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| सत्ताधारियो के खेल में बेवश भोले ऩाथ |
Sunday, November 10, 2013
प्रकृति का प्रकोप या सत्ताधारियो का खेल
कमजोर और नाजुक रिश्ते भारत और पाकिस्तान के
समुद्र के उतर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित यह विशाल भौगोलिक क्षेत्र भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है. ये बात चरितार्थ है कि समय की ताकत के आगे किसी का वस नहीं चलता, भारत का सौंदर्य, समृद्धि, और उदारता को लूटने के लिए विश्वभर के कई देशों ने अपना गुलाम बनाने की कोशिश की. जैसे ही इंगलैंड का साया भारत पर पड़ी, उन्होंने भारत की आत्मा को झकझोर कर रख दिया. उन्होंने ही अपने स्वार्थ के लिए भारत में धर्म विरोधी भावनाओं को भड़काया और धर्म के ऩाम पर 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान को नया राष्ट्र बना दिया.
ये कैसी अर्थव्यवस्था है भारत और पाकिस्तान की
भारत क्रय-शक्ति-समता P.P.P(Purchasing Power Parity) के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तथा विश्वभर में तेज गति से उभर रहे राष्ट्रों में से एक हैं, विश्वभर के विकसित देशों के दि्वपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापार सम्बंध भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं. भारत और अमेरीका सम्बंध, भारत-यूरोपीय संघ सम्बंध, भारत-जापान, दक्षिण कोरिया के मध्य (EPA- Comprehensive Economic Partnership Agreement) समझौता.Thursday, October 17, 2013
गरीब ही बंधुआ मजदूर क्यों ?
बंधुआ मजदूरी हमारे देश की बहुत बड़ी समस्या है।इस समस्या से हमारे देश के भविष्य अर्थात बच्चे शोषित हो रहे है।खेलने,पढने की उम्र में उन्हे मजबूरन दूसरे के घरों में काम करना पड़ता है ,उनका बचपन गुलामी के जंजीरो में बंध कर रह गया है।
चौका बर्तन की अधिकारी “ लड़कियां नहीं ‘’
भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वयं सहायता समूह ने ग्रामीण महिलाओं के लिए एक स्वर्णिम अवसर लेकर आया। जो ग्रामीण महिलाओं की किस्मत ही बदल दी। जहां महिलाएं आत्मनिर्भर हुई और पारिवारिक फैसलों में भी बढ-चढकर हिस्सा लेने लगीं। उन्हें अब इस बात की चिंता नही हैं कि घर के पुरूष ही काम करेंगे तभी उनके घर के चूल्हे जलेगें। स्वयं सहायता समूह की वजह से ही घरों मे काम करने वाली लड़कियां अब पढ़ाई करने लगी हैं। इसका एक सुदृढ परिणाम है कि लड़कियां अब लड़कों से कदम ताल मिलाकर काम करने लगी है।
लड़कियां ही क्यों, समाज का बोझ ?
