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| सत्ताधारियो के खेल में बेवश भोले ऩाथ |
हाल ही में, मौसम के क्षेत्र में निजी कम्पनी स्काईमैट ने भी दखल दिया है इस विभाग की नजर बंगाल की खाड़ी और केरल को देखता रह गया. लेकिन उत्तर में प्रकृति की प्रकोप का खौफनाक मंजर इसकी जरा भी आशंका व्यक्त नही कर पाया. मरने वालें श्रद्धालुओं की संख्या सुनकर कलेजा फट जाता है. इसका एक ही कारण है विकास की जल्दबाजी में पर्यावरण की अनदेखी करना. इसकी बेशकीमती भंडार को सत्ताधारियो और उधोगपतियो की नजर लग गई है.
उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश से विभाजित होकर 9 नवंबर 2000 अस्तित्व में आया. 13 जिलो में बँटे इस छोटे राज्य की जनसंख्या 1 करोड़ 86 हजार है. 81 प्रतिशत, साक्षरता वाला यह राज्य 53,566 वर्ग किलोमी. में फैला है. यह भागीरथी, अलकनन्दा, सौग, गंगा और यमुना जैसी बड़ी और पवित्र मानी जाने वाली नदियों का स्थल भी हैं. इसलिए इसे देवभूमि कहा जाता है. इस देवभूमि पर ही ईश्वर का प्रकोप हुआ. यही तो सोचने वाली बात है. प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर यह देवभूमि आज तहस-नहस हो गई हैं. उत्तराखंड जब स्वंतत्र राज्य नही बना था, तब यहां पेड़ काटने पर प्रतिबंध था. होटल नदियों के तटों पर नही बनाये जा सकते थे. यहां तक की निजी आवास भी बनाये जा सकते थे. यहां तक की निजी बनाने पर प्रतिबंध था. लेकिन जैसे ही यह उत्तरप्रदेश से अलग हुआ. केन्द्र सरकार से इसे बेहिसाब धनराशि मिलना शुरु हो गई. ठेकेदारों ने यहां काम शुरु कर दिया. नेताओं और नौकरशाहों का एक गठजोड़ बन गया. इसके बाद शुरु हुई प्राकृतिक संसाधनों की लूट. ऐसा लूट की देवभूमि खोखली हो गई. देखते ही देखते भागीरथी और अलकनन्दा के तटों पर बहुमंजिला होटल और आवासीय इमारतों की कतार लग गई.
पिछले 13 वर्षो में राज्य सरकार का विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन के अलावा कोई उललेखनीय काम नही हुआ है. तो मेरा सवाल है, मंत्रियों तथा उधोगपतियों के लूट व्यापी

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