Tuesday, September 9, 2014

गरीबों के “रहनुमा”

आए दिन गरीब किसी न किसी रूप से प्रताड़ित होते हैं, चाहे वो नेताओं के हाथों हो या फिर उद्योगपतियों के, यह शब्द मेरे नहीं हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हैं, जिन्हे मोदी ने, 2014 लोकसभा चुनाव के पहले उड़िसा के बालासोर में चुनावी रैली के दौरान कहा था। हमारे समाज में गरीबों की दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यह एक सर्वविदित रहस्य है। आज हमारे देश में गरीबी हटाओ योजनओं से ज्यादा गरीबों के प्रति हो रहे अमानवीय कृत्य के खातमे की जरुरत है। सवाल उठता है कि गरीबों की दयनीय स्थिति पर नेताओ की नजर चुनाव के वक्त ही क्यों पड़ती हैसमाज का हर एक उच्च वर्ग अपनी जरुरत के हिसाब से गरीबों का शोषण करने की हर संभव कोशिश करता हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें चुनाव के वक्त देखने को मिलता है। 


धन के अभाव के कारण, गरीब जीविका के साधन को जुटा पाने मे असमर्थ होते हैं। अगर उनके पास कोई चीज कीमती होती है तो वह है उनका कीमती वोट। जिसे पाने के लिए राजनीतिज्ञ ऐड़ी-चोटी एक कर देते हैं। नजर दौड़ाई जाए तो आपको याद होगा 1971 में इंदिरा गांधी के चुनाव का आधार गरीबी हटाओ था, जिस कारण उन्हे ऐतिहासिक जीत मिली। वहीं जीत मिलते ही इंदिरा गांधी का नारा गरीबी हटाओ कहीं खो सा गया, यह नारा सिर्फ एक वोट बटोरने का जरिया बन कर रह गया ,यही कारण था की 1975 में एक 20 सूत्रीय कार्यक्रम इंदिरा गांधी ने देश के सामने पेश कियाजिसका मूल उद्देश्य गरीबी पर हमला था।

ऐसा नहीं है की गरीब नासमझ होते हैं, आखिर वह क्या करे। पेट की आग उन्हे इतना मजबूर कर देती है की वे अपने इस मौलिक अधिकार का भी सौदा कर देते हैं। जिससे एक नयी कुव्यवस्था का जन्म होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण 1973 में देखने को मिलता है, जब देश में कुव्यवस्था के कारण महंगाई और भ्रष्टाचार मे बढ़ोतरी हुई। ऐसा कहा जाता है कि नारों में चुनाव  जिता सकने की क्षमता होती है न की जीत बरकरार रख पाने की। शायद यही कारण था की 1977 में इंदिरा गांधी रायबरेली से हार गईं।

यह एक हास्यपद बात है की हमारे देश के सत्ताधारी लोग गरीबों से इतना प्यार करते हैं, कि वे चाहते हैं की गरीब हमेशा गरीब ही रहें ताकि उनका महत्वपूर्ण वोट उन्हे मिलता रहे, जो उन्हे अमीर से अमीर बनाता जाए और गरीब को गरीबी की दल-दल मे छोड़ दे। शायद इसिलिए आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की घोषित संपत्ति 1990 से 2013 तक लाख रुपए से बढ़कर करोड़ से अधिक हो गई, वहीं बिहार में गरीबों की संख्या करोड़ से बढ़कर करोड़ हो गई।

अगर नजर दौड़ाई जाए तो यह साबित होता है की नेताओं के द्वारा किये गए काम गरीबों के सहायता के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपने वोट बटोरने का जरिया होता है। रैन-बसेराचरवाहा विद्यालय आवासीय योजना ऐसे कई उदाहरण आपके सामने हैं जिन्हे गरीबों के नाम पर शुरू किया गया था, मगर आज उन सेवाओ की दयनीय स्थिति है। अगर वाकई नेताओं की मंशा गरीबों को सेवा मुहैया कराना होता तो कोई भी गरीब कम से कम भूखा नही मरता ,घर न होने के कारण आए दिन सड़क पर सोते हुए बच्चे कुचले नहीं जाते। अगर गरीबों को कुछ मिलता है, तो सिर्फ मुआवजा और झूठी सहानुभूति। मुआवजा कभी मिलता है तो कभी नहीं, अगर मिलता भी है, तो  क्या  इससे गरीबों की स्थिति मे बदलाव आता हैअगर आता तो आज आंकड़े कुछ और होते।

http://epaper.prabhatkhabar.com/330164/PATNA-City/CITY#page/7/1


वोटर लुभाने के लिए राजनेता लोग काफी पैतरे आजमाते हैं। क्षेत्र का नेता उनके हालात का फायदा उठाता है। वह गरीबों को कई झूठे प्रलोभन देते हैं चाहे वह सरकारी नौकरी दिलवाने का होया फिर भूमि का अधिकार दिलवाने की बात। आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो आपको पता चलेगा की पिछले दस साल से चुनाव के पहले राशन कार्डों की संख्या बढ़ती है और चुनाव परिणाम की घोषणा के कुछ महीनों के बाद ही राशन कार्डों की संख्या घट जाती है। यह सभी चुनाव जीतने के हथकंडे हैं।

आज हमारे राजनेता इतने भावशून्य हो चुके हैं की गरीबों की समस्याओं को कम करने की बजाय चुनाव के समय गरीबों के घर जा अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास करते हैं। एक तरफ जहां राहुल गांधी गरीबों की बस्ती मे जा गरीबों के सामने अपनी अच्छी छवि बनाते हैं वहीं 2014 में महाराष्ट्र के यवतमल क्षेत्र के किसान गजानन्द  घोंटेकर आत्महत्या करने से पहले अपने सुसाइड नोट में लोगो से लिख यह विनती करते हैं की आने वाले 2014 के चुनाव मे कांग्रेस और एनसीपी को वोट न दिया जाए।

सिर्फ बातों और झूठे वादों से किसी का पेट नही भरता। जरूरत है तो किसी सच्चे रहनुमा की, जो गरीबों पर राजनीति न करे बल्कि गरीबों की समस्याओं को दूर करने का प्रयास करे।

6 comments:

  1. politicians comes as the chosen one for poor during elections but they are least bothered about them.

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  2. प्लूटो ने राजा के लिए दार्शनिक राजा शब्द का प्रयोग किया है, इसका सीधा मतलब यह है कि राजा को इतना विवेक होना चाहिए कि वह न सिर्फ दुनियावी चीजों का ख्याल रखे बल्कि इस दुनिय से परे जो विचार मंथन है उसमें भी पारंगत हो। यह विडंबना ही है कि समय के साथ राजनीति इतनी खराब हो गई कि धन, बल और छल का ही बोलवाला है और इन तीनों में ही मामलों में गरीब अत्याधिक गरीब है।

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  3. मस्त ब्लोग था....

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  4. अमीर और गरीब के बीच खाई को कम करना होगा।

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  5. garibo ke garib rahne ka sabse bada karan hai gandi raajniti, or gandi rajniti ko kaabu me sajag patrakarita hi kar sakti hai, lekin jab aaj ki patrakarita ki bhumika par hi sawal uthne lage to ????????????

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