Monday, February 4, 2013

वैश्वीकरण के दौर में युवाओं की चुनौतियां

उस पीढ़ी की नींव कितनी गहरी तथा मज़बूत है, उसकी दिशा तथा दशा दोनो की स्थिति की पहचान उस पीढ़ी की मानसिकता से पता लगाया जा सकता है। आज युवाओं के मानस पटल पर पड़ने वाले बदलते समाज की नई छवि ने जो नए विचारो को जन्म दिया है उससे उनकी आकांक्षाओं में बदलाव आया है तो दूसरी तरफ कुछ पुराने विचारों के समक्ष तर्क-वितर्क के कारण वह प्रभावित भी हुए हैं। इस स्थिति में आवश्यक्ता है कि युवाओं में आने वाली विचारधारा के स्त्रोत का मूल्यांकन किया जाए ताकि वे एक बेहतर भविष्य के लिए चुनौतियों से लड़ने के लिए कुछ विकल्प तलाश कर सकें।
मीडिया ने अपने विस्तार से दुनिया को एक रिमोट के यंत्र में ला कर रख चुका है। एक बटन से आप अपने ही घरों में दूसरे देश की तस्वीर देख लेते है। यहां पर बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया ने यह मंच प्रदान कर हम युवाओं को तुलना करने का एक अच्छा माध्यम देने में मदद किया है।
दरअसल जिस गति से आज विकासशील देशों में युवाओ के विकास से सम्बंधित जो तस्वीर है वह हमारे यहां से बहुत भिन्न है। भारतीय युवा ने जिस गति से वैश्वीकरण को देखा था और जो आशायें दिखीं थी वह उस हद तक संतुष्ट करने में सक्षम नहीं रह पाई हैं। जहां युवाओं ने सोचा था कि तकनीकी विकास से भारत में नए क्षेत्र विकसित होगें, जिससे रोज़गार के अवसर बढ़ेगें और प्राइवेट कम्पनियों के आने से समाज के मध्य वर्गीय परिवारों को इसका लाभ होगा पर आशा अनुरूप इसका असर नहीं दिखता है।
जिसका ताज़ा उदारहण पटना में लगे रोजगार मेला है जिसमें उमड़ी भीड़ से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अभी भी रोजगार के अवसर और बेरोजगारी का आलम क्या है? आशा तो यह थी कि  हमारे सामने शिक्षा क्षेत्र में युवाओं को लाभ होगा जिससे आर्थिक भार कम होगा पर असर कुछ उल्टा ही दिखा। एक तरफ जहां वर्तमान शिक्षा व्यवस्था युवाओं में जरूरी कुशलता पैदा करने में नाकाम रहे वहीं शिक्षा एक व्यवसाय बनकर रह गया। शैक्षणिक संस्थानों के आसमान छूते फीस यही दिखाते हैं कि यह नई व्यवस्था गरीबों के भले के लिए तो नहीं ही है। यह एक प्रकार से दोतरफा मार है। एक तरफ तो ये शैक्षणिक संस्थान सर्वसुलभ नहीं हैं औऱ जो मोटी मोटी फीस देकर यहां दाखिला लेते हैं उनमें भी कुशलता का अभाव ही है।
भारत में यह स्थिति और बदतर तब हो जाती है जब शैक्षणिक व्यवस्था के मारे ये अकुशल युवा सरकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं उठा पाते हैं। युवा को खुद अपने देश में ही सरकारी योजनाओं का पूर्ण रुप से लाभ नहीं मिलता है। प्रधानमंत्री की 15 सूत्रीय कार्यक्रमों को जिस गति से अल्पसंख्यक समाज का कल्याण करना था वह आंकड़ा संतुष्ट करने योग्य नहीं है। तो फिर रास्ता क्या है? शायद इससे निकलने की राह राजनीति से निकलती है। जहां खुद युवा अपने हाथों में कमान थाम कर नीतिगत परिवर्तन करें।

लेकिन राजनीति की बात करें तो युवाओं की भागीदारी मुश्किल से गिन्ती के बराबर है। अभी राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के नेता के तौर पर राहुल गांधी का चेहरा सामने आया है, जिनसे युवाओं को आशा हो सकती है, लेकिन यह बात हमें मानना पड़ेगा कि वह भी उसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आए नेता हैं जिनको बनी बनाई जमीन मिली, ऐसे में वह उस बने बनाए ढांचे से खुद को कितना निकाल पाएंगे यह वक्त बताएगा। युवा वर्ग का सपना रोज़गार प्राप्त करना होता है। सरकारी नौकरी पाने के लिए वे पारंपरिक शिक्षा में ही कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन इसकी संख्या कम होने के कारण प्रतियोगिता का स्तर तथा प्रतिभागियों की संख्या दोनो में रस्साकशी जारी है। ऐसे में युवा निजी क्षेत्र की तरफ रुख करते हैं परन्तु कुशल प्रशिक्षण का अभाव, शिक्षा के स्तर तथा कम्पनियो की कमी होने के कारण युवा बेरोज़गार हो रहे हैं।

वर्तमान समय में वैश्वीकरण ने युवाओं को जो हसीन सपने दिखाए उसको पाने की चाहत तो युवा रखते हैं लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए जो जरूरी स्थितियां होती हैं उसे पैदा करने में हमारा समाज और सरकार नाकाम रही है। उन सपनों में जीता युवा अपने पारंपरिक उद्योग धंधों से भी अपना मुंह मोड़ चुका है। ऐसे में उन उद्योगों में भी कुशलता नहीं रह गई है। जरूरत इस बात की है कि बदलते दौर में हम वह स्थितयां पैदा करें जिससे कि युवाओं के सपने साकार हो सकें और साथ ही पारंपरिक उद्योगों में तकनीकी विकास करें ताकि उससे भी युवा मुंह न मोड़े।

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