बिहार में दस विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में महागठबंधन ने बाजी मार ली। हाल ही में संपन्न मतदान की हुई मतगणना में महागठबंधन को छह सीटें मिली जबकि भाजपा ने अकेले दम पर चार सीटें अपने नाम की। यह बात देखने लायक रही कि जिस अंतर से भाजपा केन्द्र में आई तभी से बिहार की राजनीति में उथल पुथल की स्थिति बनी हुई थी। लालू ने जहां इस मौके को अपने राजनीतिक पुनर्जीवन के रूप में उपयोग करना जहां वहीं नीतीश भी अपनी खोई साख को पाने के लिए उसी जातीय राजनीति के दुष्चक्र में फंसने को तैयार हो गए।अगर राजद की बात करें तो 2014 लोकसभा चुनाव के पूर्व उनकी पार्टी के 22 में से 13 एमएलए राजद छोड़कर अन्य पार्टियों में जा मिले। और तो और रामविलास पासवान भी ऐसी स्थिति में मरता क्या न करता। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा-जदयू गठबंधन के वक्त जब जब भाजपा के सदस्य प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए मोदी का नाम लेते तो मानो नीतीश कुमार रुठ से जाते थे। आखिरकार भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद जदयू के पास महागठबंधन बनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। फिर शुरू हुआ महागठबंधन की आड़ में जातीय राजनीति का खेल जिसमें जदयू, राजद और कांग्रेस ने गठबंधन कर उपचुनाव लड़ा और मामूली अंतर से भाजपा को हरा दिया।
अगर जीत का अंतर देखा जाए तो सिर्फ दो सीटों का रहा जिसमें जदयू को दो, राजद को तीन और कांग्रेस के खाते मे सिर्फ एक सीट ही आ पाई। कहने का मतलब कि कोई भी पार्टी सीटों मे भाजपा की बराबरी तक नहीं कर सकी। मगर बावजूद इसके हर जगह महागठबंधन की जयजयकार ही हो रही है। लोगों के ज़ुबानों पर ही नहीं बल्कि सभी मीडिया भी महागठबंधन की ही बात किये जा रहे हैं लेकिन शायद यह जीत अमर अकबर ऐंथनी की एकता की नहीं बल्कि जातीय राजनीति की है। हाल ही में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने केवल भागलपुर की सीट मुस्लिम वोटरों की कृपा से जीत ली तो दूसरी तरफ जदयू और राजद पर भी पिछड़े वर्ग और मुस्लिम वोटरों ने कृपा-दृष्टि बनाए रखी जिस कारण उन्हें दो-तीन सीट भी नसीब हो गए। लेकिन कहीं ना कहीं ये पार्टियॉ बिहार की आम जनता को भूल गई।
अब शायद महागठबंधन पार्टियॉ चैन की सांस ले सकते हैं क्योंकि जिस लालू यादव के बारे में कहा जा रहा था कि उनकी राजनीतिक मौत हो चुकी है वह एक बार फिर से जीवित हो गए हैं। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद हाशिए पर चले गए नीतीश को भी इस उपचुनाव से संजीवनी मिली है। अब देखना यह है कि दोबारा से जातीय समीकरणों के उभरने का बिहार पर प्रभाव क्या पड़ता है। हालांकि इस तरह की राजनीति का पुराना रिकॉर्ड देखते हुए बिहार के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं है।
गौतम भाजपा भी अकेले नहीं लड़ी थी, उसके साथ भी लोजपा और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी भी थी। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि भाजपा की बराबरी कोई भी पार्टी नहीं कर पाई।
ReplyDeleteजी आपने सही कहा सर.... माफ करीएगा ।
Deleteit is difficult to depict future for present this caste consolidation is not a good sign
ReplyDeletetrue said miss Roy....
DeleteVery true that this kind of political amalgamation is not good for the future or for the people of Bihar. But don't you think its people of Bihar only who are making them win.
ReplyDeleteVery true that this kind of political amalgamation is not good for the future or for the people of Bihar. But don't you think its people of Bihar only who are making them win.
ReplyDeleteyes... we are equally guilty for this thing.
ReplyDeletenice write-up..
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