बिहार के विभिन्न विश्वविद्यलयों में निरंतर शिक्षा व्यवस्था पे आंदोलन आम बात हैं। बिहार में शिक्षा का निरंतर गिरता हुआ स्तर एवम् आय दिनों महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में हो रहे कर्मचारियों की हड़ताल विचारशील व्यक्तियों के लिए गंभीर चिंता का कारण बना हुआ है लेकिन विडम्बना है की जिस चिंता के साथ समस्या पर विचार विमर्श हुआ करता है उसका अल्पांश भी हम समस्या के निराकरण के प्रयत्न में परिलक्षित नही पाते।आज हमारे प्रदेश के छात्र उच्च शिक्षा के लिए पलायन नही रोक पाते। प्रदेश में प्राथमिक स्तर से ही पठन पाठन व्य्वस्था फिसड्डी है।आज वर्तमान सन्दर्भ में बात करें तो इतने बड़े और शिक्षाविदों के प्रदेश में विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक कैलेंडर ही छात्र कल्याण से बाहर हैं। परीक्षा की तिथि रिजल्ट के इन्तजार में ही छात्र अपना साल बर्बाद पाते हैं। देश के सम्माननीय विश्वविद्यालयों में पढ़ने का सपना मात्र सपना ही रह जाता है। कर्मचारियों के संदर्भ में बात करें तो मुलभुत आवश्कताओं के बिना ये भी हड़ताल करने को मजबूर होते हैं और इन समस्त कर्मों का फल विद्यार्थियों को भुगतना पड़ता है।अन्य प्रदेशों की तरह अगर अपने प्रदेश के विश्वविद्यालय को भी अगर देश के हित में भागीदारी सुनिश्चित कराना है तो सरकार को छात्रों को आंदोलन और कर्मचारियों को हड़ताल करने का मौका नही देना चाहिए। ये सब तब ही संभव है जब समस्त स्तर के शैक्षणिक व्यवस्था को सुधार कर पटरी पे लाया जाए एवम् कर्मचारियों को उनके हक़ की सुख सुविधाएँ प्रदान की जाए वरना अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब यंहा की शिक्षा मात्र नाम की ही रह जायगी।

No comments:
Post a Comment