
हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसके बारे में हम सोचते तो हैं और शायद उस वर्ग से सहानुभूति भी रखते है, पर उनके लिए कोई कुछ करता नहीं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था की “गरीबों का इतिहास कोई नहीं लिखता”।यह कथन आपको सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्या है गरीबों का इतिहास? इतिहास के नाम पर अगर कुछ है तो सिर्फ आंकड़े और कुछ नहीं। कहते हैं इतिहास भावशून्य होता है, वह किसी की तरफदारी नहीं करता, लेकिन अगर हम इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो तथ्य कुछ और ही बताते हैं।
प्राचीन दुनिया का इतिहास जानने का तरीका खुदाई में प्राप्त किए गए साजो समान होते हैं, क्योंकि साजो समान अमीर लोग ही रख पाते होंगे इसलिए जब आज उन समानों के आधार पर इतिहास लिखने की बात आती है तो ज्यादातर उन्हीं के बारे में लिखा जाता है। यहां तो माना जा सकता है कि इतिहासकार मजबूर हैं, लेकिन समस्या तब आती है जब मध्यकालीन से लेकर आधुनिक दुनिया के इतिहास से गरीब नदारद है, वह भी तब जब लेखनशैली का विकास हो चुका था। जब इसके कारणों की खोज हम करते हैं तो पाते हैं कि मध्यकालीन समय में राजा महाराजा दरबारी इतिहासकार रखा करते थे जो इन राजाओं का गुणगान करते नहीं थकते थे। जाहिर सी बात है कि ऐसे में एक गरीब का इतिहास कोई क्यों लिखेगा।
आधुनिक भारत में भी इतिहास नेताओं के वर्णन तक ही सिमट कर रह गया है। हां लेकिन आधुनिक समय में एक नए प्रकार का इतिहासलेखन जरूर आया है जिसे सबअल्टर्न इतिहास लेखन कहते हैं, लेकिन अभी यह अपने शुरुआती दौर में है और इसको पूरी तरह विकसित होने में वक्त लगेगा। जब यह पूरी तरह से विकसित हो जाएगा तब शायद हम जान पाएं की गरीबों का इतिहास क्या था। अब सवाल यह है कि गरीबों का इतिहास नहीं लिखे जाने में समस्या क्या है? समस्या यह है कि इसकी कमी होने के कारण न तो हम गरीब की व्यथा समझ सकते हैं और न ही गरीबों के आशाओं को। क्योंकि हर चीज का एक ऐतिहासिक परिपेक्ष्य होने से उसकी व्याख्या और आगे के कदम उठाना आसान हो जाता है।
ऐतिहासिक परिपेक्ष्य की कमी के कारण हमें गरीबी का मापदंड तो मिलता है लेकिन उसकी समुचित व्याख्या नहीं। दुनिया भर में गरीब होने का मतलब उनके अलग मापदंडो के हिसाब से है।उन मापदंड़ों को लेकर भी कोई एक मत नहीं है कि गरीबी को मापा कैसे जाए। सवाल उठता है कि आखिर गरीबो की संख्याओ को माप कर होगा क्या? जब तक हमें गरीबा का ऐतिहासिक परिपेक्ष्य नहीं मिलेगा। हमने अनेक राजा-रानियों, महापुरुषों, वीरों की गाथाओं को सुना है पर क्या कभी हमने किसी गरीब की व्यथा को नजदीक से जानने या समझने की कोशिश की? अगर की होती तो आज भारत से गरीबी की समस्या काफी हद तक खत्म हो चुकी होती। आज गरीबों का इतिहास सिर्फ प्रेमचंद की लेखनी तक सीमित रह गए है ,शायद यहीं कारण है की आज हमारा समाज इतना भाव-विहीन हो चुका है की गरीबो की समस्याओ को कम करने के बजाय उन्हे शोषित और प्रताड़ित करने से चुकता नही।
बाइबिल में लिखा है कि “गरीब हमेशा हमारे साथ ही रहेंगे”,आखिर गरीब हमारे साथ कब तक रहेगे ? इस सवाल का जवाब हमारे पास आज ना हो, पर गरीबी कैसे खत्म किया जाए शायद इसका जवाब हम सभी के पास है मगर जरुरत है इसके ऐतिहासिक परिपेक्ष्य पर जरा सोचने की। जरा सोचिए
बेहतरीन.... ◘
ReplyDeleteकहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। अगर हम इतिहास लेखन की बात करें तो भी यह बिल्कुल सटीक बैठता है। चाहे काल कोई भी हो लेकिन एक चीज जो हमेशा दोहराई गई वह यह है कि हमेशा नेताओं व राजाओं का ही इतिहास लिखे गए। आम जनता की स्थिति, उनकी परेशानी या उनकी लड़ाई कहीं अंधेरे में ही खोई रह गई। जब तक बहुसंख्य जनता का इतिहास हम नहीं जानेंगे तब तक शायद इतिहास की बेहतर समझ नहीं बन पाएगी। यह ब्लॉग एक अच्छा प्रयास है।
ReplyDeletecommendable..
ReplyDeletewe really need to think that why we only read about the rulers and the promising leaders, why none ever focused on the sufferings of poor people of that time.
Time has changed. But for poor it seems that its same since ages.we claim that we r on the way of development.our so called leaders praise themselves by showing the growth in GDP nd gnp.but now time has come to think of development from grass root level, to count the achievements of poor people in every aspect of development. Dnt leave the hands of poor people just because of reason tht they r poor, it is very necessary to pull them up with thousand hands to make their presence felt in the society.....keep it up Anushree by ur little try to make us realize about them.
ReplyDeletegareeb hi gareeb kyu hote hain??
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