Wednesday, July 10, 2013

एडर्वड स्नोडेन: साइबर संसार और नागरीक नीजता

अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा ऐंजसी(एनआइए) के गोपनीय निगरानी कार्यक्रम प्रिज्म की जानकारी लीक करने वाले सीआइए के पूर्व कर्मचारी 29 वर्षीय एडर्वड स्नोडेन, अभी तक अमेरिकी पकड़ से बचने में सफल है। यह लेख लिखने जाने तक, स्नोडेन मास्को हवाई अडडे पर रके थे। वह हागकांग से मास्को पहुँचे हैं। हागकांग में उसने कहा, अमेरिका ने चीन के खिलाफ जमकर साईबर जासूसी की है। अमेरिका के जासूसों ने इस वर्ष चीन के शिंधुआ यूनिवर्सिटी को निशाना बनाया। इस यूनिवर्सिटी को चीन का चोटी का शिक्षा व शोध संस्थान माना जाता है। अमेरिकी सरकार लाखों संदेश चुराने के लिए चीन की मोबाइल फोन कंपनियों में भी हैकिंग कर रही है। एडर्वड स्नोडेन को वेनेजुएला और निकारगुआ ने शरण देने का प्रस्ताव दिया है। उसने इक्वाडोर से शरण मांगी थी। भारत ने शरण देने से इनकार कर दिया है। इस पूरे धटनाक्रम ने कई देशों के संबंध को प्रभावित किया है। वहीं नागरीक नीजता के अधिकार पर भी प्रशन लगाए हैं। अब वैश्विक स्तर पर आंतरिक सुरक्षा, नागरीक नीजता और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में साइबर जासूसी पर दूबारा विचार करना होगा। स्नोडेन का जुर्म वैश्विक नागरिक अधिकार का उल्लंधन कर रहे अमेरिका का सत्य उजागर कर ना है। सामूहिक निगरानी वैश्विक नागरिक अधिकार का उल्लंगन है। प्रिज्म के खुलासे के बाद दुनिया के कई मुल्क साइबर दनिया में अपनी निजता को लेकर आशंकित और चिंतीत है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर हैरानी और चिंता प्रकट करते हुए कहा है, कि यदी इस कार्यक्रम के तहत भारतीय निजता कानूनों का उल्लंधन हुआ है। तो यह अस्वीकार्य है। प्रिज्म की शुरूआत पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के वारंटमुक्त धरेलू निगरानी कार्यक्रम की राख से हुआ। जिसे 2007 में मीडिया ने सार्वजनिक कर दिया था। इसके बाद 2007 के प्रोटेक्ट अमेरिका एक्ट और फीसा(फॉरेन एंटेलिजेंसस एक्ट) अमेंडमेंट एक्ट के साए में प्रिज्म का जन्म हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक बिल गेट्स की माइक्रोसॉफ्ट 11 सिंतबर 2007 के इस कार्यक्रम का हिस्सा बनी। इसके बाद याहू, गूगल, फेसबुक आदी। आखिर में अक्टूबर 2012 में एपल इस कार्यक्रम में शामिल हुई। यह कंपनिया उपभोक्ताओं की जानकारियों को किसी एजेंसी के साथ साझा करने से अज्ञानता जाहिर करती है। प्रिज्म के खुलासे के बाद यह सच अविश्वसनिय है ? अब नागरीक नीजता एक धोखा बन कर रह गइ है। राष्ट्रीय सुरक्षा ऐंजसी (एनएसए) इंटरनेट की बड़ी कंपनियों को अपने साथ लेने की कोशिश करती है। इस खुलासे ने कठधरे में आई कंपनियों के सामने साख का संकट खड़ा कर दिया है। निश्चित तौर पर अमेरिकी सरकार आंतकवादी गतिविधियों के खतरे की आशंका के मद्देनजर प्रिज्म अथवा इसी तरह के दूसरे कार्यक्रम लगातार जारी रखेगी। इटरनेट पर बहुत हद तक अभी भी अमेरिकी नियंत्रण है और अधिकांश बड़ी इंटरनेट कंपनियां अमेरिकी हैं। वे मूलतः वहां के कानूनों से संचलित होती हैं। ऐसे में सवाल भारत व अन्य देशों का है कि वे साइबर संसार में अपनी निजता को कैसे बचाते है। वर्तमान में अंतरराषट्रीय कूटनीति में परसपर एक दूसरे विरोधी जठीलताओं का निदान कैसे करते हैं। अमेरिका चीन पर साइबर हमले का आरोप लगाता है, लेकिन विदेशी मुल्कों की सूचनेएं चुराने वाली अपनी साइबर सेना पर खामोश रहता है। वैश्विक नागरीक असंतोष व सरकारी नीतियों के विरोध, विरोध प्रद्रशन नागरीक समाज के सजग और जागरूक होने का अहट देता है। साइबर संसार ने नगरीक समाज को सश्क्त किया है। अब संसार के किसी भी कोने में किसी भी देश के दूवारा जासूसी अथवा धोखा व छल के लिए जगह नहीं बचती है। नागरीक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को राष्टीय सुरक्षा के नाम पर दबाया नहीं जा सकता है। एस.एम.मोनिस,पटना

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