भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वयं सहायता समूह ने ग्रामीण महिलाओं के लिए एक स्वर्णिम अवसर लेकर आया। जो ग्रामीण महिलाओं की किस्मत ही बदल दी। जहां महिलाएं आत्मनिर्भर हुई और पारिवारिक फैसलों में भी बढ-चढकर हिस्सा लेने लगीं। उन्हें अब इस बात की चिंता नही हैं कि घर के पुरूष ही काम करेंगे तभी उनके घर के चूल्हे जलेगें। स्वयं सहायता समूह की वजह से ही घरों मे काम करने वाली लड़कियां अब पढ़ाई करने लगी हैं। इसका एक सुदृढ परिणाम है कि लड़कियां अब लड़कों से कदम ताल मिलाकर काम करने लगी है।
वही अब महिलाओं को छोटी-मोटी जरुरतों के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता।
एक उदाहरण है बिहार के नरौलीडीह गांव का, इस गांव की शकुंतला देवी, ढोली देवी सिर्फ हस्ताक्षर करना जानती थी, लेकिन आज उनकी पहचान दूर-दराज के गांवों तक है। वो कहती हैं कि जब गांव की दीदी मुझे महिला समूह बनाने बोलती थी, तो मुझे बहुत हिचकिचाहट होती थी। वही आज इस समूह की मदद से ही, मेरी बहुत सी जरूरतें पूरी हो सकती है। जिसके लिए मैने बाद में हामी भर दी। शुरूआती दौर में थोड़ी परेशानियां हुई लेकिन मुझे खुद पर विश्वास था कि मैं आत्मनिर्भर बनके ही रहूंगी।
इसी उत्साह के साथ हमारा एक स्वयं सहायता समूह तैयार हो गया । उसी गांव में एक बुजुर्ग महिला थी, जिनकी दो बहुएं थी। लेकिन दोनो कम पढी-लिखी थी। वहीं स्वयंसहायता समूह से जुड़कर कताई-बुनाई का प्रशिक्षण लिया और अपना केंद्र चलाने लगी। अब उनका खुद का कपड़े का दुकान हैं। जबकि पहले ग्रामीण लड़कियों की प्राथमिक शिक्षा भी मुश्किल से मिल पाती थी। स्वयं सहायता से जुड़ने के बाद महिलाएं जागरूक हो गई हैं, और महिलाएं उच्च शिक्षा ग्रहण करने लग गई है। इसका परिणाम है कि लड़कियां अब हर जगह अव्वल आ रही हैं, चाहे प्रतियोगिता परीक्षा हो या कोई अन्य परीक्षा हो, हर जगह लड़कियां अपना परचम लहराती दिख रही हैं। वर्ष 2005 में उच्च प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का दाखिला मात्र 16.1 फीसदी था लेकिन अब यह संख्या 50 फीसदी से उपर हो चुका है।
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