Tuesday, September 9, 2014

अंधविश्वास पर बढ़ता विश्वास

जहां आज दुनिया चांद और ग्रहों तक पहुंच रही है वहीं समाज का एक बड़ा वर्ग ग्रह और नक्षत्रों में फंसा पड़ा है. विज्ञान जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है उससे कहीं ज्यादा तेजी से अंधविश्वास बढ़ रहा है. यह एक सामाजिक समस्या है जो किसी भी देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर होने से रोकता है.
भारत के हर गांव में आस्था के नाम पर कई गोरखधंधे होते हैं. ऐसे कई साधू-महात्मा हैं जिनका भगवान से सीधा कनेक्शन होता है और वे दीन-दुखियों की समस्यायों का निराकरण करते हैं. ऐसे कई तांत्रिक बाबा भी हैं जो आत्माओं को वश में करने में सक्षम होते हैं. कुछ भगवान रुपी बाबा तो ऐसे हैं जो कुछ चमत्कार दिखाकर लोगों की आस्था का गलत फायदा उठाते हैं. वास्तविक तौर पर वे आम इंसान भी नहीं बल्कि शैतान होते हैं. हाल के दिनों में ऐसे कई बाबाओं के असल चहरे सामने आये हैं, जिन्होंने भक्तों को खूब लुटा. पिछले दिनों कई बाबाओं पर गंभीर आरोप लगे और कुछ पर तो अदालतों में केस भी चल रहे हैं जिनमें नित्यानन्द बाबा, आसाराम बापू, निर्मल बाबा के नाम प्रमुख हैं। ऐसा नहीं है की केवल समाज का निम्न वर्ग ही अन्धविश्वास की गिरफ्त में आ जाता है, बल्कि उच्च वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग भी इससे अछूते नहीं हैं. या यूं कहें की जो जितना सामर्थ्यवान है वो उतना ही अन्धविश्वासी है, क्यूंकि उसे अपने धन को बचाए रखने की चिंता होती है.
इसे विडम्बना ही कहेंगे की जिस देश को मां कहा जाता है और जहां स्त्रिओं को देवी माना जाता है वहीं पर उसे डायन बताकर प्रताड़ित किया जाता है. भारत के ऐसे कई राज्य हैं जहां डायन और काले जादू के नाम पर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ों के अनुसार 2008 में 768 महिलाओं को डायन बताकर हत्या कर दी गयी थी. 2005-2010 तक उड़ीसा के सुंदरवन जिले में 35 लोगों की हत्या जादू-टोने की वजह से हुई थी. असम में 2001-2006 तक तांत्रिकों के काले जादू के कारण लगभग 300 लोगों की मौत हुई थी. 2003 में बिहार के मुज्ज़फरपुर में तीन महिलाओं को डायन करार दे दिया गया, जिन्होंने बाद में आत्महत्या कर ली. सितम्बर 2013 में छत्तीसगढ़ के जसपुर ज़िले में काले जादू के नाम पर एक महिला की हत्या कर दी गयी तथा उसकी बेटी के साथ बलात्कार किया गया. यूं तो भारत में टोनही प्रताड़ना अधिनियम 2005 के तहत महिलाओं को डायन बताने पर 3 साल की सजा तथा शारीरिक शोषण करने पर 5 साल की सजा का प्रावधान है, परन्तु उपरोक्त आंकड़ों को देखें तो यह अधिनियम कागज़ी मालूम होते हैं.
सवाल यह उठता है की आधुनिक युग में, तकनीकी क्रांति के बावजूद अन्धविश्वास पर विश्वास बढ़ता जा रहा है, कैसे?
पहला कारण तो कुछ मीडिया संस्थान है जो अपने निजी व्यवसाय के लिए अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. कई प्रमुख टीवी चैनल ऐसे हैं जो चमत्कारी बाबाओं के लिए स्पेशल प्रोग्राम प्रसारित करते हैं. लोग प्रश्न पूछते हैं और बाबा जवाब देते हैं. सामान्य परेशानी वाले सवालों के असामान्य जवाब. एक छात्रा पूछती है, बाबा मैं आर्ट्स लूँ, कॉमर्स लूँ या फिर साइंस. बाबा कहते हैं- पहले ये बताओ आखिरी बार रोटी कब बनाई है, रोज एक रोटी बनाना शुरू कर दो.
