ऐसा माना जाता है की सिनेमा समाज का आईना होता है। जो भी हमारे समाज में हो रहा होता है वह फिल्मकार अपने फिल्मों के द्वारा हमें दिखाने की कोशिश करता है। इसका असल उद्देश्य हमारे समाज में हो रही कुरितियों को हमसे रूबरू कराना है जिससे की हम अपनी गलतियों को समझ सकें और उसे सुधार कर अपने जीवन में अंतर्ग्रहित कर सकें।आज के समय में फिल्म हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। जब भी हम किसी फिल्म को देखते हैं तो उसे अपनी जिंदगी से जोड़ने की एक बार कोशिश तो जरूर ही करते हैं फिर चाहे वो गलत ही क्यों ना हो।
अगर फिल्मों की बात करें तो यह दो प्रकार की होती हैं- व्यवसायिक और समानांतर। व्यवसायिक फिल्में बनाने के पीछे का उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता है जिसके कारण कई बार यह दर्शकों में गलत संदेश भी पहुंचाता है। ज़्यादा लाभ कमाने की होड़ में निर्देशक कई बार फिल्मों में ऐसी चीजें भी डाल देते हैं जो युवा बड़ी आसानी से अपने जीवन से उसे जोड़ लेता है। वे उन चीजों को अपने नियमित दिनचर्या में शामिल कर लेते यह जाने बगैर की वह गलत है और उनके ऊपर बुरा प्रभाव डाल सकता है। जबकि समानांतक फिल्में बनाने के पीछे उद्देश्य केवल समाज को आईना दिखाना होता है। कई बार इसका अंत दुखद और अधूरा सा होता है और यह हमें सोचने पर मजबूर कर देता है की हमारे समाज में जो हो रहा है वह सही है या गलत। समाज का आईना बनने की जुनून में कई बार निर्देशक ऐसी चीजें भी दर्शकों के सामने परोस देते हैं जो समाज के लिए गलत है।
अब अगर कोई युवा इस तरह की चीजों को देखे फिर तो गई भैंस पानी में। युवावस्था में अक्सर देखा गया है की उनमें नई चीजों को जानने और उसे अपने जीवन में उतारने का जोश होता है। यही जोश और जुनून कई बार उन्हें गलत रास्तों पर ले जाने के लिए मजबूर कर देता है। आमतौर पर फिल्म में इस तरह की चीजें भी दिखाई जाती हैं जो बिल्कुल गलत है और हम मानते भी हैं लेकिन यही अगर हम इन शब्दों और चीजों का इस्तेमाल अपने परिवार या समाज में करने लगे तो यह गलत हो जाता है। तीन घंटे की फिल्म में नायकों या नायिकाओं की बुरी बातों के अलावा उनके संघर्ष को भी दिखाया जाता है जो की असल समाज में युवाओं का नहीं दिख पाता। इस कारण अगर वे फिल्मों में दिखाई गई कोई भी हरकत करते हैं तो समाज उसे गलत ठहरा देता है। जब फिल्मों में यह सही है तो असल जिंदगी में यह गलत कैसे....
मसलन अगर हम फिल्म ‘वेडनसडे’ की बात करें तो बेशक वह एक बेहतरीन फिल्म है लेकिन कुछ सीन्स में जिस तरह से आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया वह पूर्णत: गलत था। ऐसे ही गैंगस् ऑफ वासेपुर फिल्म में समाज को आईना दिखाने की आड़ में पूरी फिल्म ही आपत्तिजनक शब्दों से भरी पड़ी थी। ऐसी कई फिल्में हैं जैसे क्रिश, अग्निपथ, जन्नत 2, देलही बेली, मर्डर, मर्डर 2 आदि जिनमें ना सिर्फ गलत शब्दों का प्रयोग किया गया बल्कि अश्लीलता और उत्तेजक रवैयों को भी लोगों के समक्ष परोसा गया।
इन सब बातों से ना सिर्फ युवाओँ पर बुरा असर पड़ता है बल्कि महिलाओं के सम्मान पर भी प्रश्नचिन्ह् लगता है। फिल्मों में जिस तरह से महिलाओं को बेहद आकर्षक और कम वस्त्र में दिखाया जाता है वह असल जिंदगी में महिलाओं को एक भोगी जाने वाली वस्तु के समान बना देता है। हमें इस बात को समझना होगा कि फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं हैं बल्कि इनसे भी काफी कुछ सीखा जा सकता है। साथ ही फिल्मों की भी जिम्मेवारी बनती है कि ऐसी चीजें लोगों के बीच ना परोसें जो दर्शकों को भ्रमित और असल जिंदगी का खलनायक बनाए।
good thought process
ReplyDeleteबहुत अच्छी सोच है..
ReplyDeleteआप दोनो का शुक्रिया....
ReplyDeleteबिल्कुल सही...फिल्म एक जनसंचार माध्यम है जिसका प्रभाव त्वरित और दूरगामी होता है, ऐसे में अगर फिल्में सिर्फ मनोरंजन का ही साधन बनकर रह जाएंगे तो फिर यह जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसी बात होगी।
ReplyDeleteजी सर.....
ReplyDeleteहमरा देश भौतिकवादी बनता जा रहा है यह अब फिल्मों में भी दिखने लगा है।
ReplyDeleteसही कहा भाई-जान......
ReplyDeletegood one..
ReplyDeleteशुक्रिया मोहतरमा....
ReplyDeleteअच्छा है..............
ReplyDeleteधन्यवाद...
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