इस आधुनिकता की दौर में बिहार के हर मध्यमवर्गीय परिवार में अपने
बच्चों को इंजीनियर बनाने की ख्वाइश है वह अपने बच्चे को सिर्फ और सिर्फ इंजीनियर
और डॉक्टर बनाना चाहते है। इसके लिए वह हर कष्ट को खुशी-खुशी झेलने के लिए तैयार
रहते है। बच्चे भी अपने माता-पिता की बात को नाकार नहीं पाते है क्योंकि इस परिवार
में बच्चों की इच्छा जानने की कोशिश नहीं की जाती है। वह अपने बच्चों को शुरूआती
दौर से ही कहते रहते है- मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा। यह वाक्यंश भी समाज में देखा
देखी के कारण बोलते है।
इस वर्ग के बच्चे मैट्रिकुलेशन तक सरकारी स्कूल
में पढ़ते है। उसके बाद वह अपने बच्चे को 12वीं की पढ़ाई तथा इंजीनियरिंग की
तैयारी के लिए राज्य की राजधानी पटना भेज देते है
जहां उन्हें फीस के नाम पर मोटी रकम चुकानी पड़ती है। बच्चे उम्र के उस पड़ाव पर होते
है जहां से भटकाव की शुरूआत होती है। जिस समय बच्चों को अपने अभिभावक की दिशा-निर्देश
की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। बच्चों को अभिभावक का एक दोस्त की तरह व्यवहार की
जरूरत होती है उसी समय अभिभावक अपने बच्चे को बेहतर कैरियर के लिए लॉज में भेज
देते है। आज के इस चकाचौंध दौर में कुछ ही बच्चे अपने दायित्व को समझ पाते है।
ज्यादा बच्चे इस चकाचौंध में अपने दायित्व को भूल जाते है। इस तैयारी के दौरान
विद्यार्थी ट्यूशन और लॉज की मकड़जाल में फस जाता है। वह ट्यूशन पढ़ने जाते है,
लॉज में आकर खाना खाता है और दोस्तो के साथ गप्पे मारते रहते है। वह सिर्फ अपने
माता पिता के लिए इंजीनयर बनने के लिए सोचते रहते हैं। सही मायने में वह बनना नहीं
चाहते हैं। वह बाहरी आवंडर में फस जाते है लेकिन इसकी भनक अपने माता-पिता को नहीं
लगने देते हैं। एक तरफ अभिभावक अपने गांव- समाज में अपने बच्चों की प्रशन्नसा करते
नहीं थकता है।
विद्यार्थी इस तैयारी के दौरान लगभग दो-तीन साल गुजार देते हैं उसके बाद खुद अपने अभिभावक से कह देते है तैयारी करने से समय की बर्बादी है, अब प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में नामाकंन लेना में ही बेहतर होगा। इस दो-तीन साल के दौरान विद्यार्थी घर के जमा पूंजी को खत्म कर देते है। लेकिन विद्यार्थी एक बार भी नहीं कह पाते है कि मुझे कुछ और करना है। क्योंकि वह समझता है कि उसके माता-पिता इंजीनियर के रूप में देखना चाहते है। अभिभावक भी अपने बच्चों पर भरोसा करने लगते है लेकिन वह समझ नहीं पाते है कि कैरियर के पहली सीढ़ी की शुरूआत होने वाला है, इसे सहज होकर फैसला लेने की जरूरत है। प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में फीस के लिए मोटी रकम की जरूरत होती है इस फीस के लिए अभिभावक लोन लेने के लिए बैंक का दरवाजा खटखटाते है, वह लोन लेकर कॉलेज की फीस भरते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए इतना पैसा क्यों खर्च करें ? इस बात को अभिभावक समझ नहीं पाते है। क्योंकि मध्यमवर्गीय परिवार में बेटा का इंजीनियर बनना बहुत बड़ी उपलब्धि समझते हैं।
विद्यार्थी कॉलेज में एक-दो सेमेस्टेर की पढाई करते है और विद्यार्थी कुछ हद तक मानसिक रूप परिपक्य हो जाते है। उसके बाद वह समझ पाते है कि प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करना कितना सार्थक होता है। लेकिन इस समय सोचने से कोई फायदा होने वाला तो है नहीं ! क्योंकि इस समय अभिभावक के उपर भी लोन का बोझ हो जाता है और विद्यार्थी के ऊपर नौकरी की चिंता। अभिभावक सोचते हैं कि बेटे की नौकरी लगने पर सारे लोन चुकता कर दुगां। अब देखा जाए तो सारा बोझ विद्यार्थी के ऊपर आ जाता है लेकिन विद्यार्थी बेचारा बन जाता है। सही कैरियर के चुनाव नहीं करने के कारण पश्यचताप के अलावा कुछ नहीं रहता हैं। वह कोई नौकरी तो पकड़ लेता है लेकिन जीवन भर अपने आप को कोसते रहता है।
ये मेरे अपने विचार है जो कि समाज में देखते आ रहा हूं। लेकिन बच्चों के कैरियर के प्रति सजग होने के मतलब यह नहीं है कि आप जो चाहे आपका बेटा बनें बल्कि आपका बेटा कैरियर का चुनाव खुद करे जिसमें उसका लगन हो। अपने बच्चों को कैरियर के प्रति स्वत्रंत होकर कर सोचने का मौका दें। उसके कैरियर के चुनाव में अपनी समाजिक बंदिशों या समाजिक प्रतिष्ठा को सामने न लायें। विद्यार्थी द्वारा चुनी गई कैरियर आपके प्रतिष्ठा में चार-चांद लगायेगी और आपके बच्चों का भविष्य भी उज्जवल होगा। आज के इस वैश्यवीकरण के दौर में प्रत्येक कैरियर क्षेत्र अपने आप में बेहर उम्मीद रखता है। जहां से आपके बच्चे आपका नाम रौशन कर सकते हैं।
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