हमारे समाज में आए दिन बहुत सारी कुरीतियां देखने को मिलती है, लेकिन सबसे बड़ी बात देखने को मिलती है वो है लड़के-लडकियों में भेदभाव। आदिकाल से ही हमारे समाज में लड़कियों को भोग-विलास की वस्तु माना जाता रहा है।
Wednesday, July 10, 2013
एडर्वड स्नोडेन: साइबर संसार और नागरीक नीजता
अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा ऐंजसी(एनआइए) के गोपनीय निगरानी कार्यक्रम प्रिज्म की जानकारी लीक करने वाले सीआइए के पूर्व कर्मचारी 29 वर्षीय एडर्वड स्नोडेन, अभी तक अमेरिकी पकड़ से बचने में सफल है। यह लेख लिखने जाने तक, स्नोडेन मास्को हवाई अडडे पर रके थे। वह हागकांग से मास्को पहुँचे हैं। हागकांग में उसने कहा, अमेरिका ने चीन के खिलाफ जमकर साईबर जासूसी की है। अमेरिका के जासूसों ने इस वर्ष चीन के शिंधुआ यूनिवर्सिटी को निशाना बनाया। इस यूनिवर्सिटी को चीन का चोटी का शिक्षा व शोध संस्थान माना जाता है। अमेरिकी सरकार लाखों संदेश चुराने के लिए चीन की मोबाइल फोन कंपनियों में भी हैकिंग कर रही है।
एडर्वड स्नोडेन को वेनेजुएला और निकारगुआ ने शरण देने का प्रस्ताव दिया है। उसने इक्वाडोर से शरण मांगी थी। भारत ने शरण देने से इनकार कर दिया है। इस पूरे धटनाक्रम ने कई देशों के संबंध को प्रभावित किया है। वहीं नागरीक नीजता के अधिकार पर भी प्रशन लगाए हैं। अब वैश्विक स्तर पर आंतरिक सुरक्षा, नागरीक नीजता और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में साइबर जासूसी पर दूबारा विचार करना होगा।
स्नोडेन का जुर्म वैश्विक नागरिक अधिकार का उल्लंधन कर रहे अमेरिका का सत्य उजागर कर ना है। सामूहिक निगरानी वैश्विक नागरिक अधिकार का उल्लंगन है। प्रिज्म के खुलासे के बाद दुनिया के कई मुल्क साइबर दनिया में अपनी निजता को लेकर आशंकित और चिंतीत है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर हैरानी और चिंता प्रकट करते हुए कहा है, कि यदी इस कार्यक्रम के तहत भारतीय निजता कानूनों का उल्लंधन हुआ है। तो यह अस्वीकार्य है।
प्रिज्म की शुरूआत पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के वारंटमुक्त धरेलू निगरानी कार्यक्रम की राख से हुआ। जिसे 2007 में मीडिया ने सार्वजनिक कर दिया था। इसके बाद 2007 के प्रोटेक्ट अमेरिका एक्ट और फीसा(फॉरेन एंटेलिजेंसस एक्ट) अमेंडमेंट एक्ट के साए में प्रिज्म का जन्म हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक बिल गेट्स की माइक्रोसॉफ्ट 11 सिंतबर 2007 के इस कार्यक्रम का हिस्सा बनी। इसके बाद याहू, गूगल, फेसबुक आदी। आखिर में अक्टूबर 2012 में एपल इस कार्यक्रम में शामिल हुई। यह कंपनिया उपभोक्ताओं की जानकारियों को किसी एजेंसी के साथ साझा करने से अज्ञानता जाहिर करती है। प्रिज्म के खुलासे के बाद यह सच अविश्वसनिय है ? अब नागरीक नीजता एक धोखा बन कर रह गइ है। राष्ट्रीय सुरक्षा ऐंजसी (एनएसए) इंटरनेट की बड़ी कंपनियों को अपने साथ लेने की कोशिश करती है। इस खुलासे ने कठधरे में आई कंपनियों के सामने साख का संकट खड़ा कर दिया है। निश्चित तौर पर अमेरिकी सरकार आंतकवादी गतिविधियों के खतरे की आशंका के मद्देनजर प्रिज्म अथवा इसी तरह के दूसरे कार्यक्रम लगातार जारी रखेगी।
