बीज से पेड़ बनने का
सफ़र बहुत लम्बा होता है, और इस बीच पेड़ कई पतझड़, सावन, बरसात आदि झेल चुका होता
है. इसके बावजूद भी वह अपने प्राकृतिक स्वभाव के कारण निःस्वार्थ फल और छाया देता
ही रहता है. परन्तु एक समय ऐसा भी आता है जब उसके सारे पत्ते झरने लगते हैं और तब
वह ना तो फल दे सकता है और ना ही छाया. फिर हम बुद्धिजीवी प्राणी उस सजीव प्राणी
को व्यर्थ समझकर काट(मार) डालते हैं.
यह समस्या धीरे धीरे
मानव समाज में भी अपना पैर पसार चुकी है. एक व्यक्ति जो अपनी पूरी ज़िन्दगी अपने
बच्चों के तरबियत में लगा देता है वहीँ उसके अंतिम पड़ाव में उसे परिवार से दरकिनार
कर दिया जाता है. यह कैसी विडम्बना है की जहां माता-पिता को भगवान कहा जाता है वही
उसे बोझ समझकर घर से निकाल दिया जाता है. यहां तक की दिल में भी जगह नहीं दी जाती.
वैसे तो भारत में
बुजुर्गों की रक्षा और उनके अधिकार के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1999 में वरिष्ठ
नागरिक आरोग्यता और कल्याण की निति तैयार की थी. इसके साथ ही 2007 में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण
विधेयक संसद में पारित किया गया. इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ
नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है. परन्तु इन सब
के बावजूद वृद्धों की व्यथा जस की तस बनी हुई है.
वृद्धों के लिए काम
करने वाली संस्था हेल्प एज इंडिया द्वारा 2011 में करवाए गये सर्वेक्षण के
अनुसार 98% वृद्ध प्रताडनाओं के बावजूद अपनी संतानों के खिलाफ़ शिकायत नहीं करते.
भारत के बुजुर्गों
के बारे में कुछ कड़वे तथ्य:-
भुखमरी
का शिकार होने वाले लोगों में सर्वाधिक संख्या बुजुर्गों की है.
शहरी
इलाकों के बेघर लोगों में सर्वाधिक संख्या बुजुर्गों की है.
जाड़े
के दिनों में ठंढ से मृत्यु के सर्वाधिक मामले बुजुर्गों के हैं.
अगर हम इस समस्या के
कारणों पर ध्यान दें तो कई विचारनीय तथ्य सामने आयेंगे, जैसे:-
संयुक्त
परिवारों का टूटना,
बच्चों
का संकीर्ण और स्वार्थी हो जाना और
सामाजिक
सुरक्षा मुहैया ना कराना
उपरोक्त दोनों कारणों का हल पारिवारिक सौहार्द हो सकता है
परन्तु सामाजिक सुरक्षा देने की जिम्मेदारी सरकार की है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद
41 में वृद्धों के लिए सार्वजनिक सहायता देने की बात कही गयी है और संविधान की
धारा 21 में भी हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है. तो इस तरह
परिवार द्वारा त्यागे गये वृद्धों की सुरक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है. परन्तु
हर नागरिक का भी यह कर्तव्य है की वो पहले अपनी सोच बदले फिर देश तो बदल ही
जायेगा. और प्रत्येक बुद्धिजीवी संतान को इस परम सत्य को याद रखना चाहिए की जो आज
यौवन अवस्था में है वो कल वृद्धावस्था में जरूर जायेगा.
बहुत बढ़िया...........सच है पारिवारिक स्थिति ही इसका जिम्मेवार है।
ReplyDeleteसिर्फ बच्चों को दोषी मान लेना ठीक नहीं, इसके कई पहलू हैं जैसे - बच्चों का पालन पोषण, व्यवहारिक मूल्यों की शिक्षा, इत्यादि। आप इस पर भी लिखें और उसको जोड़ते हुए सम्पूर्ण पहलूओं पर ध्यान दें।
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