होती रहती है| ताकि इसमें निवेश का आधुनिक संसाधन की उपलब्ध हो सके| फिल्म निर्माण के शुरूआती दिनों में आमतौर पर यह कारोबार पारिवारिक सम्पर्कों के तहत आता था| ये वो दौर था जब फिल्मों को व्यवसाय या मनोरंजन के साधन के बजाय समाज में सुधार लाने का एक जरिया माना जाता था|
यह कारोबार जैसे-जैसे बढ़ने लगा, निजी कम्पनियां पैसा कमाने के उद्देश्य से इसमें पैसा लगाने लगे| फिल्म कारोबार में बड़े स्तर पर पैसा लगाने का चलन मल्टी-स्टारर फिल्मों के बनने के साथ शुरू हुआ| इसी दौर में अंडरवर्ल्ड का इसमें पैसा लगाने की बात सामने आने लगीं| मेरे हिसाब से यह आज भी अप्रत्यक्ष रूप से जारी है| आज भी आरोप लगते हैं कि फिल्म-क्षेत्र में काले धन की बहुत भूमिका है|
बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट क्षेत्र के इस कारोबार में आने के बाद इस कारोबार के नियमन का एक नया दौर शुरू हो गया| अब यह काम ज्यादा व्यावसायिक तरीके से किया जाता है| एकल पर्दे वाले सिनेमाघरों का स्थान पर मल्टी-स्क्रीन वाले और नई तकनीकों से भरपूर सिनेमाघरों की लोकप्रियता बढ़ रही है| आज सिनेमा देखना भले ही महंगा हो गया है, लेकिन इसकी लोकप्रियता अब भी बढ़ रही है|
आज भारत एक ऐसा देश बन गया है, जहाँ विश्व में सबसे ज्यादा फिल्म-निर्माण होता है| यह औसतन हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में औसतन 1200 फ़िल्में सालाना बनाती है| रोजाना फ़िल्में देखने वालों की संख्या 1.5 करोड़ आंकी गई है|
भारतीय फिल्म बाजार तथा इसकी हकीकत:-  भारतीय सिनेमा को एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार (सह कार्यकारी निदेशक, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज, महाराजा अग्रसेन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज देल्ही) आदित्य अवस्थी ने करीब 2.5 अरब डॉलर का आँका है| मुंबई फिल्म उद्द्योग (बॉलीवुड) भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा हिस्सा है| ऐसा माना जाता है कि बॉलीवुड में बनने वाली पांच से दस प्रतिशत फ़िल्में ही ऐसी होती हैं जो आर्थिक दृष्टि से सफल होती है| क्षेत्रीय भाषायी फिल्मों की स्थिति और भी बदतर है| खासकर भोजपुरी फिल्मों की| फिल्मों को जबर्दस्ती लोकप्रिय बनाने के लिए कथित तौर पर “मसाला” (मसाला फिल्म, जबकि कोई जौनर नही है) फ़िल्में बनाई जाती हैं, जो आइटम सांग्स से लेकर गाली-गलौज से भरपूर होती हैं| इसके बावजूद हर साल ऐसी फिल्मों की संख्या गिनी-चुनी होती हैं जो दर्शकों को आकर्षित कर मुनाफ़ा कमाने वाली हो|
इसलिए ज्यादातर फ़िल्म कारोबार के जानकर मानते हैं बल्कि मैं खुद भी मानता हूं कि फ़िल्मी दुनिया देखने में भले ही दूर से ग्लैमरस और लाभ का सौदा दिखता हो पर वास्तविकता इससे बहुत दूर है जो शायद बाहरी लोगों को दिखाई ही नहीं देती|

Sunday, September 7, 2014

"कब आएंगे अच्छे दिन"


सांईं इतना दीजिए जामे कुटूम समाय मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाये। कबीर दास की इस वाणी को आज हम सिर्फ अपने जेहन में ही रखते हैं। अच्छे दिन का मतलब यह नहीं होता कि हम अमीर हो जाएं, हमारे पास बहुत पैसे आ जाएं नई सरकार को बने अभी सौ दिन भी नहीं हुए और लोग दिल्ली की तरफ आंख गड़ाए बैठे हैं। आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जोरों पर है। जनता खुल करबोलने मे भी घबरा रही है उन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार के समय जो वादे किये थे वह पूरा नहीं होता दिख रहा है।

Friday, September 5, 2014

“कर लो दुनिया मुट्ठी में”