इटरनेट पर बहुत हद तक अभी भी अमेरिकी नियंत्रण है और अधिकांश बड़ी इंटरनेट कंपनियां अमेरिकी हैं। वे मूलतः वहां के कानूनों से संचलित होती हैं। ऐसे में सवाल भारत व अन्य देशों का है कि वे साइबर संसार में अपनी निजता को कैसे बचाते है। वर्तमान में अंतरराषट्रीय कूटनीति में परसपर एक दूसरे विरोधी जठीलताओं का निदान कैसे करते हैं। अमेरिका चीन पर साइबर हमले का आरोप लगाता है, लेकिन विदेशी मुल्कों की सूचनेएं चुराने वाली अपनी साइबर सेना पर खामोश रहता है। वैश्विक नागरीक असंतोष व सरकारी नीतियों के विरोध, विरोध प्रद्रशन नागरीक समाज के सजग और जागरूक होने का अहट देता है। साइबर संसार ने नगरीक समाज को सश्क्त किया है। अब संसार के किसी भी कोने में किसी भी देश के दूवारा जासूसी अथवा धोखा व छल के लिए जगह नहीं बचती है। नागरीक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को राष्टीय सुरक्षा के नाम पर दबाया नहीं जा सकता है।
एस.एम.मोनिस,पटना
Saturday, June 22, 2013
प्राकृतिक आपदा में चन्दा की संस्कृति से आगे का रास्ता
प्राकृतिक आपदा के तुरत बाद देश के दुसरे हिस्से की सरकारों का कुछ कर्त्तव्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। प्राकृतिक आपदाग्रस्त राज्य की सरकार और जनता के प्रति दुसरे राज्यों की सहानुभूति के सच को दो घटनाओं से समझा जा सकता है - एक राज्य के मुख्यमंत्री ने दुसरे राज्य के दौरे के दिन उस राज्य की जनता को समाचार-पत्रों में पुरे पन्ने के विज्ञापन द्वारा यह एहसास करवाया कि एक राज्य ने दुसरे राज्य को इतनी राशि की मदद की है। वहीं इस दुसरे राज्य की सरकार ने अपने ही राज्य के (दो दिन पहले बर्खास्त किए गए ) स्वास्थ्य मंत्री की प्राण रक्षा की गुहार को बिलकुल अनसुना कर दिया, जबकि यह जगजाहिर है कि उत्तराखंड में बड़ी संख्या में बिहारी भाई-बहन भी फंसे हुए हैं। जो सरकारें अपने राज्य की बड़ी राजनीतिक हस्तियों को बचाने के लिए कोई औपचारिकता नही करती वे सरकारे एक दो करोड़ का चेक देकर अपने किसी अफसर को मातमपुर्सी के लिए भेज देतीं हैं। वही दुसरे राज्य पर एहसान जतानेवाले मुख्यमंत्री एक फिर हेलीकप्टर पर चढ़ कर एहसान जताने निकल पड़ते हैं।
किसी भी आपदा के आने में जनता की भूमिका नगण्य है. संविधान ने देश की संस्कृति का की रक्षा का भार जिनके ऊपर दे रखा है वे ही समलैंगिकता को मुख्यधारा बनाने पर तुले हुए है तो पोलिथिन संस्कृति और केदारनाथ मौज मस्ती करने जाने की संस्कृति का दोष जनता पर डाल कर देश का ही नुकसान कर रहे हैं। इसलिए इस परिस्थिति में मेरे विचार में देश की आपदा प्रबंधन नीति कुछ इस प्रकार की होनी चाहिए:-
किसी भी आपदा के आने में जनता की भूमिका नगण्य है. संविधान ने देश की संस्कृति का की रक्षा का भार जिनके ऊपर दे रखा है वे ही समलैंगिकता को मुख्यधारा बनाने पर तुले हुए है तो पोलिथिन संस्कृति और केदारनाथ मौज मस्ती करने जाने की संस्कृति का दोष जनता पर डाल कर देश का ही नुकसान कर रहे हैं। इसलिए इस परिस्थिति में मेरे विचार में देश की आपदा प्रबंधन नीति कुछ इस प्रकार की होनी चाहिए:-
