Sunday, August 31, 2014

सभ्यता संस्कृति से रु-बरु कराता खानपान


जैसे हम जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के भोजन जोकि हमारी सभ्यता संस्कृति से हमें अवगत कराती है| साथ ही साथ हमारे पूर्वजों से मिली एक विरासत के रूप में हमारी पहचान भी कराती है| क्योंकि जैसे हर देश की हर राज्य की भाषा अनेक है, उसी प्रकार खानपान भी हर राज्य का हर देश का अलग-अलग होता है और ये अभिन्न अंग होता है हर देश का। लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं है कि हम जिस देश में रहते हैं उसी की वेश-भूषा या खान पान को अपनायें क्योंकि इससे तो हम अपने संस्कृति से जुड़े रह सकते हैं लेकिन दूसरे देशों की सभ्यता संस्कृति से हम वंचित रह जायेंगे| इस ब्लॉग के माध्यम से मैं संस्कृति को खान-पान से जोड़ रही हूँ, जिससे कि आजकल के लोग बहुत ही मानते हैं और इसे अपनाने में भी उन्हें कोई संकोच नही हो रहा है|

हम बात करें भारत की तो मन में आता है की भारत एक बड़ा देश, इसकी जनसंख्या और सबकी भाषा अनेक है और हर राज्य(जो की 28 और सात केन्द्र शासित प्रदेश है|) और इसकी पंरपरा महत्वपूर्ण मानी जाती है, जैसा की भारतीय लोग (सिनेमा,फैशन,संगीत) की तरह अब दूसरे देशों की खान-पान को भी अपनाने में भी अब पीछे नही है, और ये अनेकता में एकता  लाने जैसा है| उदाहरण के तौर पर हम बिहार को ही ले लें, बिहार अपने खानपान की विविधता के लिए प्रसिद्ध है| स्थानीय व्यंजन तो यहां के लोगों की कमजोरी है, लेकिन इसके साथ हीं साथ लिट्टी-चोखा अब विभिन्न देशो का भी पसंद बन चुका है, और तो और ये माना जाता है कि लालू प्रसाद (बिहार) के रेल-मंत्री बनने के बाद तो लिट्टी चोखा भारतीय रेल के महत्वपूर्ण स्टेशनों पर भी मिलने लगा है| इससे यह पता चलता है कि  हम बिहार में  रह कर भी (चाइनिज,दक्षिण भारत राजस्थान, इत्यादि) जगहों का खाना पसंद कर रहे हैं| और इसे आज हमलोगों तक पहुंचाने में होटल और रेस्तरां हमारा सहयोग कर रहे हैं| और ये कहना गलत नहीं होगा कि आज इसी के जरिये हम दूसरे देशों से भी जुड़े हुए हैं|

 

 

 

 

 

8 comments:

  1. यह ठीक है कि विभिन्न संस्कृतियों से रूबरू कराने के एक जरिया खान पान भी है, लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि एक तरीके से यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का भी एक जरिया है?

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    1. सर, बिल्कुल सही है कि यह साम्राज्यवाद का जरिया है , लेकिन इसे हम सकारात्मक रूप में आज अपना रहें है| क्योंकि आज हम सिर्फ एक बंधन में बंध कर नहीं रह गयें है, इससे आगे निकल चुकें हैं और यह हमारे लिए सकारात्मक प्रभाव के रूप मे साबित हुआ है|

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  2. today we have a wide range of cuisine from China, Italy and other countries. Chinese noodles and Italian Pasta are the routine food. idly-dosa is preferred over litti-chokha. So, can call food as a source of cultural imperialism.

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  3. चलो अच्छा है खानपान की वजह से ही पुरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण का मेल हो रहा है।

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  4. We might hesitate in adopting different cultures of different states or country but food is one thing in which we don't hesitate in accepting it. We really enjoy eating foods of different places.

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  5. हमारे लिट्टी चोखा भी बाहर के राज्यों में बड़े चाव से खाए जाते है।

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