Thursday, September 4, 2014

“भगवान” बना “सौदागर”

भगवान वास्तव में है या नहीं यह तो अभी भी रहस्य है, परन्तु पृथ्वी पर अगर किसी को भगवान का दर्जा दिया गया है तो व है डॉक्टर। डॉक्टर मरते हुए को जीवनदान दे सकते हैं। इंसान अपनी बीमारी के इलाज के लिए सिर्फ डॉक्टर पर ही निर्भर रहता है। परन्तु आज कल ऐसा लगता है की चिकित्सा व्यवस्था एक बड़े व्यवसाय के रूप में फैलता जा रहा है, जिसमे अधिकांश डॉक्टर इलाज को छोड़ कर मुनाफे को प्राथमिकता देते नज़र आ रहे हैं।
हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिसमे डॉक्टरों द्वारा बिना ज़रूरत की दवाईयां तथा टेस्ट की सलाह दे दी जाती है, जिसका उसकी बीमारी से कोई संबंध नहीं होता।
आज के डॉक्टर मरीज का अधिक से अधिक दोहन करते हैं। साधारण प्रसव को जटिल बनाकर ऑपरेशन की आवश्यकता बताते हैं और मरीज़ के सामने लम्बी सी बिल रख देते हैं। दैनिक जागरण के एक स्टिंग ऑपरेशन में डॉक्टरों की अवैध कमाई का खुलासा हुआ था, जिसमें एक युवती को गर्भवती बता दिया गया था जबकि वो गर्भवती थी ही नहीं।

आलम यह है की अब दवा भी उन्हीं दुकानों में मिलती हैं, जहां के लिए डॉक्टर सलाह देते हैं। दरअसल सच्चाई यह है की दवा कंपनियों से डॉक्टरों की सांठ-गांठ होती है, या यूं कहें की चंद रुपयों की लालच में डॉक्टर दवा कंपनियों के हाथों बिक जाते हैं। और इसका बोझ आम जनता पर आ जाता है। क्योंकि डॉक्टर उन्ही दवाओं की सलाह देते हैं जिन्हें दवा कम्पनी सलाह देने के लिए कहती है। और ये दवाईयां काफी महंगी होती हैं।
 
आम इंसानों के दर्द की दास्तान यहीं ख़त्म नहीं होती। मरीजों की बीमारी की जांच के लिए भी जांच घर निर्देशित की जाती है। अमानत अंसारी जो की एक विद्यार्थी है, उसने अपने इलाज के लिए किसी अन्य जाँच घर से जांच करवायी थी। लेकिन डॉक्टर ने उसकी रिपोर्ट को न मानते हुए दोबारा उसी जांच को अपने द्वारा निर्देशित जांच घर से जांच कराने की सलाह दे दी।

जहां महंगाई के कारण आलू-प्याज़, हरी सब्जियां, एवं फल आम इंसान की थैलियों से दूर होते जा रहे हैं वही बदलते वातावरण के कारण नई-नई बीमारियां सामने आ रहीं हैं जिससे डॉक्टरों के व्यवसाय और फलफूल रहे हैं। यह ज्यादती सिर्फ यहीं पर समाप्त नहीं होती, बाज़ार में इस समय एक ही दवाई विभिन्न कंपनियों द्वारा विभिन्न दरो पर उपलब्ध है। जैसे :- ब्लड-प्रेशर और सीने में दर्द की दवा एम्लोडिपाइन के दो ब्रांड एम्लोदैक और एम्लोगार्ड के दस गोलियों के पत्ते की कीमत क्रमशः रू. 21 और रू. 77 है , यानी साढ़े तीन गुना से ज्यादा का अंतर।

हृदयरोगियों को दी जाने वाली क्लोपिदोग्रेल की ब्रांड नोक्लोट की कीमत दस गोलियों के लिए रू. 78 है जबकि सनोफी कंपनी की इसी दवा के ब्रांड क्लाविक्स के एक पत्ते की कीमत 270 रू है यानि लगभग 13 गुणा का अंतर। दवाईयों के मूल्य में ये अंतर दवा कम्पनी को हो रहे अनुचित फायदे को दर्शाता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा डॉक्टरों की जेब में भी जाता है, जो उन्हें इस तरह की महंगी दवाइयों की सलाह देने के लिए प्रेरित करता है।
बिहार में कुछ ऐसे निजी संस्थान हैं जहाँ के नाम बड़े और दर्शन छोटे हैं। जैसे :- एन.एम.सी.एच., पी.एम.सी.एच., कुर्जी हॉस्पिटल इत्यादि। यही कुछ ऐसे भी नये हॉस्पिटल  हैं जहां अनेक सुविधाओं के साथ साथ मरीजों की संतुष्टि पर बल तो दिया जाता है, परन्तु वहां की  फ़ीस सुनकर ही आम आदमी दिमागी रूप से पीड़ित हो जाता है। पारस हॉस्पिटल जैसे ऐसे कई हॉस्पिटल हैं जहां इलाज से पहले फीस की मांग होती है, तो सवाल यह उठता है की आपातकालीन स्थिति में मरता हुआ कोई व्यक्ति पहले इलाज करवाये या फी जमा करे?

होम्योपैथी और आयुर्वेद के डॉक्टर तो मरीज़ का धीरे -धीरे दोहन करते हैं और उन्हें ज्ञात भी नहीं होता कि उनकी जेब से कब हजारों रुपये निकल गए और मर्ज उसी प्रकार मुंह चिढ़ा रहा होता है I वे तो मरीज़ को यह कह कर इलाज करते हैं कि पहले हम मर्ज को बढ़ाते हैं, तब इलाज करते हैं कि पूर्णरूपेण जड़ से  मर्ज दूर हो मर्ज तो दूर नहीं होता मरीज जरूर अपने परिवार से दूर चला जाता है।


डॉक्टर शपथ लेते वक्त ये कहते हैं:-
1.       मैं अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा में दे दूंगा।


2.       मैं मानव जीवन के प्रति पूरी श्रध्दा रखूंगा।


3.       मैं कभी भी धर्म, जाति, राष्ट्रीयता, अमीर-गरीब के बीच अपने कर्त्तव्य में कोई भेद-भाव नहीं रखूंगा।


4.        मैं मरीज़ के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दूंगा।
परन्तु, आज के डॉक्टर की भूमिका पर अब प्रश्नवाचक चिन्ह लग चुका है।
क्या डॉक्टर मरीजों के साथ न्याय कर रहे हैं?                                    
क्या डॉक्टर अपने वचनों का पालन कर रहे हैं?
अगर नही, तो इस बीमारी का इलाज क्या होगा?

5 comments:

  1. ऐसे में ते इंसानो का भगवान पर से भरोसा उठ जाना है....

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  2. इसके लिए हमे मीलकर कुछ करना चिहिए ताकि डॉक्टर द्वारा किए गए अत्याचार से लोगों को निजात मिल सके

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  3. चिकित्सा आज के समय में एक पेशा बन गया है जहां किसी भी प्रकार की नैतिकता की उम्मीद नहीं रह गई लगता है। अगर डॉक्टर अपनी शपथ को याद रखें तो शायद आम जनजीवन का भला हो पाएगा और चिकित्सक अपने खोए सम्मान को दोबारा पाने में कामयाब होंगे।

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