Sunday, November 4, 2012

एफडीआई और विकास का मिथक

आखिरकार केंद्र सरकार ने भारत में विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये खुदरा क्षेत्र को खोलने की मंजूरी दे ही दी। एविएशन, ऊर्जा और प्रसारण में भी एफडीआई को हरी झंडी दे दी गई है।
भारत सरकार ने एफडीआई के पक्ष में कई बड़े-बड़े दावे किये हैं। यहां तक कि इसे देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के एकमात्र तारणहार के रूप में बताने से भी परहेज नहीं किया है। लेकिन सरकार के इन दावों में किस हद तक सच्चाई छिपी है, ये जानने के लिये हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के काम करने के तरीके को समझना होगा।
असल में बहुराष्ट्रीय कंपनियां लंबी रणनीति के साथ बाजार में उतरती हैं। एफडीआई के नाम पर पहले छोटी रकम खर्च करके बाजार के छोटे खिलाड़ियों को बाहर कर देती हैं। बाजार में एकाधिकार होने के बाद ये कंपनियां अपनी विशाल भंडारण क्षमता से लोगों के बीच कृत्रिम मांग पैदा करती हैं, फिर दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी करके आम जनता की जेब पर डाका डालती हैं। एफडीआई के जाल में फंसकर घरेलू कंपनियां पहले ही दौड़ से बाहर हो चुकी होती हैं। अब लोगों के पास इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।
एक जमाने में औद्योगिक विकास के नाम पर यूरोप ने पूरी दुनिया को गुलाम बनाकर शोषण किया था। वहीं आज एफडीआई के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां विकासशील और पिछड़े देशों का शोषण करती दिख रही हैं। नोकिया, वॉलमार्ट, सोनी, पेप्सिको, कोका-कोला, जेनेरल मोटर्स जैसी कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का टर्नओवर ही भारत के सलाना बजट से कहीं ज्यादा है।
अब प्रश्न यह उठता है कि सरकारी दावों से इतर एफडीआई किसी भी अर्थव्यवस्था में कोई सकारात्मक भूमिका अदा करता है या नहीं ? खासतौर पर अगर भारत के संदर्भ में देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि एफडीआई और विकास का मिथक केवल जनता को भरमाने के लिये गढ़ा गया है। मिसाल के तौर पर भारत में खनन और विनिर्माण के क्षेत्र को ही लें। खनन में 74% और विनिर्माण में 100% एफडीआई की अनुमति है। जबकि भारी मुनाफे की संभावना, ढीली नियमन प्रणाली और लचर कानून के चलते पहले ही खनन क्षेत्र स्टार लाइट, सेसा गोवा, वेदांता रिसोर्सेस जैसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के रडार पर है। झारखंड से लेकर कर्नाटक और राजस्थान से लेकर गोवा तक, पूरे देश में खनन लूट की तस्वीर एक जैसी ही है।
दूसरी तरफ विनिर्माण क्षेत्र में ज्यादा लागत और कम मुनाफे के कारण एक-दो कंपनियों को छोड़कर कोई विदेशी कंपनी आगे नहीं आ रही है। उसपर भी दुर्भाग्य यह कि पूरे देश तो दूर, ये कंपनियां अब तक दिल्ली, मुंबई से बाहर नहीं निकल पाई हैं। इससे एक बात तो साफ होती है कि एफडीआई का प्रवाह कम समय और लागत में अधिक मुनाफे वाले क्षेत्रों की ओर हो रहा है।
हालांकि जिन क्षेत्रों में घरेलू कंपनियां मजबूती से डटी हुई हैं, वहां एफडीआई की रफ्तार काफी कम रही है, जैसे कि भारत की दूरसंचार सेवा। घरेलू टेलीकॉम सेवा कंपनियों की दमदार मौजूदगी और कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के कारण हचिशन टेलीकॉम ने वोडाफोन को अपना कारोबार बेच दिया। लेकिन हरेक क्षेत्र में ऐसा नहीं है। आटोमोबइल्स, एफएमसीजी, फार्मास्यूटिकल्स, रिटेल और मीडिया के क्षेत्रों में घरेलू कंपनियां विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने घुटने टेक चुकी हैं।
सोचने वाली बात है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? यूरोप, अमेरिका जैसे देशों के स्टोर्स में आलू, प्याज और दूध के दाम भारतीय बाजार से सस्ते हैं, जबकि भारत तो एक कृषि प्रधान देश है। दलालों ने इस देश के खुदरा बाजार की जो दुर्गती की है उससे सभी वाकिफ हैं। क्या ऐसे ही लोग विदेशी खुदरा बाजार का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं ?
कहा जा रहा है कि एफडीआई से लोगों को रोजगार मिलेगा। गौरतलब है कि बिना एफडीआई के भारत की लगभग 7.3% जनता को खुदरा क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है। क्या हम अपने घरेलू और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर देश के रोजगार और अर्थव्यवस्था में इजाफा नहीं कर सकते ? दशकों पहले महात्मा गांधी ने भी तो भारत जैसे कृषि प्रधान, अधिक आबादी और विवधताओं वाले देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिये घरेलू और कुटीर उद्योंगों को बढ़ावा देने की ही बात कही थी।
अब आप ही बताइये कि क्या हमारे देश की सरकार को अपने खुदरा बाजार को खुद ही नियंत्रित करने पर विचार नहीं करना चाहिये ?

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