समुद्र के उतर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित यह विशाल भौगोलिक क्षेत्र भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है. ये बात चरितार्थ है कि समय की ताकत के आगे किसी का वस नहीं चलता, भारत का सौंदर्य, समृद्धि, और उदारता को लूटने के लिए विश्वभर के कई देशों ने अपना गुलाम बनाने की कोशिश की. जैसे ही इंगलैंड का साया भारत पर पड़ी, उन्होंने भारत की आत्मा को झकझोर कर रख दिया. उन्होंने ही अपने स्वार्थ के लिए भारत में धर्म विरोधी भावनाओं को भड़काया और धर्म के ऩाम पर 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान को नया राष्ट्र बना दिया.
यह जानना बेहद जरुरी है कि नए मुल्क की उत्पति धार्मिक द्वेष था न की राष्ट्र उन्नति इसलिए इस्लाम की उन्नति और काफिरों की मुक्ति का सहारा लेकर पाकिस्तान के संस्थापकों ने भारत में साम्प्रदायिक द्वेष फैलाया और हिंसा के बल पर अलग राष्ट्र प्राप्त किया, जिसे उन्होंने इस्लामिक राष्ट्र घोषित किया. इन सभी के लिए इतिहास मोहम्मद अली जिन्ना को जिम्मेदार ठहराती है.
14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि में दो नए राष्ट्र भारत-पाकिस्तान. भारत की सीमान्तगर्त 562 रियासतों में से 3 रियासतें हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर भारत संघ में विलय के अनिच्छुक थे. जिसमें हैदराबाद को बलपूर्वक तथा जूनागढ़ को जनमत के आधार पर भारत में मिला दिया गया, लेकिन कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह स्वंय को भारत-पाक में न मिलकर स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बने रहना चाहते थे. किन्तु पाक कबायली आक्रमण से भयभीत हो, राजा हरि सिंह ने भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर विलय की संधि मान ली. परिणामस्वरुप कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया.
पाकिस्तान ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका मत था कि कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्यक लोग है, अत: कश्मीर पर पाकिस्तान का हक है, परन्तु भारतीय प्रधानमंत्री नेहरु उस समय ये मसला यू.एन ले गये जहां तय हुआ कि पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेना पीछे हटाये तथा फिर वहां भारत जनमत संग्रह करवाए. लेकिन न तो वहां से पाकिस्तानी सेना पीछे हटी और न ही भारत ने जनमत संग्रह करवायी. परिणामस्वरुप वह मुद्दा आज तक अनसुलझा ही है. और दोनों देशों में दुश्मनी पैदा करने में आग में घी डालने का कार्य करता रहा है. इसके अलावा अन्य विवादित मुद्दों में सरक्रीक विवाद, तुलबुल वूलर परियोजना, सियाचिन विवाद, सिंधु जल समझौता, एल.ओ.सी का मुद्दा, बगलियर परियोजना इत्यादि ऐसे मुद्दे हैं जो भारत-पाक सम्बंधों पर गहरा प्रभाव डालते है.
बावजूद इसके भारत की विदेश नीति शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के अंतर्गत भारत ने पाकिस्तान के साथ सम्बंधों को सुधारने का प्रयास किया है. भारत का मानना रहा है कि संसार में सम्बंध कभी भी बदलें जा सकते है, लेकिन पड़ोसी से नहीं, इसलिए दोनों देश प्रेमपूर्वक विकास का रास्ता अपनाए. किन्तु पाकिस्तान द्वारा हमेशा भारत से छल किया. पाकिस्तानी सेना और कट्टरपंथी भारत के साथ सम्बंधों को सुधारने के पक्ष में कभी नही रहे. 1965 ई. में ही उसने भारत पर आक्रमण किया जहां पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा. इसके फलस्वरुप 1966 ई. में शास्त्रीजी के नेतृत्व में भारत-पाक के बीच रुस में ताशकन्द में समझौता हुआ.
पाकिस्तान ने पुन: इस बात को दोहराया 1971 ई. में और पाकिस्तान को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. इसी दौरान उसका पूर्वी क्षेत्र बांग्लादेश के नाम से अलग राष्ट्र बना. इसी युद्ध के बाद 1972 ई. में इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में शिमला समझौता हुआ. सभी समझौतें में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी समझौतें में तय हुआ कि दोनों देश क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करते हुए एक-दूसरे के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग नही करेंगे. इतना होने के बावजूद भी कारगिल युद्ध 1998 ई. में पाकिस्तान ने भारत की पीठ पर छुरा घोंपा. भारत में लोकतंत्र हमेशा मजबूत बना रहा है. जिसकी तुलना में पाकिस्तान में लोकतंत्रिक सरकारें हमेशा कमजोर रही है.
आजादी के बाद अधिकतर समय पाकिस्तान में सैन्य तानाशाहों की हुकूमत रही, जिस कारण यह अस्थिर राष्ट्र जिससे वहां अनेक अलोकतंत्रिक तथा आतंकी संगठनो को मजबूत बनने का अवसर मिला, इसकी खुफिया एजेंसी आ.एस.आई ने इन आतंकी तत्वों को हमेशा भारत में निर्यात किया है. कई वर्षो से चली आ रही कश्मीर की आतंकी घुसपैठ, 2001 में संसद पर हमला, 2008 में मुबंई आतंकी हमला, कई स्थानों पर बमकाण्ड जैसी अनेक घटनाएं इसके साक्षात् प्रमाण है.
इन सारी युद्धों को परिणामस्वरुप देखें तो, लाखों में लोगों की मृत्यु की कतार और उनके परिजनों को आजीवनभर कि पीड़ा, तथा अरबों-खरबों रुपये का व्यय

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