1. प्राकृतिक आपदा की प्रथम सूचना मिलते ही युद्ध स्तर पर दुसरे राज्य सरकारों को सामग्री जुटाने का काम शुरू कर देना चाहिए। साथ ही जो भी दूसरी संस्थाएं मदद करने की इच्छुक हो उन्हें भी यही करना चाहिए। मौसम के साफ़ होने तक के 12, 24 या 48 घंटो तक यह काम चलता रहे तो देश के 24 राज्य सरकारों और इतने ही स्वयंसेवी संगठनो द्वारा मौसम साफ़ होते ही क्षेत्र में राहत सामग्री लेकर प्रवेश करना आसान होगा। सनद रहे कि एक राज्य सरकार एक रात की नोटिस पर १-२ टन सामग्री तो भेज ही सकती है और ऐसा वे सभी दूसरी संस्थाए भी कर सकती हैं जो 1000 से 10000 करोड़ का आयकर प्रपत्र दाखिल करती हैं।
2. मौसम साफ़ होने के बाद ये सभी संगठन अपने दल-बल के साथ क्षेत्र में अलग अलग दिशाओं से घुस जाएं। जान बचाने को वरीयता तथा स्थानीय लोगो को आसरा देते हुए स्थानीय लोगो तथा उस क्षेत्र में रह रही पुलिस सेना आदि की मदद लेते हुए ये आगे बढती जाएँ, तो जान बचने की तथा चिकित्सा सुविधा मिलाने की संभावनाए बढ़ जायेगी।
3. ज़रा सोचिए जिस राज्य में आपदा आयी है वह सिर्फ नागरिको के ऊपर ही नही आयी है बल्की वहा के कर्मचारियो-अधिकारियों पर भी आयी होती है। जो खुद ही तबाह हो गया हो उससे मदद की उम्मीद करना कहा तक सम्यक है। इस परिस्थिति में देश न जाने किस कानून से कल रहा है कि प्राकृतिक आपदा से जुझने की पुरी जिम्मेवारी स्थानीय प्रशासन से शुरू और सैन्य बलों पर ख़त्म हो जाती है।
4. इसके बाद तबाही की सूचना जैसे जैसे बड़ी होती जाए वैसे वैसे बिना किसी अपने पराये का भेद किए तमाम राज्य सरकारे अपने कर्मचारियो को इस काम में झोकती जाएं। ऐसा करने से प्रथम और सतत मदद मिलना संभव हो जाएगा।
5. सेना नौसेना और अर्धसैनिक बलों को इस बात की आजादी दी जानी चाहिए कि शांतिकाल में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं में मदद हेतु युद्धस्तर पर अधिकतम प्रयास करने, वांछित संख्या में जवानो और उपस्करों के इस्तेमाल करने हेतु वे स्वतन्त्र हैं। इससे हेलीकोप्टर की कमी जैसे मुद्दों से निबटने में आसानी होगी।
6. जब देश की राज्य सरकारे स्वयं स्वत:स्फूर्त मदद नही दे सकतीं तो जनता से चन्दा इकट्ठा करने का कोई मतलब नही है। उसी प्रकार यदि देश के किन्ही 5-10 जिलों में आपदा आयी हो और बाकी लोग हवं करते रहे, मोमबत्तियां जलाते रहें,प्रार्थना करते रहें तो यह खुद के साथ भी छल है और उनलोगों के साथ भी जिन्हें मदद के लिए हाथ चाहिए, वे पैसा खाकर नही जी सकते। यदी पैसा खाकर जीना संभव होता तो 100 रुपये में बिस्कुट और पानी नही खरीदना पड़ता।
7. देश के 25 राज्य सरकारों के पास अपने मुख्यमंत्रियों के चढाने के लिए कम से कम 25 हेलीकोप्टर तो होंगे ही लेकिन घोटाले के उद्देश्य से खरीदे हुए , सेना और वायुसेना के हेलिकोप्टर के भरोसे ये खुद ही उड़ते है। फिर भी इनमे से किसी ने नही कहा कि मेरा हेलीकोप्टर ले जाओ, सभी ने करोड़ का चेक थमा दिया।
