मारों इन........ नेता सब को, ये शब्द मेरे नहीं हैं बल्कि एक 65 वर्ष बूढ़े व्यक्ति के कहे हुए हैं. हिलते हुए हाथ में काले रंग का एक बैग और दूसरे में बुढ़ापे का सहारा छड़ी। गुस्से भरी उनकी लाल आंखें थी। चेहरे पे झुर्रियां मौजूद थी, शरीर से तो कमज़ोर थे पर अपने शब्दों से भड़ास निकाल रहे थे। मैं उनके साथ ही दानापुर के सगुना मोड़ से चढ़ा था। गाड़ी में और भी लोग मौजूद थे। किसी को ऑफिस जाना था, तो किसी को अपने काम के लिए दुकान पर। मुझे भी कॉलेज के लिए आना था। ड्राईवर भी काफी खुश था क्योंकि उसे पूरी सवारी मिल चुकी थी। गाड़ी अपनी पूरी ताकत लगा कर हवा से बात करते हुए बढ़ रही थी। सवारी भी सुबह की हलचल का आनंद लेने में मग्न थी।
गाड़ी जैसे ही जगदेव पथ पुल पर पहुंचती है। तो पुलिस की गाड़ियों की झुंड उस पुल के पास मौजूद थी। खाकी वर्दी में पुलिसवाले गाड़ियों को रोक रहे थे। पुलिस के बड़े अधिकारी भी अपनी पूरी गतिविधियों में साफ तौर से दिख रहे थें।
गाड़ियों पर जितनी सवारियां थी हताश हो कर सभी उतर रहे थे पुलिस ने गाड़ी ये कह कर रोका कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आ रहे हैं पुल निर्माण का उद्घाटन के लिए।
अब तो जैसे लोगों के मुंह पर अपशब्द ही थे कुछ लोगों ने तो ऐसे-ऐसे अपशब्द कहने शुरू कर दिए कि मैं इसे लिख नही सकता हूं। क्या बूढ़ा क्या बच्चा, औरतें, मज़दूर और कॉलेज-स्कूल जाने वाले लोगों को मजबूरी में उतरना पड़ रहा था और वे पैदल जाने पर मजबूर थे। उस बूढ़े व्यक्ति ने मानो मुझे अपना हमदर्द बना लिया और उस चंद मिनटों के पैदल के सफर में बिहार के राजनैतिक गतिविधियों को इस तरह से अपने शब्दों से तार-तार कर रहे थे कि लगता है आम जनता कैसे परेशान है यह साफ झलक रहा था।
यह कैसा विकास पुरुष है जो अपने आने के 1 घंटा पहले से ही रोड बंद करवा दिया है मारो..... इन नेता सबको। खुद तो गाड़ियों मे फुर्र से निकल जाएंगे पर उनके इस भारी भरकम चौकसी का आम जनता पर क्या असर होता है यह किसी नेता को सूझता है? आखिर ये नेता कैसे लोगों को परेशान कर अपना सुख भोगते हैं? इन्हें क्या पता। मैं उनकी सभी बातों को बहुत गौर से सुन रहा था। आधे घंटे के इस पैदल सफर में उनके विचारों ने मेरे मन में भी कई सवाल एक साथ आ रहे थे। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री के लिए किए गए ऐसी ही व्यास्था में एक लड़के की मौत हो गई थी। देश में हर जगह नेताओं के आने जाने के लिए ऐसी व्यावस्था रहती है। पर क्या ये व्यावस्था वास्तव में सही है? क्या जनता इससे परेशान नही होती? एक तरफ तो नेताओं की सुरक्षा भी जरूरी है दूसरी तरफ जनता की सुविधा का भी ध्यान रखना है ऐसे में तब क्या किया जाए यह एक सवाल है? यदि इन परिस्थितियों में या ऐसे कार्यक्रम होने से पूर्व ही यातायात सुविधा के लिए एक मैनेजमेंट किया जाए तो काफी हद तक लोगों को परेशानियां नही होगी। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि जनता के लिए, जनता का और जनता के द्वारा ही हमारा लोकतंत्र चलता है।
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