4 मई 2012 में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा था कि “हमारा मीडिया आज समाज के अहम और गंभीर मुद्दों से इतर अंधविश्वास और संकुचित मानसिकता को बढ़ावा दे रहा है”. उनका यह कथन काफी हद तह सही भी है क्यूंकि, जहां समाचार चैनलों का कर्त्तव्य जागरूकता फैलाना होता है वहीँ कुछ प्रमुख समाचार चैनल अन्धविश्वास फैलाते नज़र आते हैं. जैसेः आजतक पर ‘आपके तारे’ और ‘धर्म’, इंडिया टीवी पर ‘भविष्यवाणी’, जी न्यूज़ पर ‘मंथन’ इत्यादि चैनलों में लोगों की भविष्यवाणी बताई जाती है. ज़रा सोचें यदि भारत के लोगों को आने वाले कल की खबर हो जाये तो लोग स्वयं ही अपने कठिनाईयों को दूर कर लेंगे और शायद भारत अमेरिका से भी सुखी-संपन्न देश हो जायेगा. खैर, अंधविश्वास का प्रसार यहीं ख़त्म नहीं होता. समाचार पत्र तो ना जाने कबसे इसकी चपेट में आ चुके हैं. आज कल कई प्रमुख अखबारों जैसे दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर इत्यादि पत्रों में ‘दिव्य हनुमान चालीसा कवच’ जैसे कॉमर्शियल प्रमोशनल एड भी देखने को मिल रहे हैं.
दूसरा कारण समाज का माध्यम वर्ग है जो अपने धन के विलुप्त होने के डर से नामी-गिरामी पंडितों की शरण में चला जाता है. जहां वो धीर-धीरे लाखो रूपए अपने ग्रह-नक्षत्रों की दशा ठीक करवाने में दे देता है. जिससे पंडितों का बोलबाला बढ़ता चला जाता है.
तीसरा कारण कुछ सेलेब्रिटी हैं जो आम लोगों के लिए रोल मॉडल होते हैं परन्तु अपनी निजी जिन्दगी में अंधविश्वास को बढ़ावा देते दिख जाते हैं. सबसे बड़ा उदहारण ऐश्वर्या की शादी में देखने को मिला जहां आस्था से खिलवार हुआ था.
 http://srbachchan.tumblr.com/post/24946827000.    
तो सवाल यह उठता है की लोग ऐसे रोल मॉडलों का अनुसरण अपनी निजी जिंदगी में भी नहीं करेंगे क्या?  एक अन्य उदहारण : एक बड़े एयरलाइन के मालिक की जिसे अपने कर्मचारियों को देने के लिए वेतन नहीं है परन्तु कर्नाटक के सुब्रमण्यम मंदिर में 80 लाख रूपए के सोने के दरवाज़े चढ़ावे के लिए जरूर होते हैं. हालांकि अपने काले धन को छुपाने के ये बेहतरीन उपाय हैं. लेकिन आम आदमी इस तरह के पाखंड को आस्था ही समझता है.
चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है अशिक्षा और अज्ञानता. भारत गांवों का देश है और 70-80% लोग गांवों में रहते हैं, जहां शिक्षा-व्यवस्था की हालत बहुत जर्जर है. हालांकि शिक्षित व्यक्ति भी अंधविश्वास पर विश्वास करने लगता है गौरतलब है की 2011 के जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर 74% है. तो इस तरह भारत का एक बड़ा वर्ग तो साक्षर भी नहीं है. जहां न ज्ञान हो न विज्ञान वहां अन्धविश्वास का वास तो निश्चित है. फिर भी ज्यादा से ज्यादा शिक्षा और ज्ञान का प्रसार ही कैंसर रुपी अंधविश्वास का एकमात्र इलाज है.

8 comments:

  1. बेहतरीन लेखनी.....

    ReplyDelete
  2. superstition will never let a society develop

    ReplyDelete
  3. आपकी लेखनशैली अच्छी है, आपके विचारों और लेखनी में एक तारतम्य है।

    ReplyDelete
  4. बिल्कुल सही शिक्षा और ज्ञान के प्रकाश से ही अंधविश्वास को समाप्त किया जा सकता है।

    ReplyDelete
  5. बिल्कुल सही हरिओम जी।

    ReplyDelete