8. देश की सभी राज्य सरकारो और स्वयंसेवी संस्थाओं की टीमों को एन डी आर एफ से निर्देशन एवं सहयोग लेते हुए राष्ट्रवादी एकजुटता की भावना से 10 - 20 दिनों तक भारतमाता की सेवा में जुट जाना चाहिए।
करत-करत अभ्यास ते, कर्कट कियो सब शिक्षण
नरोत्तम भास्कर
“आवहु सब मिल रोवहुं भाई, भारत दुर्दशा देखी न जाई” भारतेन्दु हरिश्चंद्र
की यह उक्ति देश को स्वतंत्रता प्राप्त होने के 66 साल बाद भी उतनी ही सटीक
है।अंग्रेजो द्वारा भारत की संपदा को अलग-अलग तरीके अपनाकर लूटकर इंग्लैंड ले जाने
की स्थिति, उसकी विवेचना और उसके प्रभाव को देखते हुए भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने यह
कविता रची थी। आज देश के सभी क्षेत्रों में उतनी ही लूट-मार मची हुई है, जितनी उनके
समय में थी। देश की बौद्धिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए जिम्मेवार शिक्षा
प्रणाली भी इस लूट-मार के कारोबार में उतने ही संलग्न पाये जाते हैं जितना कोई
और।
शुरुआत प्राथमिक शिक्षा से करते हैं। गांधी, महर्षि अरविंद और गुरु
रविन्द्रनाथ टैगोर जैसे विचारकों ने यह कहा था कि प्राथमिक शिक्षा हेतु मातृभाषा ही
सबसे उपयुक्त माध्यम हो सकती है। देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जनता से टैक्स
वसुल कर भारत देश में मनों स्याही और टनों कागज इस विषय पर शोधकार्यों, संगोष्ठीयों
और आयोगों के द्वारा खर्च कर दिए गये, हरेक ने गांधीजी की बात का समर्थन किया।
परिणाम ठीक उलटा हुआ क्योंकि गांधीजी तो वोट पॉलीटिक्स के आधार स्तंभ-मात्र थे,
व्यक्तिगत जीवन में ज्योतिष, झाड़-फूंक और बाहर अंग्रेजीदांपन का दुमुहांपन कई
संविधान-निर्माताओं की जीवन-पद्धति का शगल हुआ करता था। पहले-पहल प्रधानमंत्री के
नातियों ने देहरादून के अंग्रेजी माध्यम के बोर्डींग स्कुलों मे पढ़ा था, यह अलग
विवाद का विषय है कि खानदानवाद के अतिरिक्त उनकी बौद्धिक उपलब्धियां कुछ खास नहीं
थीं।
दुसरी पीढ़ी के प्रशासकों ने अपने बच्चों को डी0ए0वी0 जैसी अंग्रेजी के
कॉरपोरेट विद्दालयों मे भेजा, यहां यह अनुपयुक्त और अनुत्तरित प्रश्न है कि इनका
भविष्य बनाने के लिए पुरे देश का कॉर्पोरेटीकरण करना पड़ा, साथ ही अनुत्तरित प्रश्न
यह भी है कि ऐसा पिछली पिढ़ी द्वारा बनाए काले धन को जायज बनाने के लिए भी किया गया।
अब किंडरगार्डेन और मांटेसरी की
अवधारणा को आधार बना कर दो वर्ष की उम्र से ही विद्दाध्ययन की जिम्मेवारी नई पीढ़ी
पर डाल दी गयी है, जबकि यह तय है कि बचपन बचाओ आंदोलन के युग में चलने वाले इन
किड-स्कुलों में बचपन मिटाने की पुरी व्यवस्था कर दी गई है। किंडरगार्डेन और मांटेसरी दोनों में खेलते-खेलते सिखने की
अवधारणा का की खिचड़ी भारत के अलावा कौन पका सकता था। खिलौने दिखाकर एडमिशन लेने के
बाद हजार रुपये के किताबों की लिस्ट थमाना कोई कैसे भूल सकता है, जो चंद पैसे कमिशन
में लेने की लत ऐसी लगी हुई है।
किताबों के बोझ तले बचपन को दबाने, होमवर्क की मार से चश्मा लगवाने और नंबर
