Friday, October 19, 2012

विश्वविद्यालय जीवनदाता या अखाड़ा

प्राचीन काल से विश्वविद्यालय छात्रों के लिए जीवनदाता रहा है। ऐसा आज भी है। विश्वविद्यालय का मतलब होता है एक छत के नीचे सारे संसार का ज्ञान प्राप्त करना। यहां न सिर्फ पढ़ाई बल्कि खेल, अध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञान भी हम प्राप्त करते हैं। विश्वविद्यालय में शिक्षक और छात्रों का संबंध बहुत मित्रवत होता है। जिससे यह समझने में मुश्किल होती है कि छात्र कौन है और शिक्षक कौन। विश्वविद्यालय की एक खासियत यह होती है कि जीवन देने के साथ छात्र के व्यक्तित्व विकास करने में वह महत्वपूर्ण योगदान देता है।

 
परंतु आज के राजनीतिक माहौल में छात्र भी इससे अछूते नहीं रह पाते हैं। वे विश्वविद्यालय प्रांगण को अपनी राजनीति का अड्डा बनाने का प्रयास करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इन छात्र नेताओं को राजनीतिक दलों का सीधा समर्थन प्राप्त होता है यही कारण है कि सभी छात्र संघ किसी न किसी राजनीतिक दल से संबंधित होते हैं। तो क्या विश्वविद्यालय को छात्र राजनीतिक से मुक्त करने की जरूरत है?

बहुत सारे बुद्धिजीवियों का मानना है कि विश्वविद्यालय जाने से सिर्फ वो अपने पाठ्यक्रम से ही ज्ञान नहीं प्राप्त करते हैं बल्कि सामाजिक आचार व्यवहार भी सीखते हैं। विश्वविद्यालय ही हमें सिखाता है कि जीवन किस तरह से व्यतीत किया जाए। लेकिन आज इसकी परिभाषा बदल गयी है विश्वविद्यालय आज असामिजक तत्वों का जमावड़ा हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां पर छात्र सामाजिक सारोकार लिए नामांकन नहीं लेते हैं।

ऐसा लगता है कि इस तरह की गतिविधि को लेकर छात्र और शिक्षक दोनों जिम्मेदार हैं क्योंकि इस तरह के छात्र को शिक्षक का समर्थन प्राप्त होता है। इसमें विश्वविद्यालय भी कम जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि ऐसे असमाजिक कार्यों को करने के बाद भी वो विश्वविद्यालय में बने रहते हैं। इस तरह के छात्र को सत्ताधारी नेता का भी समर्थन प्राप्त होता है जिससे विश्वविद्यालय प्रशासन भी लाचार दिखने लगती है। शिक्षक आपके जिंदगी को सही दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं लेकिन शिक्षक अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उन असमाजिक छात्रों को न सिर्फ समर्थन देते हैं बल्कि ऐसे छात्रों को धन के द्वारा भी मदद करते हैं। क्या इस तरह की गतिविधि विश्वविद्यालय में होना चाहिए या उसे रोकने के लिए किस तरह का प्रयास करना चाहिए। यह अपने आप में यक्ष प्रश्न है।

आज देश भर के विश्वविद्यालय में छात्र नेता को जबर्दस्त समर्थन प्राप्त होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय हो या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यह दो भारत का श्रेष्ठ विश्वविद्यालय में गिने जाते हैं। दोनो विश्वविद्यालय ने देश को कुछ अच्छे श्रेष्ठ नेता दिये  है जिसे नकारा नहीं जा सकता छात्र जीवन में अनुशासन और नेतृत्व गुण के कारण ही ऐसे छात्र देश के नेता बन सके हैं। उन छात्रों ने सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और छात्रों की समस्या को सुलझाने के लिये हर-संभव प्रयास किया है। इसलिए इसको नकारना मुश्किल है कि छात्र को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। क्योंकि ये नेता आज भारत को विकास की तरफ ले जाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

इन उदाहरणों को देखते हुए छात्र राजनीति को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि आज देश को ऐसे नेता की जरूरत है जो देश के बारे में दूरगामी सोच रखता हो और विकास की तरफ ले जाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सके। छात्र राजनीति को समर्थन देने का एक कारण यह भी है कि आज के छात्र आज की पीढ़ी को सबसे अच्छे ढ़ंग से समझ सकते हैं। जिस तरह इस बीस साल में देश में बदलाव आया है उससे युवा नेता की आवश्यकता बढ़ गई है। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि ऐसे छात्रों को मौका देना चाहिए जिनका गैर-कानूनी कार्यों में हाथ न हो, जिनका कोई पुलिस रिकॉर्ड नहीं हो और ऐसे किसी भी राजनीति पार्टी से पहले से जुड़ा हो। ऐसे छात्रों की विश्वविद्यालय में उपस्थिति 75%  से ज्यादा होनी चाहिए। कम से कम 55%  अंक से परीक्षा पास होना चाहिए। इस तरह के छात्र सही मायने में देश के विकास में जबर्दस्त योगदान दे सकते हैं।

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