Wednesday, September 7, 2016

स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा या... बुर्कीनी!

फ्रांस का नाम जेहन में आते ही जो पहली बात दिमाग में कौंधती है वह है फ्रांसीसी क्रांति। वह क्रांति जिसने दुनिया को लोकतंत्र के मूलभूत स्तंभों से अवगत कराया और जिसके आधार पर आधुनिक राष्ट्रों का निर्माण हुआ। आज भी फ्रांस इसका दंभ भरता है जहां हर सरकारी भवनों में प्रमुखता से स्वतंत्रता, समानता और भाईचार मोटे मोटे अक्षरों में उकेरा हुआ है। लेकिन पिछले कुछ समय से फ्रांसीसी समाज जैसे सड़न के दौर से गुजर रहा है, जहां नस्ल और धर्म के आधार पर समाज बंटा हुआ दिख रहा है, जिसमें ताजा मामला है बुर्कीनी विवाद।


तो क्या यह विवाद मात्र बिकनी बनाम बुर्कीनी का है? या समाज के भीतर दो समाजों की लड़ाई है। एक समाज वह जो चमचमाती दुनिया में रहता है और बड़े नगरों के सारे सुख सुविधाओं को भोगता है और दूसरी तरफ वह समाज जो नौकरी तो इन्हीं चमचमाती दुनिया में करता है लेकिन शाम ढलते ही उपनगरों में बने अपने छोटे घरौंदों में लौट आता है। चलिए पेरिस का ही उदाहरण ले लेते हैं, पेरिस में जितने लोग दिन में काम करते हैं शाम ढलते ही 80 फीसदी लोग पेरिसे के नजदीक वर्सिली, मैसल, न्यूली, क्लीसी, बोन्डी और कोरबेल जैसे उपनगरीय इलाकों में लौट आते हैं।

यह वह इलाके हैं जहां फ्रांस की गरीब जनता रहती है और अपने आपको दोहरे दर्जे का नागरिक समझती है। यह वे इलाके हैं जहां अफ्रीकी एवं अरब से आए हुए अप्रवासी हैं या फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रांसीसी कॉलोनियों से लौटकर आने वाले लोग हैं। यह वे लोग हैं जो फ्रांस के अल्पसंख्यक हैं जिनमें बहुसंख्यक मुस्लिम हैं। इस तरह के उपनगरीय क्षेत्र पूरे फ्रांस में 731 हैं जिन्हें संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। इन इलाकों की एक तिहाई जनता गरीबी रेखा के नीचे रहती है। यहां की 39 फीसदी जनसंख्या 25 से कम उम्र की है और बेरोजगारी दर 40 फीसदी है जो फ्रांस की राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 20 फीसदी से बहुत ज्यादा है। मूलरूप से पेरिस और उसके आसपास के उपनगर टूटन के दौर से गुजर रहे हैं। पेरिस के चारों ओर आठ लेन का सुपर हाईवे है, जिसके एक तरफ तो तरक्की, खुशहाली, संस्कृति है तो दूसरी ओर गरीबी एवं बदहाली है।

उपनगर फ्रांस के वे इलाके हैं जहां गोरे फ्रांसीसी कभी जाना पसंद नहीं करते हैं। नब्बे के दशक तक उन गोरों को हारा हुआ इंसान माना जाता था जो इन इलाकों में रहते थे। अभी भी पेरिस के उपनगर मुख्य शहर से रेल लाइन से नहीं जुड़े हुए हैं।  फ्रांस की राजनीति में भी उपनगर की समस्याओं को कभी कोई स्थान नहीं दिया गया। पिछले चुनाव में घोर दक्षिणपंथी नेता पेन ने इन्हीं अल्पसंख्यकों को केंद्र बनाकर अपना चुनाव प्रचार किया और उन्हें फ्रांस के लिए गैर जरूरी बताया। हालांकि चुनाव में उनको सफलता नहीं मिली लेकिन उन्हें कुल 18 फीसदी वोट मिले। 


यह दर्शाता है कि फ्रांस का समाज किस टूटन की स्थिति से गुजर रहा है। यह टूटन कोई आतंकवादी हमलों के बाद शुरु हुआ ऐसा नहीं है इसकी शुरुआत 90 के दशक मे ही हो गई थी। फ्रांस में फ्रांसीसी मुस्लिम युवकों का आतंकवाद की तरफ झुकाव सामाजिक टूटन का प्रभाव है। जब लोगों से उनको उनकी राष्ट्रीयता से अलग किया जाएगा, द्वितीयक दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार होगा तो ऐसे में लोग अपनी पहचान अपने धर्म में तलाशने लगते हैं। ऐसे में बुर्का पर रोक उसके बाद बुर्कीनी पर रोक जैसे फैसले सामाजिक दरार को और बड़ा ही करते हैं। यही कारण है कि जब से बुर्कीनी पर रोक लगी है बुर्कीनी की फ्रांस में बिक्री तीन गुना बढ़ गई है। अगर प्रशासनिक जरूरतों के लिए इस प्रकार के फैसले लेने की जरूरत है भी तो इसका रास्ता समुदाय विशेष के लोगों को साथ लेकर एक राय बनाने में है न कि एकतरफा फैसला लेने में। फ्रास को जल्द ही अपने उन मूल्यों को समझना होगा जिसके लिए फ्रांस जाना जाता है- स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह टूटन कोई भयावह रूप न ले ले।

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