की दौड़ में स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने का पिछले चालीस वर्षों से शिक्षा व्यवस्था
पर लगता रहा है। यह इत्त्फाक की बात नहीं है बचपन बचाओ जैसा एनजीओ-करण भी इसी
शिक्षा व्यवस्था के साथ बढ़ता ही गया – मर्ज बढ़ती गयी ज्यों ज्यों दवा
की।
खुदरा नहीं है
खुदरा माफिया से बेफिक्र भारतीय वित्त व्यवस्था
(नरोत्तम भास्कर)
देश के बिहार जैसे राज्य जिन्हें
अक्सर बीमारु राज्य कह दिया जाता है उनकी एक विशेषता यह है कि दुनिया के सबसे
सस्ते शहरों में से कई यहीं हैं। अमीर राज्यों में प्रति व्यक्ति आय ज्यादा होने
से क्रयशक्ति ज्यादा है और क्रेडिट कार्ड जैसे आधुनिक विनिमय साधन भी ज्यादा है
जिसकी वजह से महंगाई ज्यादा है।
कम क्रयशक्ति वाले बाजार में खुदरा
की जरुरत ज्यादा होती है बजाए उनके जो क्रेडिट कार्ड से खरीदारी करते हों। लेकिन
गरीब की बात सुनता कौन है। आज भी बिहार के गावों में तीन रुपये में समोसा और दो
रुपये में खीरा मिल जाता है, लेकिन वहां बाहरी लोगों को सिर्फ इसलिए भुखा रहना पड़
सकता है क्योंकि खुदरा आपके पास नहीं है और विक्रेता के पास भी नहीं है। गांव तो
भूल जाइए, बिहार के आधे पंचायतों मे अभीतक बैंक ही नहीं पहुंचा है तो खुदरा कौन
उपलब्ध करवाए – ऐसी स्थिति में छोटी जोत वाले जो किसान रोज बाजार में टोकरी में
सब्जी लेकर बेचने जाते हैं, खुदरा की उपलब्धता में कमी का दर्द उन्हें ही पता है।
दुसरी तरफ ग्रामीण खुदरा दुकानदार
उधार ले-देकर काम चलाते हैं जिससे करेंसी से काम चल सके, लेकिन इसकी मार उसके
व्यवसाय पर पड़ती है क्योंकि कभी-कभार आनेवाले या अंजान ग्राहकों को उधार नहीं दिया
जा सकता। ये समाज के वे लोग हैं जिन्हें आज भी एक रुपये की अहमीयत का एहसास है और यह
समाज का वह हिस्सा है जहां दो रुपये के सिक्के के लिए 10 रुपये का नोट लेकर एक
घंटा घुमना पड़ता है।
शहरों की हालत भी बड़ी अच्छी नहीं
है। कई बार ग्राहक और दुकानदार इस बात को लेकर भीड़ जाते हैं कि खुदरा रखना किसकी
जिम्मेवारी है। सुबह-सुबह टेम्पो ड्राइवर की बोहनी खुदरा की वजह से खराब होगी तो
गुस्सा ग्राहक पर ही उतरता है।
“5 किलो आलु बेचने पर 2 रुपया बचता
है, बाजार रोज ऊपर नीचे होता रहता है, कंपीटिशन अलग से है, इसलिए 2-3000 रुपया का
खुदरा रोज लेकर बाजार में बैठना पड़ता है” पटना के राजाबाजार के एक सब्जी विक्रेता
अनिल ने बताया। रोज सब्जी लाने और बेचने के अलावा खुदरा का जुगाड़ करना भी इनकी
रुटीन में शामिल हो गया है। पहले तो आइसक्रीम वाले से जुगाड़ हो जाता था, जब से
आइसक्रीम 5-10 रुपये के डिब्बे में आने लगी वह रास्ता भी बंद हो गया। पंडित जी एक
दुसरे श्रोत थे लेकिन अब उन लोगों ने भी बाजार में आरती घुमाने का काम बटाइदारी पर
देकर खुद बड़े कर्मकांडों को पकड़ लिया।
यह पुछने पर कि बैंक से खुदरा
मिलता है क्या, उसने बताया कि बैंक रोज इतना खुदरा नहीं देते इसलिए कुछ तो बैंक से
जुगाड़ करना होता है और कुछ बाजार से (बैंकिंग की समांतर व्यवस्था) से खुदरा उठाना
पड़ता है।
शहरों मे खुदरा की कमी का विकल्प
