Monday, September 8, 2014

भारतीय सिनेमा का बाजार तथा इसके आयाम



 पिछले 100 वर्षों में भारतीय सिनेमा ने दुनिया में किस तरह विकास किया इस पर नज़र डालें तो       हम पाते हैं कि भारतीय सिनेमा को इस ऊंचाई तक पहुँचाने तथा इसका पहल करने वालों की दूरदृष्टि और उनकी आशावादी रहना साथ ही लीक से हटकर चलने की प्रवृति का एक बड़ा योगदान रहा है|
उनके सामने आनेवाली चुनौतियों के बीच उनके द्वारा किये गए प्रयास एवं योगदान कभी न भूलने वाली है| 
फिल्म उद्द्योग को वैसे आज भी पूर्णतः एक उद्द्योग या व्यापार का दर्जा प्राप्त नहीं है| इसको लम्बे समय से उद्द्योग का दर्जा देने की मांग होती रहती है| ताकि इसमें निवेश का आधुनिक संसाधन की उपलब्ध हो सके| फिल्म निर्माण के शुरूआती दिनों में आमतौर पर यह कारोबार पारिवारिक सम्पर्कों के तहत आता था| ये वो दौर था जब फिल्मों को व्यवसाय या मनोरंजन के साधन के बजाय समाज में सुधार लाने का एक जरिया माना जाता था|
यह कारोबार जैसे-जैसे बढ़ने लगा, निजी कम्पनियां पैसा कमाने के उद्देश्य से इसमें पैसा लगाने लगे| फिल्म कारोबार में बड़े स्तर पर पैसा लगाने का चलन मल्टी-स्टारर फिल्मों के बनने के साथ शुरू हुआ| इसी दौर में अंडरवर्ल्ड का इसमें पैसा लगाने की बात सामने आने लगीं| मेरे हिसाब से यह आज भी अप्रत्यक्ष रूप से जारी है| आज भी आरोप लगते हैं कि फिल्म-क्षेत्र में काले धन की बहुत भूमिका है|
बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट क्षेत्र के इस कारोबार में आने के बाद इस कारोबार के नियमन का एक नया दौर शुरू हो गया| अब यह काम ज्यादा व्यावसायिक तरीके से किया जाता है| एकल पर्दे वाले सिनेमाघरों का स्थान पर मल्टी-स्क्रीन वाले और नई तकनीकों से भरपूर सिनेमाघरों की लोकप्रियता बढ़ रही है| आज सिनेमा देखना भले ही महंगा हो गया है, लेकिन इसकी लोकप्रियता अब भी बढ़ रही है|
आज भारत एक ऐसा देश बन गया है, जहाँ विश्व में सबसे ज्यादा फिल्म-निर्माण होता है| यह औसतन हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में औसतन 1200 फ़िल्में सालाना बनाती है| रोजाना फ़िल्में देखने वालों की संख्या 1.5 करोड़ आंकी गई है|
भारतीय फिल्म बाजार तथा इसकी हकीकत:-  भारतीय सिनेमा को एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार (सह कार्यकारी निदेशक, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज, महाराजा अग्रसेन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज देल्ही) आदित्य अवस्थी ने करीब 2.5 अरब डॉलर का आँका है| मुंबई फिल्म उद्द्योग (बॉलीवुड) भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा हिस्सा है| ऐसा माना जाता है कि बॉलीवुड में बनने वाली पांच से दस प्रतिशत फ़िल्में ही ऐसी होती हैं जो आर्थिक दृष्टि से सफल होती है| क्षेत्रीय भाषायी फिल्मों की स्थिति और भी बदतर है| खासकर भोजपुरी फिल्मों की| फिल्मों को जबर्दस्ती लोकप्रिय बनाने के लिए कथित तौर पर “मसाला” (मसाला फिल्म, जबकि कोई जौनर नही है) फ़िल्में बनाई जाती हैं, जो आइटम सांग्स से लेकर गाली-गलौज से भरपूर होती हैं| इसके बावजूद हर साल ऐसी फिल्मों की संख्या गिनी-चुनी होती हैं जो दर्शकों को आकर्षित कर मुनाफ़ा कमाने वाली हो|
इसलिए ज्यादातर फ़िल्म कारोबार के जानकर मानते हैं बल्कि मैं खुद भी मानता हूं कि फ़िल्मी दुनिया देखने में भले ही दूर से ग्लैमरस और लाभ का सौदा दिखता हो पर वास्तविकता इससे बहुत दूर है जो शायद बाहरी लोगों को दिखाई ही नहीं देती|

2 comments:

  1. निखिल आपका ब्लॉग सूचनाप्रद है लेकिन इसमें नयेपन का अभाव है, अपने विचारों को लिखें और उसको साबित करने के लिए तथ्य एकत्रित करें..

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  2. भारतीय सिनेमा को समाज का आईना कहा जाता है लेकिन मुनाफा के चक्कर में सिर्फ आकर्षित और मसाला का प्रयोग किया जा रहा है।

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