अभी हाल में हमारे प्रधानमंत्री जी ने यह घोषणा की है कि आगामी वर्षों में लगभग हरेक गाँवों को इंटरनेट से जोड़ दिया जाएगा, लोग सूचना प्राप्ति हेतु इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकेंगें, हमारा भारत विश्व में एक नई पहचान कायम करेगा, डिजिटल इंडिया के नाम से जाना जाएगा। बोलने लिखने में कितना आसान है यह! यहा सबसे पहले यह प्रश्न उठता है कि अभी हमारा ग्रामीण भारत इसके लिए कितना तैयार है, तकनीकी रूप से कितना शिक्षित है? यदि हम गाँव की बात करें तो पाएँगें कि अभी साक्षरता का प्रतिशत भी कितने राज्यों का जस का तस है, ऐसे में इंटरनेट का उपयोग कितना कर पाएंगे। लेकिन एक बात तो तय है कि यह आगामी योजना से उच्च वर्गों एवं निम्न वर्गों दोनों को फायदा जरूर मिलेगा इसका कारण यह है कि रिलांयस जैसी कंपनी को पूरे देश में इंटरनेट का जाल बिछाने का काम दिया जा रहा है जिससे इंटरनेट सस्ते दामों पर उपलब्ध होगी गौरतलब है कि रिलांयस ने संचार क्रांति का आगाज करते हुए मोबाईल को जन-जन तक सस्ते दामों मे उपलब्ध कराया था। 

गुमशुदा इतिहास


 

हम में से ज्यादातर लोगों को पता है कि भारत की पहली फीचर फिल्म दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्देशित राजा हरिश्चंद्र है, पर क्या आपको पता है किसी भारतीय द्वारा बनाई गई पहली फिल्म पुंडलिक थी जिसके निर्देशक दादा साहेब तोरने थे| यह फिल्म राजा हरिश्चंद्र से लगभग एक वर्ष पहले 18 मई 1912 को रिलीज हुई थी|

Thursday, September 4, 2014

“भगवान” बना “सौदागर”

भगवान वास्तव में है या नहीं यह तो अभी भी रहस्य है, परन्तु पृथ्वी पर अगर किसी को भगवान का दर्जा दिया गया है तो व है डॉक्टर। डॉक्टर मरते हुए को जीवनदान दे सकते हैं। इंसान अपनी बीमारी के इलाज के लिए सिर्फ डॉक्टर पर ही निर्भर रहता है। परन्तु आज कल ऐसा लगता है की चिकित्सा व्यवस्था एक बड़े व्यवसाय के रूप में फैलता जा रहा है, जिसमे अधिकांश डॉक्टर इलाज को छोड़ कर मुनाफे को प्राथमिकता देते नज़र आ रहे हैं।

Fighting inhumanity with inhumane act In the fight over AFSPA humanity is defeated

 
 
Internal security has been a major hurdle in the development of India. Our leaders faced stiff challenges to maintain the territorial integrity of Independent India, as major challenges were faced in North Eastern states in its infancy stage. It led the implementation of AFSPA 1958 in the state of Manipur and Nagaland. In the words of the then Home Minister G.B Pant “there, they are indulging in arson, murder, loot, dacoity etc. So it has become necessary to adopt effective measures for the protection of people in those areas in order to enable the arm forces to handle the situation effectively it has become necessary to introduce the bill.”

Wednesday, September 3, 2014

दिखा दिये मोदी ने अच्छे दिन !

अच्छे दिन आने वाले हैं और लीजिये देखते ही देखते लोगों के अच्छे दिन के आने की शुरुआत होती दिख रही है। नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने इसी साल 26 मई को शपथ ग्रहण कर सत्ता में कदम रखा था और पता ही नहीं चला की कैसे इतनी जल्दी इनके 100 दिन पूरे हो गए। वैसे लोकसभा में इस शानदार जीत के साथ बीजेपी के भी अच्छे दिन आ गए जिसका कारण रहा की 30 वर्षों में आजतक कोई भी पार्टी ऐसी बहुमत के साथ सत्ता में नहीं आ पाई थी। हॉलीवुड की एक फिल्म का डायलॉग है की बड़ी शक्ति के साथ आपके ऊपर बड़ी जिम्मेवारी भी आती है।

Tuesday, September 2, 2014

युवाओं में शादी के नकारात्मक प्रभाव...

भारत एक बहूसांस्कृतिक, बहूधर्मी समाज हैं। शादी के तरीके क्षेत्र ओर संस्कृति मे अलग हो सकते हैं। लेकिन मेरी चिंता यह नहीं हैं।

युवा शादी को कैसे वर्गीकृत करते हैं।
1. प्रेम विवाह
2. व्यवस्थित विवाह

Feminism: An Outcome of Gender Discrimination


Discriminatory attitude towards men and women exists in the society for generations. Nature has divided human beings into two halves and even wife is designated as “Better half”, but this better half is never given her better rights. This society portrays women as an idol of sacrifice; she is supposed to be submissive and tolerant. Not to think about the rights given to a women but she had some specific roles and responsibilities or you can even call it as her duty towards her family. These include cooking and serving her husband and her family, well dressed and looking beautiful just for herself because she was not even allowed to show her pretty face to the world and her role ends up by giving birth to a male child. Problem of gender biased was not just a problem of India.