लोकतंत्र की नींव व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। इसका अभिप्राय यह है कि लोगों को
खान-पान, कहीं भी रहने, बोलने की स्वतंत्रता होती है। अगर लोगों की व्यक्तिगत
स्वतंत्रता समाज की बेहतरी को आधार बना कर छीन ली जाए तो यह लोकतंत्र के बुनियादी
आधार का हनन है।
दुनिया में जितने भी तानाशाही शासक हुए उन्होंने समाज की बेहतरी की ही बात की
औऱ लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बाधित किया, लेकिन इसका लाभ समाज को नहीं
हुआ। हिटलर, मुसोलिनी, पोलपोट न जाने इतने कैसे नाम हैं जिन्होंने समाज को आधार
बनाकर ही लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किया।
कुछ इसी तरह का फैसला वर्तमान बिहार सरकार का है, जिसने शराबबंदी कानून को
इसलिए लागू किया जिससे समाज में नैतिकता का विस्तार हो और साथ ही कानूनी समस्या भी
कम से कम उत्पन्न हो। लेकिन क्या किसी भी सामाजिक समस्या को सिर्फ एक कानून से
रोका जा सकता है? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि समाज सरकार से बड़ी इकाई है। समाज ने ही सरकार
का निर्माण किया है। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक समाज किसी कानून को पूरी तरह
स्वीकार न कर ले वह सफल भी नहीं हो सकता है। ऐसे कई कानून हैं जो किताबों की शोभा
तो बढ़ा रहे हैं लेकिन उनका वास्तविक प्रयोग शायद ही होता हो। उदाहरण के लिए दहेज
विरोधी कानून, बाल विवाह कानून, विधवा पुनर्विवाह कानून।
तो फिर क्या वर्तमान सरकार इससे अनजान है? ऐसा नहीं लगता। दरअसल इस कानून के पीछे जो मकसद
है वह राजनीतिक है। सामाजिक सुधार के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की तैयारी है
ऐसा लगता है। अगर ऐसा है तो सरकार सामाजिक सुधार का डंका न पीटे। लोगों की
राजनीतिक समझ जब तक नहीं बढ़ेगी तब तक सामाजिक मुद्दे, धार्मिक मुद्दे तथा अन्य कई
मुद्दों पर राजनीति होती रहेगी। बेहतर यह होगा कि हम सरकार के हर फैसले पर तार्किक
मंथन करें और एक तार्किक समझदारी तक पहुंचें।
great thought sir
ReplyDeletethanks Aaryan
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