भारतीय सिनेमा पर नज़र दौडाएं तो हम देखते हैं कि यहाँ पुरुष प्रधान फ़िल्में बहुत बनी हैं, यहाँ तक कि ऐसी फिल्मों की भी भरमार है जिनमें पुरुषों को गैंगस्टर के रूप में दिखाया गया है, लेकिन महिलाओं पर केन्द्रित अथवा महिलाओं को गैंगस्टर के रूप में दिखाने वाली फिल्मों कि संख्या हाथों पर गिनी जाने वाली है| 2011 में नेहा धूपिया की एक फिल्म आई थी “फंस गए रे ओबामा” जिसमे नेहा धूपिया एक ऐसी गैंगस्टर की भूमिका में थी जो पुरुषों से नफरत करती है|
अगर कुछ वक़्त पीछे चलें तो शेखर कपूर ने 1994 में चम्बल के बीहड़ में डकैती का पेशा करने वाली फूलन देवी(ब्यूटी क्वीन) नाम की जिंदा डकैत पर एक फिल्म बनाई थी “बैंडिट क्वीन”| आज के इस दम तोड़ती सामन्तवादी समाज में औरत इस्तेमाल करने की सबसे सस्ती वस्तु मानी जाती है, इस चीज को इस फिल्म के चम्बल घाटी में आसानी से देखा और समझा जा सकता है| फिल्म में फूलन देवी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से स्नातक सीमा बिस्वास ने न सिर्फ अभिनय किया बल्कि उस किरदार को जिंदा कर दिया| इस किरदार के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला|
अगर कुछ वक़्त पीछे चलें तो शेखर कपूर ने 1994 में चम्बल के बीहड़ में डकैती का पेशा करने वाली फूलन देवी(ब्यूटी क्वीन) नाम की जिंदा डकैत पर एक फिल्म बनाई थी “बैंडिट क्वीन”| आज के इस दम तोड़ती सामन्तवादी समाज में औरत इस्तेमाल करने की सबसे सस्ती वस्तु मानी जाती है, इस चीज को इस फिल्म के चम्बल घाटी में आसानी से देखा और समझा जा सकता है| फिल्म में फूलन देवी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से स्नातक सीमा बिस्वास ने न सिर्फ अभिनय किया बल्कि उस किरदार को जिंदा कर दिया| इस किरदार के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला|
मैं ध्यान खींचना चाहुंगा फिल्म ”गॉडमदर” की ओर जिसमे शबाना आज़मी को अपने पति की हत्या करने के लिए गैंगस्टर बनते दिखाया गया है| फिल्म में उन्होंने एक गैंगस्टर की ही तरह गालियाँ भी देती दीखी हैं| हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हालाँकि महिलाओं पर केन्द्रित फ़िल्में कम ही बनी हैं, लेकिन उनमेसे ज्यादातर फ़िल्में बॉलीवुड में अपनी अच्छी उपस्थिति दर्ज करायी है|
अब बॉलीवुड में भी समाज में महिलाओं की भागीदारी, संघर्ष पर फ़िल्में बनाई जा रही हैं| महिला प्रधान फिल्मों से मेरा तात्पर्य फिल्म में उनके किरदार का सशक्त होने से है, न कि बड़ी या छोटी रोल से है| इस वर्ष रिलीज हुई “गुलाब गैंग” में देखते हैं कि किस तरह महिलाओं के संघर्ष को किस तरह माधुरी दीक्षित तथा जूही चावला पर फिल्माया गया था| दिल्ली कि जेसिका लाल हत्याकांड पर बनाई गई “नो वन किल्ड जेसिका” जिसमे एक अकेली लड़की के संघर्ष को दिखाया गया है| 1951 में बनाई गई थी “मदर इंडिया” जिसके निर्देशक थे महबूब खान| यह फिल्म नारी के उस रूप को दिखाती है, जो अपने पति की देहांत के बाद अपने बच्चों के अधिकार के लिए भी लडती है वहीं दूसरी तरफ समाज के मूल्यों को बचने के लिए अपने उसी पुत्र कि हत्या तक कर देती है| कतई यह फिल्म एक महिला की अभिमान और स्वाभिमान को दिखाती है|
