परिवर्तन संसार का नियम है यह कथन आज के युग में धूमिल होती दिख रही है। मैं बात कर रहा हूं राजनीति परिवेश में अपनों की राजनीति का। इतिहास गवाह है कि अति कुछ भी हमें प्रकृति (प्रकृति) और समाज से दूर करती है। चाहे विश्वयुद्ध हो, केदार नाथ त्रासदी हो या कश्मीर का जल प्रलय। अति युद्ध ने विश्वयुद्ध का रूप लिया तो अति प्रकृति से छेड़छाड़ केदार नाथ और कश्मीर जल प्रलय का।अब लगने लगा है कि अगली बारी राजनीति की है। हमारा भारत 1947 के बाद से आज तक राजनीति अपनों का हस्तक्षेप जैसी बीमारी से जूझ रहा हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बाद उनके ही परिवार से लगभग सभी ने भारतीय राजनीति की बागडोर संभाले और जनता की सेवा में तत्पर रहे। वहीं अन्य पार्टियां भी इससे अछूते नहीं रहे जैसे- मुलायम सिंह यादव( अखिलेश), लालू यादव(राबड़ी देवी, साधु यादव और मिशा भारती), रामविलास पासवान(चिराग पासवान)।
इस प्रकार की राजनीति में पार्टी ऐसे उम्मीदवार को टिकट देती है जो उसका अपना है और जीतने के बाद उससे वही करवाता है जो पार्टी चाहती है जिस तरह इतिहास में प्रथम साशक द्वितिय साशक कह कर पुकारा जाता था आज अगर इस प्रकार की बात की जाए तो कहना गलत नहीं होगा। जनता भी ऐसे उम्मीदवार को आसानी से चुन लेती है उन्हें लगता है कि इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।
अपनों की राजनीति से भारत के दक्षिण भाग भी अछुता नहीं रहा है, बल्कि वहां भी खानदानी राजनीति प्रचलन में आ गया है। इस पारिवारिक हस्तक्षेप से न सिर्फ हमारे देश की प्रगति रूक रही है बल्कि राजनीतिक परिवेश में भी भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया है। जनता को भी लगने लगा है कि अब इसमें परिवर्तन होना चाहिए जिसका ताजा उदाहरण 16वीं लोकसभा चुनाव है जहां वर्तमान सरकार ने पारिवारिक राजनीति को पीछे छोड़ते हुए रिकॉर्ड बहुमत हासिल किया।
आज देश को जरूरत है स्वच्छ राजनीति की न कि अपनों की राजनीति की। अगर राजनीति को प्रलय से बचाना है तो देश की जनता स्वच्छ छवी वाले उम्मीदावार जो अपनों की राजनीति नहीं जनता की राजनीति करें ऐसे उम्मीदवार को लाना होगा क्योंकि परवर्तन संसार का नियम है और राजनीति को इसकी जरूरत है।
nice write up
ReplyDeleteखानदानी राजनीति तब तक खत्म नहीं होगी जब तक लोग राजतंत्र की मानसिकता से ऊपर नहीं उठ जाते।
ReplyDeleteनेताओं ने रातनीति को खानदानी व्यवसाय बनाके रख दिया है..... यह हमारी जिम्मेवारी बनती है कि इसे पूरी तरह से बंद किया जाए।
ReplyDeleteकुछ जनता भी खानदानी राजनीति को बढ़ावा देती है हमें उसके मानसिकता को सुधारना होगा।
ReplyDeleteजनता कुछ रूप से नही पूरी तरह से कहिए क्योकि बिहार वधानसभा आप देख ही चुके हैं।
ReplyDeleteअच्छा लिखे हो................
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