Saturday, December 17, 2016

साबित तो कर दिया हमने, पर आप कब मानोगे ?

मीठी सी किलकारी, वो नन्हे नन्हे हाथवो खूबसूरत आँखें जो न जाने इस
दुनिया मैं  आते आते  बहुत कुछ कहना चाहती हो ।  जिससे  इस  दुनिया में
लाने के लिए उसकी माँ ने न जाने कितनी  यातनायें कितनी पीड़ा  सही  थी ।
शायद  उसने अपने माँ के पेट में ही
इस जालिम दुनिया की रीती रिवाज को समझ
लिया था  । जिस दुनिया में  उसकी माँ को इतने कष्ट  झेलने पड़े इतनी
यातनाएं साहनी पड़ी । उसने ठान  लिया मैं इस दुनिया मैं आउंगी जरूर आउंगी
और  लोंगों को यह साबित करुँगी की इस दनिया में  एक लड़की को जन्म देना
सौ लड़को को  जनम देने के बराबर है ।
देश के आज़ाद हुइ आज सतर वर्ष हो चुके पर इन सतर वर्षों
में देश में बहुत कुछ बदला नई नई तकनीके आई लेकिन अभी भी लड़कियों को लेकर
लोगों के विचार साफ नहीं हुए  हैं आज भी बहुत जगह ऐसी हैं जंहा लड़कियों
को बोझ के आलावा ज्यादा  कुछ नहीं समझा जाता है।  मेरी इस पंक्ति से यह
तो समझ ही गए होंगे की मैं किस बारे में बात करने वाली हूँ  जी हाँ  -
कन्या  भ्रूण  हत्या। हमारे देश में कन्या भूर्ण हत्या एक अपराध  माना
जाता है  पर फिर भी यह अभी भी बहुत बारे पैमाने पर हो रहा ।
प्राचीन समय से ही हमारे देश में लड़कियों को एक
अभिशाप माना  जाता है  |  1990 में चिकित्सा के क्षेत्र में हुई उनत्ती
के बाद ही भारत में भ्रूण हत्या को बढ़ावा मिला  भारतीय समाज में लड़कियों
को आर्थिक और सामाजिक रूप से एक बोझ के समान माना जाता है इसलिए  शायद
उनलोगों की नज़र में  लोग यह लड़कियों को दुनिया में लाने से पहले ही मार
देना ज्यादा  बेहतर होगा। समाज में ऐसे तबके के भी लोग हैं जिनके नज़र में
लडकिया उपभोगी होती है और लड़के उत्पादक ।



हो सकता है कुछ लोग मरे इस ब्लॉग को पढ़ कर मेरी
बातों से संतुष्ट  न हो उन्हें यह लगता होगा की मैं अभी  भी बहुत पुरानी
बातों का जिक्र ले कर बैठ गई हूँ । उनका यह मनना होगा की अगर ऐसा कुछ
होता तो अख़बार या समाचार में जरूर आता मगर मेरे दोस्त जरुरी नहीं  की जो
अख़बार या समाचार में आये वही खबर हो । भारत में ऐसे अभी भी कई गांव है
जंहा बच्चीयों  को सिर्फ इसलिए  मार  दिया जाता है की वह एक लड़की है ।
अगर मैं आकड़ा का जिक्र करे तो महिला लिंग अनुपात पुरुषों की तुलना में
बड़े स्तर पर गिरा है । 8 पुरुषों पर 1 महिला  है । अगले पाँच वर्षों में
अगर हम पूरी तरह से भी कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगा दें तब भी इसकी
भरपाई  कर पाना  आसान नहीं होगा। इस देश में ऐसे भी कई परिवार जंहा की
महिलाये अपनी ही बेटी को बचने के लिए एक आवाज़ तक नहीं उठा सकती उनकी
आवाज़ को भी उनकी बेटी के साथ दबा  दिया  जाता है  ।
शायद हम अभी भी उन आवाज़ों से बहुत दूर है जो  चीख चीख कर
कहती है -.....  माँ मुझे बचा लो  ..... मुझे  मत मारो  .....   ।
जरुरत है हमे एक ऐसे शसख्त कानून की जंहा कन्या भूर्ण हत्या
जैसे गंभीर अपराध को रुक जा सके । हाल के ही दिनों में केंद्रीय महिला
एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गाँधी ने भ्रूण हत्या पर अपना सुझाव  दिया था ।
उन्होंने लिंग परीक्षण पाबन्दी ख़तम करने की बात कही ।
मेरी नज़र में यह सहरानीय है । ये भी सोचने वाली बात है
की कब तक हम अल्ट्रासॉउन्ड वालो को जिमेदार ठहरा कर  गिरफ्तार करते
रहेंगे । अगर  हम जरा ठन्डे दिमाग से सोचे तो सारा दोष अल्ट्रासॉउन्ड
वालो का नहीं होती जो लिंग जाँच कर  बताते है बेटी है या बेटा  । सही
मायने में दोष उनका  होता है जो यह जानने के बाद की गर्भ में बेटा नहीं
बेटी है और उस बेटी को मार देते है जरुरत है ऐसे लोगों के विचार धार को
बदलने की ।
उन लोगों को यह समझने की जरुरत बेटी बोझ नहीं
बल्कि घर ही नहीं देश कि भी लक्ष्मी होती है और ये कथन कंही न कंही सत्य
है तभी तो हाल में ब्राज़ील में हुए रियो ओलंपिक में हमारे देश को जो मेडल
मिले वो मेडल देश को देश की बेटियों ने ही दिलवाया फिर  हम बेटियों को
बोझ कैसे मन सकते ... ? जरुरत है तो सिर्फ मानसिकता बदलने की फिर  इस देश
को बेटियां बहुत आगे तक ले कर जाएँगी ।


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