Wednesday, December 21, 2016

बुजुर्गों की हो रही त्रासदी: जिम्मेवार कौन

उंगली थाम के मेरी तुझे, मैं चलना सिखलाऊं |
तू बांह पकड़ना मेरीजब मैं बूढ़ा हो जाऊं ||”
      

 एक कवि की ये चंद पंक्तियॉ मॉ-बाप की उम्मीद बयॉ करती हुई दिख रही है| पर क्या आज ये पंक्तियां सार्थक होती प्रतीत होती है| एक वृद्ध आश्रम से निकलने के बाद वहां कि चंद बातें मेरे दिमाग को झकझोरने लगी. जिसे मैंने एक लेख का रुप दिया है|
                                                   भारत में तेजी से आयी पश्चम संस्कृति ने यहॉ के सामाजिक जीवन को अस्त व्यस्त किया है भारतीय समाज में बुजुर्गों की खास इज्जत और सम्मान हैलेकिन वत्तर्मान परिस्थिति में बुजुर्गो की देखभाल, सुरक्षा और सम्मान एक समस्या का रुप लेती जा रही है|
                                                                   जिस देश में कभी ऐसे संस्कार हुआ करते थें, कि हम अपने बुजुर्गो का सम्मान ही अपना परम कर्त्तव्य समझते थे आज उसी देश में बुजुर्ग अकेले जीवन यापन करने पर मजबुर है| हालंकि ये भी सच है कि उनकी पीढ़ी और हमारी पीढ़ी में काफी अंतर है उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा परम्परा को बढ़ाने में लगाया है| जबकि इसके विपरीत हम अपने एक बड़ा हिस्सा आधुनिकता को अपनाने में लगा रहे है|
             आधुनिकता क्या है? ये भी अहम सवाल हैजहां तक युवा पीढ़ी से मैंने सीखा है, और जो कुछ देखा है उस आधार पर आधुनिकता की परिभाषा भयभीत करने वाली हैक्योंकि हम शायद भोग और विलासिता को ही आधुनिकता समझ बैठे है| इसका उदाहरण हम ऐसे देख सकते है कि , हम किसी बियर बार की धीमी रंगीन रोशनी में शराब गटक रहे होते हैंठीक शायद उसी शाम घर के बुजुर्ग एक ग्लॉस पानी को तरस रहे होते हैं, सिलसिला यहीं नहीं रुकता ,घर की महिला भी खास कर नई नवेली दुलहन आते ही उन्हें बोझ समझ बाहर करने की तुल पकड़ लेती है| आधुनिकता का फैशन इस कदर हम पर सवार हुआ है कि हम अपने संयुक्त परिवार कि परम्परा को भुलते जा रहे हैं और एकल परिवार कल्चर दिन-ब-दिन हावी होते जा रही है| ऐसी मानसिकता क्यों बनती जा रही है हम युवाओं की, यह सोचनीय है|
                                                       एक वो समय था, जब बुजुर्ग घर की मजबुत नींव की तरह समझे जाते थे| जिनके उपर जिम्मेदारी और अनुभव का ईट जोड़कर हम एक सुन्दर महल बनाते थे| पर वक्त बितने के साथ आज आलम यह नजर आने लगा है कि आज उन्हीं के पास रहने को घर नहीं हैउनका सहारा एकमात्र वृद्ध आश्रमों में ही रह गया हैंमंदिरों के सामने बुजुर्ग (जो हमारे समाज के मार्गदर्शक हैं ), भीख मांगते नजर आते है और तरसती ऑखों से वहां खड़ी भीड़ में अपनों को तलाशते हैं| आंकड़ों का सच यह है कि हमारे देश में बुजुर्गों की संख्या लगभग 8 करोड़ 10 लाख है। इनमें 80 प्रतिशत बुजुर्ग गांवों में रहते हैं और 20 प्रतिशत शहरों में। 33 प्रतिशत बुजुर्ग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं। बुजुर्गों में 55 प्रतिशत संख्या विधवाओं की है। 90 प्रतिशत बुजुर्ग गैर-संगठित क्षेत्रों में कार्य करते हैं और 73 प्रतिशत बुजुर्ग अशिक्षित हैं। देश में लगभग 3,000 वृद्धाश्रम हैंजिनमें वृद्ध अपने जीवन के अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए बैठे हैं।
        अंत में यह कहना चाहुंगी कि जो बाप जिंदगी भर की कमाई बच्चों की खुशियों पर कुर्बान कर देते हैं और मॉ खुद जग कर बच्चों को सुलाती है, खुद भुखी रह बच्चों को खिलाती है. हर कदम पर सहारा देकर आगे बढ़ाती है |आज वही बेसहारा क्यों हैं|

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