बन कर उभरा है 50 पैसे और एक रुपये का चॉकलेट, लेकिन एक रुपये की कीमत समझने वाले
कुछ लोग इसका विरोध करते है और दुकानदार के पास खुदरा आने का इंतजार करते दीख जाते
हैं। झुंझलाते-बुदबुदाते ये लोग यह नहीं समझ पाते कि पैसे से खात्मे से शुरु हुआ
रुपये की हत्या की राष्ट्रीय योजना रुपी नदी, महंगाई और खुदरा की कमी तो दो
किनारों के बीच ही बहती है।
पेश हैं कुछ तथ्य:
·
10,000 रुपये प्रतिदिन कारोबार करने वाले औसत सब्जी
दुकानदार को जरुरत होती है प्रतिदिन 200-300 रुपये के सिक्के और 2000 रुपये के
खुदरा नोटों की।
·
बैंक इतना खुदरा रोजाना देने से कतराते हैं, जिससे
दुकानदारों को 5-10% के बट्टे पर ब्लैक मार्केट से खुदरा लेना पड़ता है।
·
शहरी क्षेत्रों में चाकलेट बने खुदरा के विकल्प, दुकानदार
देते तो हैं लेकिन लेते नहीं, चाकलेट कंपनियों की बल्ले-बल्ले।
·
एक निश्चित सीमा से ज्यादा खुदरा लेन देन पर बैंक विशेष
अधिभार लगाते हैं।
·
बड़े शहरों की कुछ ही बैंक शाखाओं में खुदरा देनेवाली
ए0टी0एम0 उपलब्ध हैं, उनपर पर भी एक बार में खुदरा प्राप्ति की सीमा निश्चित है।
·
खुदरा न रहे तो ग्रामीण क्षेत्रों मे रहना पड़ सकता है आपको
भूखा, चाय भी नहीं मिलेगी।
·
ग्रामीण क्षेत्रों के व्यवसायियों का बुरा हाल, लेन-देन की रकम
छोटी होती है लेकिन खुदरा उपलब्ध नहीं।
·
खुदरा की कमी से ग्रामीण व्यवसायी जान-पहचान के ग्राहकों को
उधार देकर चलाते है धंधा।
·
सिर्फ बड़े नोट उगलने वाले ए0टी0एम0 भी हैं जिम्मेवार।
·
लिक्विडीटी पर तुरत कदम उठानेवाला भारतीय वित्तीय तंत्र
खुदरा के मुद्दे पर रहता है खामोश।
·
परिणाम भुगतते हैं छोटे सब्जी उत्पादक, छोटे किसान, छोटे
व्यवसायी और निम्न तबका।
Tuesday, May 21, 2013
जल संकट से जुड़्ने लगी है बिहार की धरती
जल संकट से
जुड़्ने लगी है बिहार की धरती
आज विश्व की लगभग
60 करोड़ आबादी जल संकट का सामना कर रही है. अदूरदर्शी आर्थिक विकास, बढती
जनसंख्या, औघोगिकीकरण, शहरीकरण और हरित क्रान्ति के साइड इफ़ेक्ट की वजह से भारत
में भी जल संकट व जल प्रदुषण निरंतर बढ्ता जा रहा है. सर्वेक्षण बताते है कि पेय
योग्य 2% जल का 70% भाग दूषित हो गया है और अधिकतर क्षेत्रों में भूगर्भ जल का
स्तर 7 से 10 फ़ीट प्रतिवर्ष निचे जा रहा है. इस आकड़े मे बिहार की भी वैसी ही
भागीदारी है. इसलिए स्वच्छ पेयजल प्रबंधन और भूगर्भ जल का संरक्षण 21 वीं सदी के
बिहार की वास्तविक चुनौती है.
प्रांत के कई
जिले जल संरक्षण की ओर से निश्चिंत दिखायी देते हैं- खासकर उत्तरी बिहार के
क्षेत्र. जबकि वास्तविक स्थिति ठीक इसके उलट है. कभी समस्तीपुर जिले में जल की
समस्या ना के बराबर थी, पर आज वहाँ भूगर्भ जल-स्तर काफ़ी नीचे चला गया है. तलाब व
पोखर सूख चुके हैं. कुल 37462 में से लगभग 10000 चापाकल बेकार पड़े हैं. उल्लेखनीय
है कि समस्तीपुर पुरे प्रांत में बड़े पैमाने पर सब्जी उत्पादन के लिये जाना जाता
है. अब जबकि पानी की कमी हो रही है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पह्चान कब तक
कायम रह पायेगी.
