Friday, September 12, 2014

“आधी रोटी खाएंगे,फिर भी स्कूल जाएंगे”


जब मैं लगभग दूसरी या तीसरी कक्षा में था, तब ऊपर्युक्त नारा के साथ हमारे विद्यालय के सारे छात्र समाज में जागरूकता हेतु लगभग 10 किलोमीटर से ज्यादा का चक्कर लगाया था ताकि हमारे ग्रामीण जागरूक हो और अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विद्यालय भेजें. गौरतलब है की हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग भोजन की कमी के कारण शिक्षा से वंचित रह जाता है, यह वर्ग स्कूल भेजने के बजाय बच्चों को मेहनत-मजदूरी के लिए भेज देते हैं. 


कम आयु के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए मिड डे मील जैसी योजना की शुरुआत की गयी थी. मिड डे मील की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को प्राथमिक स्कूलों के लाभ के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया था. जिसे 2002 मे बढ़ाकर न केवल सरकारी बल्कि सरकारी सहायता प्राप्त और स्थानीय निकायों के स्कूलों के कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों के लिए किया गया था. वर्तमान मे इस कार्यक्रम को पहली से आठवीं तक की पढ़ाई कर रहे बच्चों को भी शामिल किया गया है. इस योजना का उद्देश्य स्कूलों में बच्चों की भागीदारी को बढ़ाना, गरीब एवं कमजोर वर्ग के बच्चों को भुखमरी से बचाना,स्कूली बच्चों को स्वस्थ एवं सेहतमंद बनाना और सामाजिक समानता को बढ़ावा देना था.


यदि हम शिक्षा से संबंधित प्रावधानों पर नज़र डाले तो वर्ष 1950 में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा देने के लिए संविधान में प्रतिबद्धता का प्रावधान किया गया था. इसे अनुच्छेद-45 के तहत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया है. 12 दिसम्बर,2002 को संविधान के 86वें संसोधन अधिनियम के द्वारा अनुच्छेद-21अ को संसोधित करके शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया. इस संसोधन को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून,2009’ पारित किया गया जो,1 अप्रैल 2010 से पूरे देश में लागू है. यहां प्रश्न उठता है की शिक्षा का अधिकार अधिनियम,2009’ क्या है ? इस अधिनियम के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को पूर्णतः निःशुल्क एवं अनिवार्य कर दिया गया है. निः शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का तात्पर्य है कि प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के लिए बच्चों या उनके अभिभावकों से कोई भी प्रत्यक्ष शुल्क(स्कूल फीस) या अप्रत्यक्ष शुल्क(यूनिफार्म,पाठ्य-पुस्तकें,भोजन,परिवहन) नहीं लिया जा सकता. सरकार बच्चों को निः शुल्क स्कूलिंग उपलब्ध कराएगी जब तक कि उसकी प्राथमिक शिक्षा पूरी नही हो जाती और यह केंद्र तथा राज्यों के लिए कानूनी बाध्यता है कि निः शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सभी को आसानी से उपलब्ध हो सकें. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा कि अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 5 मई, 2014 को महत्वपूर्ण निर्णय लेता हुए शिक्षा का अधिकार कानून को संवैधानिक रूप से वैद्य ठहराया है. सर्वोच्च न्यायालय के इस नए निर्णय के पश्चात अब निजी विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित रहेगी.


यह निर्णय को सुनकर उन वर्गों में खुशी एवं आशा कि किरण दिखाई दी जो आर्थिक रूप से बिल्कुल कमजोर है, उन्हे लगा कि हमारे बच्चे भी अच्छे निजी विद्यालय में पढ़कर अपना बेहतर भविष्य बना सकेंगें, लेकिन ऐसा हो ना सका. निजी विद्यालयों कि संख्या हमारे देश मे लगभग 28% तक पहुंच चुकी है और दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है है. न्यायालय के निर्णय आने के बाद भी निजी विद्यालयों के द्वारा शिक्षा का अधिकार कानून का उल्लंघन किया जा रहा है. हमारें आशान्वित वर्गों में से गिने चुने को ही इस अधिकार के तहत नामांकन हो पाया है.जिसका नामांकन भी हुआ है उसे अलग से कक्षा दी जा रही है.इससे पूंजीपति वर्गों के बच्चों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के बीच खाई बढ़ती जा रही है.कानून सामाजिक समानता के लिए बना था और समाज मे असमानता बढ़ती जा रही है वह दिन कब आएगा जब अमीरी-गरीबी कि यह असमानता खत्म होगी,दोनों वर्गों के बच्चे साथ मिल कर खेलेंगें,साथ खाना मिल बाँट कर खाएंगें और अमीर दोस्त अपने गरीब दोस्त को अपने कार से उसे उसके घर छोड़ने जाएंगें, हमारे देश का यह सपना कब पूरा होगा ?


भारत को दुनिया में महाशक्ति बनने की बात बहुत ज्याजा आजकल हमारे देश मे की जा रही है, नेता,राजनीतिज्ञ अक्सर महाशक्ति बनने की बात करते रहते है जैसे की सभी के सभी जादूगर है,छड़ी घुमाएंगे और भारत एक महाशक्ति बन जाएगा. हम सब भलीभाँति जानते है की शिक्षा के बिना कोई भी समाज तरक्की नही कर सकता है और न ही वह समाज में मौजूद चुनौतियों का मुक़ाबला कर सकता है . इस कटु सत्य से मुह मोड़ कर हम महाशक्ति बनने की बात नहीं कर सकते है.

शिक्षा का अधिकार कानून के फलस्वरूप बच्चों की उपस्थिति तथा विद्यालयों तक पहुंच तो बढ़ी है परन्तु इस दौरान शिक्षा की गुणवत्ता में तेजी से कमी आई है. वर्ष 2013 में प्रकाशित एक गैर-सरकारी संगठन 'प्रथम' की रिपोर्ट से हमारे देश की प्रथिम शिक्षा का अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं की किस कदर शिक्षा स्टार में गिरावट आई है. इस रिपोर्ट के अनुसार 6 से 14 वर्ष के बच्चों के नामांकन तो भरी संख्या में हो रहे है लेकिन अभी भी लगभग 7 करोड़ से ज्यादा बच्चे विद्यालयों से दूर है. 57% बच्चे अंग्रेजी नही पढ़ सकता है और 1 से 9 तक की संख्याओं को नही पहचान पाते है. रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 1 से 5 तक के 12% बच्चे एक भी अक्षर नहीं पहचान पाते हैं. देश में 7.74 लाख अध्यापको के पास पढने के लिए ज़रूरी योग्यता नहीं है. देश के 50% से अधिक विद्यालयों में शिक्षक पुरे नही हैं. अभी देश में ऐसा लग रहा है कि बच्चे सिर्फ खिचड़ी खाने स्कूल जा रहे है. निजी विद्यालयों आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को एडमिशन नहीं हो पा रहा है और सरकारी विद्यालयों  में शिक्षा गुणवत्ता का स्तर नीचे जा रहा है ऐसे में शिक्षा का अधिकार कानून पर प्रश्न चिन्ह लग गया हैं. यदि हमारे देश में शिक्षा का अधिकार कानून होने के बाबजूद शिक्षा व्यवस्था की अगर ऐसी स्थिति रहीं तो क्या हमारा देश भारत एक विकसित राष्ट्र बन पाएगा ?
 

 
 

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