बह गए घर, डूब गए सपने, फिर भी डटे रहे जन्नत के बाशिंदे।।
भारत
के जन्नत जम्मू-कश्मीर में जल प्रलय के सात दिनों से बाढ़ का कहर जारी
हैं। जन्नत में बाढ़ ने जो हालत उत्पन्न किए हैं, वें गत वर्ष उतराखंड में
हुई जल प्रलय की यादें ताज़ा कर रही हैं। हालांकी पहाड़ी क्षेत्र होने के
कारण बरसात और हिमपात होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन एक बार फिर कुदरत अपना कहर इस कदर बरसाएगी इसका अनुमान किसी को नहीं था।
झेलम नदी का पानी श्रीनगर में सैलाब लेते आया हैं, सड़कें डूब चूकी हैं, घरो में 8-10 फीट तक पानी भर चुका हैं। बोलने में तो सरल लगता है, किंतु बाढ़ में फंसे लोग अपनी जान बचाने हेतु छत पर जा बैठे हैं कि कब कोई उन्हे बचाने आए। हालांकी नदियों में ग्लेशियरों की वजह से पूरे साल जल प्रवाह बना रहता हैं, किंतु पिछले कुछ दिनों में भारी बरसात ने भारत के इस स्वर्ग को जहन्नुम बना दिया हैं। पूरा देश भारत के इस स्वर्ग को बचाने में जुट गई हैं।
वायुसेना ने राहत हेतु 29 विमान और हेलिकाँप्टर तैनात किए हैं, उधर सशस्त्र बलों ने भी बचाव में कोई कसर नही छोड़ी हैं। सेना ने अब तक 12000 से भी अधिक लोगो को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया हैं। करीब 200 से भी अधिक लोगो की मौत हो चुकी और कई लापताह हैं, जिसमे जम्मु-कश्मीर के तीन मंत्री भी शामिल हैं। वायुसेना के जवान लगातार बाढ़ में फंसे लोगो को निकालने और उन्हे खाने-पीने का समान मुहैया कराने में जुटी हुई हैं। लोगो में एक दर सा बैठ गया हैं, जिस जन्नत में लोग सात समंदर पार यहां की खुबसूरत निशात और शालीमार बाघ, डल झील की शीकारा को सिर्फ निहारने और उसका लुप्त उठाने आते थे उनका स्तितव मानो जहन्नुम का सैर पर गया हो। सीधे शब्दो में क्हा जाए तो चारो तरफ सिर्फ और सिर्फ तबाही ही हैं। अभी नुकसान का सही-सही आकलन संभव नहीं है। जल्दी ही वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