लोक स्वास्थय
अभियंत्रण विभाग, भागलपुर का एक माह का आँकड़ा बताता है कि शहर के उत्तरी क्षेत्र
में जल्स्तर 10 से 15 फ़ीट नीचे चला गया है, जबकि दक्षिणी क्षेत्र में 70 से 75 फ़ीट
नीचे. और तो और, जल संकट से जूझ रहे शहर में एक भी तालाब नही है और ना ही कोई
तकनीक इजाद की गई है. हाँ, हाल के वर्षों में सरकारी बोरिंग की व्यवस्था कुछ जगहों
पर की जा रही है. कमोबेश यही हाल बाढ़ की नगरी कहे जाने वाले जिले खगड़िया की भी है
जहाँ लोग पानी में आरयन, आर्सेनिक, व नाइट्रेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने से
परेशान हैं. दूसरे जिलों की अपेक्षा खगड़िया मे कुंए और तालाबों की संख्या काफ़ी
अधिक थी, पर आज इन्हें पाटकर बहुमंजिली इमारतें खड़ी की जा रही हैं. जल प्रदूषण से बचाव
की दिशा में स्वंयसेवी संस्था ‘समता’के द्वारा ‘मटका फ़िल्टर’ विधि और ‘मेघ पाईन’
अभियान चलाया जा रहा है.
वास्तव में, 2008
में आई भयानक कोशी आपदा (बाढ़) ने प्रभावित जिलों जैसे मधेपुरा, अररिया, सुपौल,
सहरसा आदि के भूगर्भ जल की पारिस्थितिकी में बड़ा परिवर्तन ला दिया है. पेट और
त्वचा से संबंधित रोगों का प्रसार तेजी से हुआ है. साथ हीं, कई चापाकल भी जल स्तर
नीचे जाने की वजह से सूखने लगे हैं.
विशेषग्य बताते
हैं कि नदी, तालाब व कुंए को बचाने से हीं जल संरक्षण की कल्पना को हकीकत की जमीन
पर उतारा जा सकता है. इस्तेमाल लायक पानी के लिये वाटर हार्वेस्टिंग जरुरी है.
राज्य में जल संचय के पुराने तरीके व विधियों को अपनाने की योजना पर काम चल रहा
है. राज्य के 17 जिलों के करीब 1635 आहर-पाईन को फिर से जीवित करने की योजना बनाई
गई है. इसके अलावा, 23 जिलों में रुफ टाउप रैन वाटर हार्वेस्टिंग की योजना स्वीकृत
की गयी है. मगर इन योजनाओं पर हो रहा काम बहुत धीमा है.
राज्य सरकार ने
बिहार भूगर्भ जल अधिनियम 2006 बनाया जिसपर राज्यपाल की मुहर 2007 में लगी. इसके
तहत भूगर्भ जल प्राधिकरण का गठन कर बड़े पैमाने पर नल्कूप व कुंए खोदने की बात कही
गई है. परंतु जमीनी स्तर पर इसका कहीं कोई असर नही दिखता क्योंकि इस कानून को अबतक
लागू ही नही किया जा सका है. बावजूद इसके, कहीं कहीं उम्मीद की किरण दिख जाती है.
जैसेकि पुर्णिंया जिले में रैन वाटर हार्वेस्टिंग योजना के तहत काम हो रहा है.
अन्य उपायों मे बागमती बहुघेशीय परियोजना व मोकामा टाल क्षेत्र में पानी के आर्थिक
विकास के लिए उपयोग शामिल है. परंतु सबसे ज्यादा जरुरी है – जल संरक्षण की योजनाओं
पर ईमानदारी से कार्य करना, जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना, जल संरक्षण के लिये
जन-मानस को पानी के महत्व से अवगत व जागरुक करना. इन उपायों को अपनाए बिना जल
संरक्षण दूर की कौड़ी है.
मदद की आस में खेती
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Monday, February 4, 2013
वैश्वीकरण के दौर में युवाओं की चुनौतियां
उस पीढ़ी की नींव कितनी गहरी तथा मज़बूत है, उसकी दिशा तथा दशा दोनो की स्थिति की पहचान उस पीढ़ी की मानसिकता से पता लगाया जा सकता है। आज युवाओं के मानस पटल पर पड़ने वाले बदलते समाज की नई छवि ने जो नए विचारो को जन्म दिया है उससे उनकी आकांक्षाओं में बदलाव आया है तो दूसरी तरफ कुछ पुराने विचारों के समक्ष तर्क-वितर्क के कारण वह प्रभावित भी हुए हैं। इस स्थिति में आवश्यक्ता है कि युवाओं में आने वाली विचारधारा के स्त्रोत का मूल्यांकन किया जाए ताकि वे एक बेहतर भविष्य के लिए चुनौतियों से लड़ने के लिए कुछ विकल्प तलाश कर सकें।
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