इससे पहले 1940 में बनी महबूब साहब की ही फिल्म “औरत”| इसने हिंदी सिनेमा में सही मायनों में नारी की शक्ति को एक नई पहचान दी| इस फिल्म में एक ऐसी माँ को दिखाया गया है, जो गाँव के बहू-बेटियों के इज्जत पर हाथ डालने वाले खुद के बेटे को ही मार देती है| इनके अलावे चमेली, चांदनी बार, क्या कहना, इंग्लिश-विंग्लिश, क्वीन जैसी फिल्मों की कहानी महिला केन्द्रित ही थीं। ये सारी फिल्में अपने उस प्रयोग में सफल भी रही है जो दर्शकों को समाज की उस वास्तविकता से परिचय कराती है, जिन्हें हम सोंचना भी नहीं चाहते।...महेश भट्ट की अर्थ, महेश मांजेरकर की अस्तित्व और दीपा मेहता की वाटर जैसी फिल्मों में महिलाएं अपनी सामाजिक अधिकार और मानसिक आजादी के लिए लड़ती हैं। वहीं कुछ ऐसी फिल्में भी बनीं जो महिला राजनेताओं पर बनाई गई। जैसे “आंधी” (गुलजार), और “सत्ता” (मधुर भंडारकर)। आंधी में एक औरत के प्यार, स्वाभिमान और महत्वाकांक्षा को बखूबी से पर्दे पर उतारा गया था।
बॉलीवुड में महिलाओं पर केन्द्रित कुछ बोल्ड विषयों पर भी फिल्में बनीं। ताजा उदाहरण हेट स्टोरी-2 को लेते हैं। जिसमें नायिका का फ़िल्म के खलनायक द्वारा इस्तेमाल किया जाता है तो बाद में शरीर को ही सीढ़ी बना अभिनेत्री अपने प्रेमी के हत्या का बदला लेती है| मुझे अचानक अभी दामिनी फिल्म की याद आ गई जो राजकुमार संतोषी की बनाई गई थी| यह एक ऐसी औरत की कहानी है, जो अपने ही देवर द्वारा घर की नौकरानी के साथ किये बलात्कार के खिलाफ खड़ी होती है, जिसमे एक तरफ उसकी परिवार है वहीँ दूसरी तरफ वह और सच्चाई |
2012 में प्रदर्शित हुई फिल्म “कहानी” का जिक्र करना भी मेरी ‘मज़बूरी’ है, क्योंकि इसने उन लोगों को एक जवाब है, जो औरत को बेचारी समझते हैं, जो ये समझते हैं कि एक अकेली औरत कर क्या सकती है| वहीँ इस वर्ष प्रदर्शित हुई फिल्म “क्वीन” ने हमारी उस मिथ्य को तोड़ती है कि एक औरत आदमी के बिना कुछ नहीं है| फिल्म में ऐसी लड़की की कहानी दिखाई गई है जो अपने प्रेमी से शादी करने वाली होती है| उसका प्रेमी उसे शादी करने से सिर्फ इस लिए मना कर देता है क्योंकि मेहंदी के रस्म में लड़की नाच कर अपने ख़ुशी का इजहार करती है| इस सदमे से उबरने के लिए वो पेरिस जाती है| जहाँ वो खुलकर अपनी जिंदगी जीती है| फिल्म के क्लाइमेक्स दृश्य में लड़का उसके पास जाता है वापस शादी का प्रस्ताव लेकर| लेकिन लड़की अपना जवाब इंगेजमेंट रिंग लौटा कर दे देती है| अब वो खुद को कितना सहज महसूस करती है, आप में से जिन्होंने भी यह फिल्म देखे होंगे वो बखूबी समझते हैं|
वाकई फिल्में अब हमारे समाज की बंधन जो बनाई है महिलाओं के प्रति उसे तोड़ती दिखाई देती है| मेरे ख्याल से ऐसी पहल को महिला-सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण मानने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए|
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nice write-up. As we all know that film is one of the most important mass medium and society is very much influenced with this medium so to encourage women empowerment our film industry should make film on women empowerment.
ReplyDeleteबहुत खुब....
ReplyDeleteवाकई, फिल्मो में जिस तरह से महिला सशक्तिकरण को दिखाया जाता है उसका असर हमारे समाज पर पड़ता दिखाई दे रहा हैं। आजकल महिलाऐं और लड़कियाँ बेझिझक हर काम करती है।
ReplyDeleteवाकई, बहुत बढ़िया है.............
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