केंद्र सरकार ने 1000 करोड़ की सहायता का ऐलान किया है जिसमे देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों का सहयोग हैं। जन्नत पर कुदरत का ऐसा कहर कभी नही टूटा था। अगर केंद्र की बात करे तो मोदी सरकार के लिए जम्मु-कश्मीर में आई यह प्राकृतिक आपदा एक बड़ी चुनौती हैं, जो नमो की सरकार के यात्रा में चार चाँद लगाएगा।
सरकार तो मदद कर ही रही हैं, लेकिन सही मायने में यहाँ के बाशिंदो को सरकार से ज्यादा ऊपर वाले की मदद की अधिक दरकार हैं, ताकि बेहतर मौसम के साथ बाढ़ का पानी घटे और साथ में उनका दर्द भी।
भारत
के जन्नत जम्मू-कश्मीर में जल प्रलय के सात दिनों से बाढ़ का कहर जारी
हैं। जन्नत में बाढ़ ने जो हालत उत्पन्न किए हैं, वें गत वर्ष उतराखंड में
हुई जल प्रलय की यादें ताज़ा कर रही हैं। हालांकी पहाड़ी क्षेत्र होने के
कारण बरसात और हिमपात होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन एक बार फिर कुदरत अपना कहर इस कदर बरसाएगी इसका अनुमान किसी को नहीं था। झेलम नदी का पानी श्रीनगर में सैलाब लेते आया हैं, सड़कें डूब चूकी हैं, घरो में 8-10 फीट तक पानी भर चुका हैं। बोलने में तो सरल लगता है, किंतु बाढ़ में फंसे लोग अपनी जान बचाने हेतु छत पर जा बैठे हैं कि कब कोई उन्हे बचाने आए। हालांकी नदियों में ग्लेशियरों की वजह से पूरे साल जल प्रवाह बना रहता हैं, किंतु पिछले कुछ दिनों में भारी बरसात ने भारत के इस स्वर्ग को जहन्नुम बना दिया हैं। पूरा देश भारत के इस स्वर्ग को बचाने में जुट गई हैं।
जम्मु-कश्मीर देश का बेहद ही संवेदनशील क्षेत्र हैं, और पिछले कुछ महिनों से सीमा पर लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं, और सीमा पर तनाव जैसा माहौल पूरे वर्ष बना रहता है। लेकिन प्रश्न यह है कि कुदरत के इस कहर को रोका जाना इंसानो के परे हैं, किंतु बाढ़, सुनामी, भूकंप जैसे "एक्ट ऑफ गॉड" पूर्वानुमान लगाने के साधन तो हम बना ही चुके हैं। एक बार फिर हम आपदा प्रबंधन के मामले में कितने कमज़ोर हो चुके है यह बात सामने आयी हैं।
वायुसेना ने राहत हेतु 29 विमान और हेलिकाँप्टर तैनात किए हैं, उधर सशस्त्र बलों ने भी बचाव में कोई कसर नही छोड़ी हैं। सेना ने अब तक 12000 से भी अधिक लोगो को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया हैं। करीब 200 से भी अधिक लोगो की मौत हो चुकी और कई लापताह हैं, जिसमे जम्मु-कश्मीर के तीन मंत्री भी शामिल हैं। वायुसेना के जवान लगातार बाढ़ में फंसे लोगो को निकालने और उन्हे खाने-पीने का समान मुहैया कराने में जुटी हुई हैं। लोगो में एक दर सा बैठ गया हैं, जिस जन्नत में लोग सात समंदर पार यहां की खुबसूरत निशात और शालीमार बाघ, डल झील की शीकारा को सिर्फ निहारने और उसका लुप्त उठाने आते थे उनका स्तितव मानो जहन्नुम का सैर पर गया हो। सीधे शब्दो में क्हा जाए तो चारो तरफ सिर्फ और सिर्फ तबाही ही हैं। अभी नुकसान का सही-सही आकलन संभव नहीं है। जल्दी ही वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

केंद्र सरकार ने 1000 करोड़ की सहायता का ऐलान किया है जिसमे देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों का सहयोग हैं। जन्नत पर कुदरत का ऐसा कहर कभी नही टूटा था। अगर केंद्र की बात करे तो मोदी सरकार के लिए जम्मु-कश्मीर में आई यह प्राकृतिक आपदा एक बड़ी चुनौती हैं, जो नमो की सरकार के यात्रा में चार चाँद लगाएगा।
सरकार तो मदद कर ही रही हैं, लेकिन सही मायने में यहाँ के बाशिंदो को सरकार से ज्यादा ऊपर वाले की मदद की अधिक दरकार हैं, ताकि बेहतर मौसम के साथ बाढ़ का पानी घटे और साथ में उनका दर्द भी।

“सैलाब में दूबतूी जन्नत” इस हेडलाईन को सुधारें
ReplyDeleteव्याकरणीय अशुद्धि के अलावे बाकि लेख फर्स्ट क्लास है.....
ReplyDeleteaapki headline me bhi galatiyaan hain...
ReplyDeleteशब्दों का सरलीकरण किया जा चुका हैं, मित्रों।
ReplyDeleteगलत, अभी भी गलतियां हैं .
Deleteअच्छा है...........
ReplyDeleteसाकेत शब्दों में अशुद्धियों पर ध्यान दो और तुम अपने टॉपिक से भटक गये हो।
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